सोमवार, 19 अगस्त 2019

फ़र्द अश’आर 04

                1
1222--------1222-------1222-------1222
वही ख़ुशबख़्त है ’आनन’ ,मुहब्बत हो जिसे हासिल
वगरना ज़िन्दगी तो उम्र भर  ग़मगीन   रहती  है

2
तेरी तसवीर को दुनिया से छुपा रखता हूँ
उस से तनहाई में फिर बात किया करता हूँ

4
1222---1222-----1222-----1222
मुहब्बत का दिया रख  दर पे उनके आ गया ’आनन’
यही अब देखना है वो बचाते या बुझाते  हैं

5
221---2122--//221---2122
मैं आम आदमी हूँ ,है ’वोट’ मेरी ताक़त
है संविधान की यह ,सबसे बड़ी इनायत

6
1212---1122---1212----112/22
तेरा सवाल कोई यूँ बड़ा नहीं था मगर
तमाम उम्र भी गुज़री ,जवाब भी न मिला

7
221---2122  //221---2122
रहबर समझ के तुझको तेरे साथ चल रहे थे
क्या थी ख़बर की तू भी रहजन से कम नहीं है

8
2212--1212--1212---12
बह्र-ए-रजज़ मख़्बून मख़्बून मज़्दूअ’’

राहत के पढ़ रहा था ख़ुशगवार आँकड़े
वो शख़्स मर गया कतार में खड़े  खड़े

9
221---2121---1212----212
बह्र-ए-मुज़ारे मुसम्मन मक़्फ़ूफ़ महज़ूफ़

जंग-ओ-जदल से कुछ नहीं हासिल हुआ कभी
निकलेगा कोई रास्ता अम्न-ओ-अमान से

10
221---2121---1212----212
बह्र-ए-मुज़ारे मुसम्मन मक़्फ़ूफ़ महज़ूफ़

ये तुख्म-ए-इन्क़लाब है ज़ाया न कर इसे
ज़रख़ेज़ हो ज़मीन ज़रा इन्तिज़ार  कर

11
11212---11212----11212----11212
बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम

न उमीद थी ,न ख़याल था .कि भुला ही देगा तू यूँ मुझे
तेरा फ़र्ज़ था कि भुला दिया ,मेरा फ़र्ज़ है न भुला  सकूँ

12 
2122---1122---1122---112

कोई हफ़्तों न करे बात ,कोई बात नहीं
आप दो पल न करें बात तो डर लगता है
दिल-ए-वीरान में अब कौन इधर आएगा
आप आते है तो वीरान भी घर लगता है

13
221--2122  // 221--2122

जब तक मिले नहीं थे ,सौ सौ ख़याल मन में
जब रू-ब-रू हुए वो , सजदे में सर झुका है 

14
क़ता
1222---1222---1222---1222
तुम्हें क्या दे सकूँगा मैं सिवा इक प्यार, होली में
प्रणय से है भरा उदगार, यही  उपहार  होली में

भले ही भूल जाओ तुम, नहीं होगी शिकायत कुछ
करूँगा याद मैं तुम को, सखे ! सौ बार होली में

तेरी तसवीर को ही रंग कर बस मान लूँगा मैं
हुई चाहत मेरी पूरी, प्रिये ! इस बार होली  में

15
212---212---212---212
दिल ही पत्थर का लगता है उसका बना
उस पे होता नहीं कुछ असर , दोस्तो !

16
1222--1222---1222---1222
मुहब्बत का तरीक़ा भी अजब कैसा तुम्हारा है
कभी दुतकार देती हो, कभी पुचकार लेती हो ।

17
 जब दिया ही न खुद रोशनी दे सके 
उसका जलना भी क्या,उसका बुझना भी क्या


18

1222---1222---1222--// 1222--1222--1222
जहाँ हो झूठ की महफ़िल,जहाँ हो झूठ की ढेरी ,
वहाँ बस ढूँढना सच को ,कहाँ आसान होता है ।

19
2122---1212---112 चाह अपनी कभी छुपा न सके दाग़-ए-दिल भी उसे दिखा न सके यार की आँख नम न हो-’आनन’ बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके










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