अनुभूतिया 059 ओके 233 चाँद सदा चमका करता है सूरज की किरनों के दम से, भला चमकता तुम बिन कैसे मन मेरा सब झूठ भरम से ? 234 सफ़र क़लम का चलता रहता सुख मे, दुख में, जुल्म-सितम में। अँधियारों से लड़ना है तो नई रोशनी भरो क़लम में । 235 दर्द छुपा कर हँसना तुम ने सीखा कहाँ, बता दो हमदम ! लाख छुपाना मैं भी चाहूँ पढ़ लेती हो कैसे ,प्रियतम ! 236 यही हुनर मै सीख न पाया वादा करना और न आना , दिलकश लगता मुझे तुम्हारा हँस कर करना रोज़ बहाना । x
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