अनुभूतियाँ : क़िस्त 018 ओके 69 वह निर्णय था स्वयं तुम्हारा ग़लत किया या सही किया था अब पछताने से क्या होगा दिल ने तुम से, सही कहा था । 70 इतना कर न भरोसा, पगले ! उड़ते बादल का न ठिकाना आज यहाँ, कल और कहीं हो उसको क्या हमराज़ बनाना । 71 झूठे सपने मत देखा कर इन आँखों से जगते-सोते तू भी जान रहा है, प्यारे! सपने हैं ,कब पूरे होते । 72 छुप छुप कर बातें करतीं थी यादें तेरी तनहाई में कितने स्वप्न बुना करती थी जीवन की नव तरूणाई में । x
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