बुधवार, 14 जुलाई 2021

ग़ज़ल 183 : सौगंध संविधान की --

 ग़ज़ल 183: सौगंध संविधान की

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सौगंध  संविधान की खाता है आजकल
’जयचन्द’ से भी हाथ मिलाता है आजकल

नाकामियों का ठीकरा औरो पे फोड़ता
मासूम सी वह शक्ल बनाता है आजकल

जब बाजुओं पे उसको भरोसा नहीं रहा
’तोते’ को अपना हाथ दिखाता है आजकल

नाआशना वो इश्क से ,महरूम प्यार से
नफ़रत जगा के आग लगाता है आजकल

वह दिन हवा हुए कि चमन में बहार थी
पंछी भी कोई अब नहीं गाता है आजकल

करता है संविधान की बातें बड़ी बड़ी
अब नाख़ुदा भी नाव डुबाता है आजकल

दुनिया की बात और है ’आनन’ की बात और
अपनी वो राह खुद ही बनाता है आजकल


-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 13 जुलाई 2021

ग़ज़ल 182 : जब ’हाँ ” में "हाँ ’ किया तो--

 ग़ज़ल 182

221---2121---1212---212


जब ’हां’ में ’हाँ’ किया तो रफ़ाकत समझ लिया
हिम्मत से ’ना’ कहा तो बग़ावत  समझ लिया

आतिश ज़बान, सोच में बारूद है भरा
सरकश हुआ तो ख़ुद को क़यामत समझ लिया

हालात ज़िन्दगी का  बताने गया उसे
अपने ख़िलाफ़ उसने शिकायत  समझ लिया

नेता नया नया है सियासत की बात है 
ख़िदमत ग़रीब का भी तिजारत समझ लिया

जादूगरी थी उसकी ,दलाइल भी बाकमाल
उसके फ़रेब को भी ज़हानत समझ लिया

यह बेबसी की इब्तिदा या इन्तिहा कहें ?
’साहब’ के वह सितम को इनायत समझ लिया

’आनन’ अजीब दौर है लोगों को क्या कहें
जाहिल की बात हर्फ़-ए-जमानत समझ लिया

-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 10 जुलाई 2021

ग़ज़ल 181 : रिश्तों की बात कौन ---

 ग़ज़ल 181
221---2121---1221---212

रिश्तों की बात कौन निभाता है आजकल 
वह बेग़रज़ न हाथ मिलाता  है आजकल

यह और बात है उसे सुनता न हो कोई
फिर भी वो मन की बात सुनाता है आजकल

कहना तो चाहता था मगर कह नहीं सका
कोई तो दर्द है ,वो छुपाता  है आजकल

लोगों के अब तो तौर-तरीक़े बदल गए
किस दौर की तू बात सुनाता है आजकल 

मौसम चुनाव का अभी आने को है इधर
वह ख़्वाब रोज़-रोज़  दिखाता है आजकल

सच बोल कर भी देख लिया ,क्या उसे मिला ?
वह झूठ की दुकान चलाता है आजकल 

’आनन’ बदल सका न ज़माने के साथ साथ
आदर्श का वो कर्ज़ चुकाता है आजकल ।

-आनन्द पाठक-