बुधवार, 4 सितंबर 2019

मुक्तक 05

              1

ज़ह्र ही बस फ़िज़ा में घोलता  है
जब कभी हक़ में हमारे बोलता है
जो हरे थे जख़्म भरने लग गए थे
हर चुनावी दौर में वो खोलता है

          2
दावा करते हैं वो सूरज नया निकलने का
नई दिशा में ,नई राह पर लेकर चलने का
लेकिन काली रात अभी तो ढली नहीं, साथी !
थमा नहीं है अभी सिलसिला बेटी जलने का



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