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शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

गीत 023 : जिसने मुझे बनाया ....[भाग01]

एक गीत  023: जिसने मुझे बनाया ........


जिसने मुझे बनाया ,उसका ही गीत गाया
दरबारियों की आगे कभी सर नही झुकाया

दुनिया ने मुझसे चाहा दिल वो ग़ज़ल सुनाए
तिरी नील-झील आँखें दिल डूब -डूब जाए
कैसे उन्हें भुला दूँ दो रोटियों के बदले
मासूम नन्हीं बच्ची बाजार बेंच आए

दो दिल के बीच में जो दीवार नफ़रती थी
इल्जाम सर पे मेरे मैं क्यों गिरा कर आया

सपने दिखा दिखा कर पहुँचा वह ’राजपथ’ पर
अब सो गया है ’बुधना’ सब देख देख थक कर
उसका हुनर तरीका जादू से कम नहीं है
ख़ुद काँच के मकां में ,औ" दूसरों पे पत्थर

वह भोर होते होते मिरा घर जला चुकेगा
कल शाम जिसकी हाथों देकर चिराग आया

उसको भरम यही है ,मुट्ठी में है ज़माना
"एकोऽहम" के आगे किसी और को न माना
चाँदी की तश्तरी में सोने की लेखनी ले
क्या चाहता है मुझसे क्या चाहता लिखाना ?

जिन पत्थरों के दिल में कहीं निर्झरी नहीं थी
उन पत्थरों के आगे दुखड़ा नहीं सुनाया

-आनन्द पाठक ’आनन’-
880092 7181



2 टिप्‍पणियां:

  1. उसको भरम यही है ,मुट्ठी में है ज़माना
    "एकोऽहम" के आगे किसी और को न माना
    चाँदी की तश्तरी में सोने की लेखनी ले
    क्या चाहता है मुझसे क्या चाहता लिखाना ?

    जिन पत्थरों के दिल में कहीं निर्झरी नहीं थी
    उन पत्थरों के आगे दुखड़ा नहीं सुनाया

    PATHAK JI BAHUT HI ACHCHI LAGI AAPKI YE RACHNA, BADHAAI SWEEKAREN.

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  2. आ० योगेश जी
    उत्साह वर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
    सादर
    -आनन्द.पाठक

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