गुरुवार, 27 अगस्त 2020

ग़ज़ल 145 : लगे दाग़ दामन पे --

फ़’लुन--फ़े’लुन---फ़े’लुन --फ़े’लुन
122---122------122----122
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
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ग़ज़ल 145 : लगे दाग़ दामन पे--

लगे दाग़ दामन पे , जाओगी कैसे ?
बहाने भी क्या क्या ,बनाओगी कैसे ?

चिराग़-ए-मुहब्बत बुझा तो रही हो
मगर याद मेरी मिटाओगी  कैसे ?

शराइत हज़ारों यहाँ ज़िन्दगी  के
भला तुम अकेले निभाओगी कैसे ?

नहीं जो करोगी  किसी पर भरोसा
तो अपनो को अपना बनाओगी कैसे ?

रह-ए-इश्क़ मैं सैकड़ों पेंच-ओ-ख़म है
गिरोगी तो ख़ुद को उठाओगी कैसे ?

कहीं हुस्न से इश्क़ टकरा गया तो
नज़र से नज़र फिर मिलाओगी कैसे ?

कभी छुप के रोना ,कभी छुप के हँसना
ज़माने से कब तक  छुपाओगी कैसे ?

अगर पास में हो न ’आनन’ तुम्हारे
तो शाने पे सर को टिकाओगी कैसे ?

-आनन्द.पाठक-

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