शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 115 [24A]: बेसबब उसको मेह्रबाँ देखा--

 ग़ज़ल 115 [24 A]-ओके

2122---1212---22
फ़ाइलातुन--मुफ़ाइलुन--- फ़ेलुन

बेसबब उसको मेह्रबाँ  देखा
जब भी देखा तो बद्गुमाँ देखा

पास पत्थर की थी दुकां ,देखी
जब भी शीशे का इक मकां देखा

जिसको "कुर्सी’ अज़ीज होती है
 उसको बिकते हुए यहाँ देखा

क़स्में खाता है वो निभाने की
पर निभाते हुए कहाँ   देखा

जब कभी ’रथ’ उधर से गुज़रा है
देर तक बस धुआँ धुआँ  देखा

वक़्त का  जो था  ताजदार कभी
उसका मिटते  हुए निशां  देखा

झूठ था हर जगह तवाँ ’आनन’
सच को देखा तो नातवाँ देखा ।
=आनन्द.पाठक-

[बह्र-ए-बेकरां = अथाह सागर]


[सं 12-04-19]

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 114 [22 A] : आदमी से कीमती हैं ---


ग़ज़ल 114 [22 A] ओके

एक ग़ज़ल : आदमी से कीमती हैं कुर्सियां
2122-----------2122---------212-
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन---फ़ाइलुन

आदमी से कीमती हैं कुर्सियाँ
कर रहे टी0वी0 पे मातम हैं मियाँ

आग नफ़रत की लगा कर आजकल
सेंकते सब अपनी  अपनी  रोटियाँ

मौसम-ए-गुल  आएगा कैसे भला
जब तलक दिल में रहेंगी तल्खियाँ

धार ख़ंज़र की नहीं पहचानती
किसकी हड्डी और किसकी पसलियाँ

दे रहें  हैं धन वो  राहत कोष  से
जो जला आए हमारी  बस्तियाँ

आदमी की लाश गिन गिन कर वही
गिन रहें संसद भवन की सीढ़ियाँ

आजतक हम कर्ज़  ’आनन’ भर रहे
एक पल की जो हुई थी ग़लतियाँ

-आनन्द.पाठक-
[सं 09-04-19]

सोमवार, 28 जनवरी 2019

ग़ज़ल 113 [34] : हाथ क्या उनसे मिलाते---

ग़ज़ल 113 [34]

बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन
2122----------2122
---------
हाथ जो उन से मिलाते
उँगलियाँ अपनी कटाते

दुश्मनी तो ठीक है ,पर
दोस्ती कुछ तो निभाते

जाग कर सोए हुए -सा
हम तुम्हें फिर क्या जगाते

झूठ को सच मानते हो
सच की बातें क्या बताते

आइने को  बद दुआएँ
ख़ुद मुखौटे  हो चढ़ाते

जब तुम्हें सुनना नहीं ,तो
हाल-ए-दिल क्या,हम सुनाते

दिल फ़क़ीराना है ’आनन’
मिलते रहना ,आते जाते


-आनन्द.पाठक-