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मंगलवार, 18 जनवरी 2022

कविता 013 : मैं हूँ , मेरे मन के अन्दर

  कविता 013 


मैं हूँ 
मेरे  मन के अन्दर 
गंगा जी की निर्मल धारा
मन उँजियारा
शंखनाद से पूजन अर्चन
सुबह-शाम की भव्य आरती
चलता रहता भगवत कीर्तन
मन मेरा है सुबह-ए-बनारस
क्षमा दया और करुणा रस

मैं हूँ 
मेरे मन के अन्दर 
कहीं खनकती 
पायल-घुँघरु की झंकारें 
गजरे की ख़ुशबू
मुझे पुकारें
महफ़िल सजती 
हुस्न-ओ-अदा जब नाज़नीन की
जादू करती
रंग महल में ताता-थैय्या .रूप , रुपैय्या
तब मेरा दिल शाम-ए-अवध है

मैं हूँ 
मेरे मन के अन्दर
खिचीं मुठ्ठियाँ इन्क़्लाब की
तेज़ रोशनी आफ़ताब की
कहीं दहकते दिल में शोले
कहीं चाँदनी माहताब की
मन के अन्दर राम बसे है
मन में ही रावन बसता है

इस मन में ही कृष्ण कन्हैया
 इक कोने में 
"कंस’ खड़ा हो कर हँसता है
यह सब हैं तेरे भी अन्दर
किसे बसाना ,किसे मिटाना
तुझको ही यह तय करना 
कौन राह  तुझको चलना 


-आनन्द,पाठक-



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