अनुभूतियाँ : क़िस्त 015 57 कितनी दूर चलेंगे हम तुम सपनों की झूठी छाया में जीवन है इक सख़्त हक़ीक़त कब तक जीना इस माया में । 58 यक्ष ने क्या क्या और कहा था मेघ ! तुम्हें वह दूत बना कर ? तुम भी मेरी पाषाणी को हाल बताना बढ़ा-चढ़ा कर । 59 मेघ ! ज़रा यह भी बतलाना क्या वो मिली थी तुम से आकर? हाल सुनी तो क्या क्या बोली ? भाग गई या आँख चुरा कर ? 60 अगर तुम्हें लगता हो ऐसा साथ छोड़ना ही अच्छा है मिला तुम्हें हमराह नया जो मुझसे क्या ज़्यादा सच्चा है? x
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