अनुभूतियाँ : क़िस्त 092 ओके 365 तर्क तुम्हारा अपना होगा मिरी सफ़ाई कम तो नहीं थी , बात नहीं कुछ सुननी मेरी वरना दुहाई कम तो नहीं थी । 366 एक
कल्पना थी कि हक़ीक़त सच
क्या था मालूम नहीं है, इतना
पता मुझे है लेकिन वह
इतनी मासूम नहीं है । 367 एक झलक ही देखा था बस देखा नहीं नज़र भर उसको कौन थी वह? जो दीवाना ्मैं ढूँढ रहा जीवन भर उसको। 368 एक
याचना रही तुम्हारी मैं
ही था कुछ दे न सका था, शुष्क
रेत की एक नदी थी नाव
मैं अपनी खे न सका था । x
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें