अनुभूतियाँ 168/55 669 मुक्त हंसी जब हँसती हो तुम हँस उठता है उपवन मधुवन कोयल भी गाने लगती है और हवाएँ छेड़े सरगम । 670 मछली जाल बचा कर निकले लेकिन कब तक बच पाती है प्यास अगर दिल में जग जाए स्वयं जाल में फँस जाती है । 671 अवसरवादी लोग जहाँ हों ढूँढा करते रहते अवसर स्वार्थ प्रबल उनके हो जाते धोखा देते रह्ते अकसर 672 कितनी बार लड़े, झगड़े हम रूठे और मनाए भी हैं । विरह वेदना में रोए तो गीत खुशी के गाए भी हैं। -आनन्द.पाठक-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें