माहिए ; क़िस्त 029 ओके
:1:
दीवार उठाते हो
तनहा जब होते
फिर क्यूँ घबराते हो
:2:
इतना भी सताना क्या
दम ही निकल जाए
फिर बाद में आना क्या
:3;
ये हुस्न की रानाई
तड़पेगी यूं ही
गर हो न पज़ीराई
:4:
दुनिया के सारे ग़म
इश्क़ में ढल जाए
बदलेगा तब मौसम
;5;
क्या हाल बताना है
तेरे फ़साने में
मेरा भी फ़साना है
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
:1:
दीवार उठाते हो
तनहा जब होते
फिर क्यूँ घबराते हो
:2:
इतना भी सताना क्या
दम ही निकल जाए
फिर बाद में आना क्या
:3;
ये हुस्न की रानाई
तड़पेगी यूं ही
गर हो न पज़ीराई
:4:
दुनिया के सारे ग़म
इश्क़ में ढल जाए
बदलेगा तब मौसम
;5;
क्या हाल बताना है
तेरे फ़साने में
मेरा भी फ़साना है
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181
शब्दार्थ
रानाई = सौन्दर्य
पज़ीराई= प्रशंसा
शब्दार्थ
रानाई = सौन्दर्य
पज़ीराई= प्रशंसा
आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (19.02.2016) को वैकल्पिक चर्चा मंच अंक-3)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।
जवाब देंहटाएंआपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (19.02.2016) को "सफर रुक सकता नहीं " (चर्चा अंक-2257)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।
जवाब देंहटाएंकृपया,पहली सूचना को अनदेखा करें।
dhanyavaad aap ka
जवाब देंहटाएं-anand.pathak
बेहतरीन अभिव्यक्ति.....बहुत बहुत बधाई.....
जवाब देंहटाएंआ0 चतुर्वेदी जी
जवाब देंहटाएंसराहना हेतु आप का बहुत बहुत धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक