अनुभूतियाँ : क़िस्त 067 ओके 265 दर्द सुनाऊँ आह भरूँ तो दीवारें सब सुना करेंगी अगर बुलाऊँ शिद्दत से तो तसवीरें सब बोल उठेंगी 266 ना देना था, ना तुम देती लेकिन उल्का-तीर
न देती, तोड़ दिया जब एक
भरोसा हँस कर पाहन-पीर
न देती । 267 रूप तुम्हारा क्या है, सुमुखी ! सच के ऊपर झूठ का परदा, इक दिन इसको ढल जाना है मन फिर हाथ रहेगा मलता । 268 कुछ तो रही शिकायत तुम से कुछ अपने ग़म का रोना था, दुनिया को मैं क्या बतलाता जो होना था, वह होना था । x
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