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सोमवार, 29 जुलाई 2024

कविता 022: हम भारत की---


 कविता  022 : हम भारत की--


हम भारत की विपुल संपदा

हम भारत की जनता

जहाँ विविधता में एकता।

सत्य अहिंसा के अनुगामी


संस्कृति मे हम बहुआयामी

प्रेम, दया , करूणा के द्योतक

दान, क्षमा, के हैं हम पोषक

विश्वगुरु के हम उदघोषक

हमी सनातन

जिसका रज कण भी चन्दन

भारत माँ की सतत वंदना

भारत माँ को सतत नमन ।


-आनन्द.पाठक ’आनन’-



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