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मंगलवार, 10 सितंबर 2024

कविता 027: सूरज निकले उससे पहले--

  कविता 027: सूरज निकले उस से पहले--


सूरज निकले उससे पहले

या डूबे तो बाद में उसके

रोज़ हज़ारों क़दम निकलते

कुआँ खोदने पानी पीने

तिल तिल कर वो मरने ,जीने

साँस साँस को गिरवी रखने

सबकी अपनी अलग व्यथा है

महानगर की यही कथा है ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181



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