रविवार, 2 मार्च 2025

ग़ज़ल 431 [05- G] : दौलत की भूख ने तुम्हे


ग़ज़ल 431[05-G]

2212---1212--2212---12


दौलत की भूख ने तुम्हे अंधा बना दिया
इस दौड़ में सुकून भी तुमने लुटा दिया

दो-चार बस फ़ुज़ूल इनामात क्या मिले
दस्तार को भी शौक़ से तुमने  गिरा दिया

इल्म.ओ.अदब की रोशनी चुभने लगी उसे
जलता हुआ चिराग़ भी उस ने बुझा दिया

लहजे में अब है तल्ख़ियाँ, लज़्ज़त नहीं रही
आदाब.ओ.तर्बियत मियाँ! तुमने भुला दिया

सत्ता ने चन्द आप को अलक़ाब क्या दिए
अपनी क़लम को आप ने गूँगा बना दिया

कुछ लोग थे कि राह में काँटे बिछा गए
कुछ लोग हैं कि राह से पत्थर हटा दिया

’आनन’ अजीब हाल है लोगों को क्या कहें
था शे’र और का, मगर अपना बता दिया।


-आनन्द.पाठक-

इस ग़ज़ल को श्री विनोद कुमार उपाध्याय [ लखनऊ] जी ने मेरी एक ग़ज़ल को बड़े ही दिलकश अंदाज़ में अपना स्वर दिया है आप भी सुनें। लिंक पर क्लिक करें और आनन्द उठाएँ


https://www.facebook.com/watch/?v=503360932825231&rdid=yXGK9YMOhcYihyGL


ग़ज़ल 432 [ 06-G ] सच तो कुछ और था-

 ग़ज़ल 432 [06-G)सच तो कुछ और था

2212---1212---2212---12

सच तो कुछ और था मगर तुमने घुमा दिया
चेहरे के रंग ने मुझे  सब कुछ बता दिया ।

देता भी क्या जवाब मैं तुझको, ऎ ज़िंदगी !
तेरे सवाल ने मुझे अब तो थका दिया ।

वैसे तुम्हारे शौक़ में शामिल तो ये न था
देखा कहीं जो बुतकदा तो सर झुका दिया

इतना भी तो सरल न था दर्या का रास्ता
पत्थर को काट काट के रस्ता बना दिया

क्या क्या न हादिसे हुए थे राह-ए-इश्क़ में
करता भी याद कर के क्या सबको भुला दिया

सुनने को दास्तान था तेरी जुबान से
तूने कहाँ से ग़ैर का किस्सा सुना दिया

कुछ शर्त ज़िंदगी की थी हर बार सामने
हर बार शर्त रो के या गा कर निभा दिया ।

क्यों पूछती हैं बिजलियाँ घर का मेरे, पता
’आनन’ का यह मकान है, किसने बता दिया?


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

बुतकदा =मंदिर


शनिवार, 1 मार्च 2025

अनुभूतियाँ 174/61

 अनुभूतियाँ 174/61
693
शायद मैने ही देरी की
अपनी बात बताने में कुछ
बरसोंं लग जाएंगे शायद
दिल की चाह जताने में कुछ।

694
जब जब दूर गई तू मुझसे
कितने गीत रचे यादों में
ढूँढा करता हूँ सच्चाई
तेरे उन झूठे वादों में ।  

695
दोष किसी को क्या देता मैं
सब अपने कर्मों का फल है
सबको मिलता है उतना ही
 जिसका जितना भाग्य प्रबल है।

696
प्रेम चुनरिया मैने रँग दी,
बाक़ी जो है तुम भर देना।
आजीवन बस रँगी रहूँ मैं,
प्रीति अमर मेरी कर देना ।
-आनन्द पाठक-