शुक्रवार, 21 जून 2019

ग़ज़ल 122[50 A] :हुस्न हर उम्र में जवाँ देखा

ग़ज़ल 122[50 A]  -ओके

2122--1212---22

हुस्न हर उम्र में जवाँ देखा
इश्क़ हर मोड़ पे अयाँ देखा


एक चेहरा जो दिल में उतरा है
वो ही दिखता
जहाँ जहाँ देखा

इश्क़ तो शै नहीं तिजारत की
आप ने क्यों नफ़ा ज़ियाँ देखा ?

और क्या देखना रहा बाक़ी
तेरी आँखों में दो जहाँ देखा

बज़्म में थे सभी ,मगर किसने
दिल का उठता हुआ धुआँ देखा ?

हुस्न वालों की बेरुख़ी  देखी
इश्क़ वालों  को लाम
काँ देखा

सर ब सजदा हुआ वहीं ’आनन’
दूर से उनका आस्ताँ देखा


-आनन्द पाठक-

सोमवार, 17 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 005

चन्द माहिए : क़िस्त 005 ओके

:1:
जब बात निकल जाती
लाख जतन कर लो
फिर लौट के कब आती ?

:2:

उनकी  ये अदा कैसी ?
ख़ुद से छुपते हैं
देखी न सुनी ऐसी

:3:

ऐसे न चलो ,हमदम !
लहरा कर जुल्फ़ें
आवारा है मौसम

:4:

माना कि सफ़र मुश्किल
होता है आसां
मिलता जब  दिल से दिल

:5:

 जब क़ैद ज़ुबां होती
बेबस आँखें तब
अन्दाज़-ए-बयां होती


-आनन्द.पाठक-
[सं0 15-06-18]


 
इन माहियों को सुनें डा0 अर्चना पाण्डेय ’अर्चना’ के स्वर में



शनिवार, 15 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 59

चन्द माहिया : क़िस्त 59 ओके

:1:
सब क़स्में खाते हैं
कौन निभाता है
कहने की बाते हैं

:2:

क्या हुस्न निखारा है
जब से डूबा मन
उबरा न दुबारा है

:3:
इतना न सता माहिया
क्या थी ख़ता मेरी
इतना तो बता माहिया

:4:
बेदाग़ चुनरिया में
दाग़ लगा बैठे
आकर इस दुनिया में

:5:
क्या दर्द बताना है
एक तेरा ग़म है
इक दर्द-ए-जमाना है


-आनन्द.पाठक-