रविवार, 14 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 116 [25 A] : वो रोशनी के नाम से डरता है--


एक ग़ज़ल 116[25 A] : ओके
 वो रोशनी के नाम से --
221----2121----1221-----212


वो रोशनी के नाम से  डरता  है आजतक
जुल्मत की हर गली से जो गुज़रा है आजतक

बढ़ने को बढ़ गया है किसी ताड़ की तरह
बौना वो दूसरों को समझता है  आजतक

इनसान भीड़ तन्त्र का हिस्सा हैबन चुका
"इन्सानियत’ ही भीड़  में तनहा है आजतक

हर पाँच साल पे वो नया ख़्वाब बेचता
जनता को बेवक़ूफ़ बनाता  है आजतक

वो रोशनी में  तीरगी ही ढूँढता  रहा
सच को हमेशा झूठ बताता है आजतक

वैसे तमाम और   मसाइल  थे   सामने
’कुर्सी’ की बात सिर्फ़ वो करता है आजतक

 हर रोज़ हर मुक़ाम पे खंज़र के वार हैं
’आनन’ ख़ुदा का शुक्र है ज़िन्दा है आजतक

-आनन्द पाठक-

[सं 14-04-19]

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 115 [24A]: बेसबब उसको मेह्रबाँ देखा--

 ग़ज़ल 115 [24 A]-ओके

2122---1212---22
फ़ाइलातुन--मुफ़ाइलुन--- फ़ेलुन

बेसबब उसको मेह्रबाँ  देखा
जब भी देखा तो बद्गुमाँ देखा

पास पत्थर की थी दुकां ,देखी
जब भी शीशे का इक मकां देखा

जिसको "कुर्सी’ अज़ीज होती है
 उसको बिकते हुए यहाँ देखा

क़स्में खाता है वो निभाने की
पर निभाते हुए कहाँ   देखा

जब कभी ’रथ’ उधर से गुज़रा है
देर तक बस धुआँ धुआँ  देखा

वक़्त का  जो था  ताजदार कभी
उसका मिटते  हुए निशां  देखा

झूठ था हर जगह तवाँ ’आनन’
सच को देखा तो नातवाँ देखा ।
=आनन्द.पाठक-

[बह्र-ए-बेकरां = अथाह सागर]


[सं 12-04-19]

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 114 [22 A] : आदमी से कीमती हैं ---


ग़ज़ल 114 [22 A] ओके

एक ग़ज़ल : आदमी से कीमती हैं कुर्सियां
2122-----------2122---------212-
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन---फ़ाइलुन

आदमी से कीमती हैं कुर्सियाँ
कर रहे टी0वी0 पे मातम हैं मियाँ

आग नफ़रत की लगा कर आजकल
सेंकते सब अपनी  अपनी  रोटियाँ

मौसम-ए-गुल  आएगा कैसे भला
जब तलक दिल में रहेंगी तल्खियाँ

धार ख़ंज़र की नहीं पहचानती
किसकी हड्डी और किसकी पसलियाँ

दे रहें  हैं धन वो  राहत कोष  से
जो जला आए हमारी  बस्तियाँ

आदमी की लाश गिन गिन कर वही
गिन रहें संसद भवन की सीढ़ियाँ

आजतक हम कर्ज़  ’आनन’ भर रहे
एक पल की जो हुई थी ग़लतियाँ

-आनन्द.पाठक-
[सं 09-04-19]