मुक्तक 22
;1;
मजदूरों की बस्ती साहिब
जान यहाँ है सस्ती साहिब
जब चाहे आकर उजाड़ दें
’बुधना’ की गृहस्थी साहिब।
:2:[26 जनवरी]
यह अपना भारत है महान
झंडे की अपनी आन-बान
शुचिता बस इसकी बनी रहे
शुचिता बस इसकी बनी रहे
पावन है अपना संविधान ।
गणतन्त्र दिवस.गणतन्त्र दिवस।
:3:
मौसम है रंगों का
होली में चले आना
है प्रेमअगर पावन
है प्रेमअगर पावन
इस दिल में ’बरसाना’
:4:
:4:
मौसम है बहारों का
मस्ती भी नहीं कुछ कम
मस्ती भी नहीं कुछ कम
अब छोड़ गिला शिकवा
लग आज गले हमदम !
लग आज गले हमदम !
-आनन्द पाठक ’आनन’
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें