गीत 051
जीवन के सुबह की --यह एक युगल गीत :किसकी यह पाती है-----
[ बचपन की प्रीति जब बड़ी हो गई,
दुनिया की रस्म ,रिवायात खड़ी हो गईं।
हालात ऐसे की परवान न चढ़ सकीं ।
जीवन के सुबह की एक लिखी हुई पाती ,जीवन के शाम में मिलती गुमनाम ।
जीवन के सारे घटनाक्रम स्मृति पटल पर किसी चलचित्र की भाँति उभरते गए-
---। उस पाती में कुछ बातें नायक ने कही---कुछ नायिका ने कही।
आप स्वयं समझ जायेंगे।
गीत 051
जीवन की सुबह की लिखी हुई पाती
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम।
पूछा है जो तुमने मईया का हाल
खाँसी कमजोरी से रहती बेहाल
लगता है आँखों मे है मोतियाबिन
छोड़ो, तुम्हारी कैसी है ससुराल ।
तीरथ पे जाने की हठ करती रहती
पकड़ी हैं खटिया औ’ लेती हरिनाम
मईया से कहना कि ’मुनिया’ भली
दूधो नहाई है और पूतो फली
सासू बनाने की चाहत थी मन में
”विधना’ के आगे है किसकी चली ।
अगले जनम की क्या बातें अभी से
मईया से कह देना हमरा परनाम ।
अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपने की यादे वो कागज की नाव
बाँधे थे मिल कर जो मन्नत के धागे
अब भी क्या पड़ती है पीपल की छाँव
सावन के झूलों की यादें सताती
अब भी क्या लिख लिख मिटाती हो नाम ।
सुनती हूँ लाए हो अँग्रेजी गोरन
”इंगलिश’ में गिट-पिट औ’ चलती है बन-ठन
’बंदर’ की गरदन में मोती की माला
हाथी’ की गरदन में ’बिल्ली’ की लटकन
हट ”पगली’! काहे को छेड़े है आज
अच्छा है तुमने जो लिक्खा नहीं नाम
छोड़ो सब बातें, सुनाओ कुछ अपनी
कैसे हैं’वो’ और बहुएँ है कितनी ?
नाती और पोतो को दादी के किस्से
सुनाना तो सब कुछ, सुनाना न अपनी।
पोतों संग गुजरेगी बाक़ी उमरिया
बहुएँ है खाने लगी फिर कच्चे आम
रखना इस जाड़े में अपना ख़याल
फिर ना पकड़ लेना खटिया इस साल
मिलने से अच्छा है मिलने की चाहत
फिर काहे रखते हो दिल में मलाल
सुनती हो पीने लगे फिर सुबह शाम
पीने का होता कब अच्छा परिणाम
अपनी इस ’मुनिया’ को जाना तुम भूल
जैसे कि थी कोई आकाशी फूल
अपना जो समझो तो कर देना माफ़
जाने अनजाने गर हो गई हो चूक
दो दिल जब हँस मिल के गाते है गीत
दुनिया तो करती ही रहती बदनाम
धत पगली !अईसा भी होता है क्या
बचपन की प्रीति कोई खोता है क्या
साँसों में घुल जाता है पहला प्यार
प्राणों से पहले निकलता है क्या
इस पथ के राही को मालूम है खूब
मर मर के जीना औ’ चलना है काम ।
जीवन की सुबह की लिखी हुई पाती
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम
-आनन्द पाठक’आनन’-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें