अनुभूतियाँ : क़िस्त 105 ओके 417 इधर उधर की बातें क्यों तुम करती रहती घुमा फिरा कर, क्यों मुझको भरमाती रहती झूठी मूठी बात बना कर । 418 नज़र झुका कर फिर न उठाना मुझको काफी एक इशारा , दिल की बात अगर मैं कह दूँ तुम को शायद हो न गवारा । 419 छू कर आतीं मृदुल हवाएँ जब जब तेरा कोरा आँचल, रोम-रोम
तब खिल उठता है मन मेरा हो जाता पागल । 420 सच है कि वो नज़र न आता होने का एहसास है लेकिन , शीतल मन्द सुगन्ध हवा-सी पास सदा रहता है लेकिन । x
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