अनुभूतियाँ 103 ओके 409 " कैसे हो,जी!
कैसे हो, जी ! " और न फिर कुछ बातें करना हर दिन तुमको क्या यह सूझी ? 410 ’तालिबानी’-सोच भरा है कुछ लोगों के मन के अन्दर, नाम भले हों ऊँचे-ऊँचे काम से लेकिन हैं बौने भर । 411 नावाक़िफ़ हो, कैसे कह दूँ , इतनी तो नादान नहीं तुम, प्यार मुहब्ब्त की बातों से इतनी भी अनजान नहीं तुम । 412 कलियाँ झूम रही गुलशन में बागबान की बुरी नज़र है, इक दिन चुन कर ले जायेगा कलियों को कब कहाँ ख़बर है? x
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें