अनुभूतियाँ 045 ओके 177 नहीं इनायत रही तुम्हारी फूल सूखने लगे चमन के, पहले वाली बात नहीं अब फूल महकते थे जब मन के । 178 सावन की रिमझिम बूँदे अब तन में रह रह आग लगाती, विगत बरस हम तुम झूले थे, याद मुझे इस बार झुलाती । 179 दिल पर तुम क्यों ले लेती हो दुनिया वालों की बातों को , उन को तो बस काम यही है तुम क्यों जगती हो रातों को । 180 झूठ इसे मैं कैसे मानूँ आँखों देखी सब बातें हैं । तेरे आँचल में खुशियाँ है मुझको ग़म की सौगाते हैं । x
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