अनुभूतियाँ 125/क़िस्त 12 497 जीवन है सौग़ात किसी की जब तक जीना, हँस कर जीना बात बात पर रोना क्या है हर पल आँसू क्यों है पीना 498 देख सुबह की नव किरणों को आशाएँ लेकर आती हैं शीतल मन्द सुगन्ध हवाएँ नई चेतना भर जाती हैं 499 कण कण में है झलक उसी की अगर देखना चाहो जो तुम वरना सब बेकार की बातें नहीं समझना चाहो जो तुम 500 रोज़ शाम ढलते ही छत पर एक दिया रख आ जाती हूं~ लौटोगे तुम इसी राह से सोच सोच कर हुलसाती हूं~ x
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