अनुभूतियाँ : क़िस्त 036 ओके 141 जो कुछ भी था पास हमारे किया समर्पित तुम को मन से, क्यों अर्पण स्वीकार नहीं था ? रही शिकायत क्या पूजन से ? 142 भाव नही जब समझा तुमने और न समझी दिल की सीरत, उपहारों में देखी तुमने उपहारों की क्या है कीमत ? 143 पीछे मुड़ कर क्या देखूँ मैं बीत गया सो बीत गया अब आशाओं की किरण सामने राग नया है, गीत नया अब । 144 चाहत को, एहसास, प्यार को तुमने एक दिखावा समझा विकल हॄदय के आर्तनाद को तुमने एक छलावासमझा । -आनन्द.पाठक- x
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