रिपोर्ताज

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

ग़ज़ल 460 [34-जी] : उसके ज़ौर-ओ-ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं

 ग़ज़ल 460 [34-जी]  : उसके ज़ौर-ओ-ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं

212---212---212--212

उसके ज़ौर--ज़फ़ा में वो शिद्दत नहीं ,
क्यों न समझूँ कि अब वो मुहब्बत नहीं ।

ज़िंदगी है अगर ,दिल तो ज़िंदा रखो ,
साँस लेना ही कोई अलामत नहीं ।

एक चेहरे पे चेहरे कई रंग के ,
आदमी में बची अब शराफ़त नहीं ।

पहले जैसी इनायत नहीं आप की
वो नवाज़िश नहीं , वो क़राबत नहीं ।

सबको मालूम है राज़ क्या, बात क्या ,
कह रहें आप जो वह हक़ीक़त नहीं ।

छोड़िए अब सफ़ाई में क्या है रखा
आप ने जो किया वो रफ़ाक़त नहीं ।

तुम भी ’आनन’ ज़ुबाँ से पलटने लगे
ऐसी कोई तुम्हारी थी आदत नहीं ।

-आनन्द पाठक ’आनन’




मंगलवार, 20 जनवरी 2026

"वह दिन" [उपन्यास]--एक समीक्षा--लेखक संजीव गुप्त




 "वह दिन" [उपन्यास]--एक समीक्षा

 

लेखक : संजीव गुप्ता

समीक्षक ; आनन्द पाठक ’आनन’

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पिछले वर्ष ,नवम्बर 2025 में, मैं अपने गॄह जिला ग़ाज़ीपुर [उ0प्र0] गया था संयोगवश उन्हीं दिनों ’ग़ाज़ीपुर लिटरेचर फ़ेस्टीवल’ भी चल रहा था। उसी दौरान स्थानीय साहित्यकारों से/साहित्यप्रेमियों से/ साहित्यानुरागियों से भी मुलाकात हुई  और कुछ साहित्यिक चर्चा भी चली । उन्ही साहित्यकारों में एक थे-श्री संजीव गुप्ता जी।

 संजीव गुप्ता जी कई किताबें लिख चुके है और किताबें चर्चित भी हो चुकी हैं।

उन्होने अपनी 4-किताबें  बड़े ही प्रेम से मुझे सादर भेंट की।

1-आवा गावल जाय [ भोजपुरी गीत संग्रह]

2-मेरे शहर में [व्यंग्य संग्र्ह]

3-वह दिन [ उपन्यास]

4-भोजपुरी कहावतों की दुनिया

उनका उपन्यास- ’ वह दिन’ - आद्योपान्त पढ़ा जिस पर अपने कुछ विचार यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ।

इस उपन्यास पर आ0 डा0 विवेकी राय जी, पहले ही अपने विचार व्यक्त कर चुके है है। जो हिंदी और भोजपुरी साहित्य के प्रेमी है और आंचलिक साहित्य से परिचित है [विशेषत: पूर्वांचल के] उन्हें विवेकी राय जी के बारे में बताने की कुछ ज़रूरत नही’।संभव हुआ तो कालान्तर में  [स्व0] विवेकी राय जी अपना एक संस्मरण लिखूँगा।

इस उपन्यास के बारे मे विवेकी राय जी लिखते हैं--

-[वह दिन] एक ऐसी कथा जिसमें जमींदार का शोषक-उत्पीड़क रूप नहीं ,एक महान सहॄदय उदार और ग़रीब परवर जैसा चित्र सामने आता है।--- आरम्भ में आप को ’परती परिकथा 1’ की कथा में चित्रित एक अच्छा जमींदार मिलेगा  तो अंत में ’आधा गाँव 2’ की भाँति जमींदारी टूटने के बाद वाला विक्षिप्त जमींदार मिलेगा।    

     संजीव गुप्ता जी के बारे में कुछ ज़ियादा कहने की ज़रूरत नहीं । उनका परिचय फ़्लैप पर दिया हुआ है। आप पढ़ सकते हैं।संक्षेप में बस इतना ही कि गुप्ता जी के अन्दर कई संजीव गुप्ता है। वह एक साथ एक लेखक ,एक इंजीनियर,एक बिजनेस मैन, एक समर्पित समाजसेवी, एक साहित्यानुरागी और सबसे बढ़ कर एक सहृदय सज्जन और प्रेमी आदमी हैं।

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 "वह दिन"-[उपन्यास]

-संजीव गुप्ता जी का यह एक चर्चित उपन्यास है जो  ग़ाज़ीपुर के ही एक गाँव के एक अति ग़रीब परिवार के बालक ’रामू’ की कथा और तत्कालीन स्थानीय जमीदार बैकुंठ राय जी की कथा  और उस समय के ब्रिटिश राज की कथा के आस पास घूमती है। उपन्यास का कथानक, भारत की स्वतन्त्रता 1947 के पहले जब ज़मींदारी प्रथा थी , अंग्रेजी शासन था से शुरु होकर, भारत की स्वतन्त्रता  प्राप्ति और जमींदारी प्रथा समाप्ति तक की है । इस अन्तराल में कालचक्र कैसे कैसे करवट बदलता रहा, कैसे एक ग़रीब लड़का रामू, रामू से-रामाधार मास्टर बन कर आत्मसुख को प्राप्त हुआ। साथ ही  समय चक्र के निर्मम प्रभाव से जमींदार श्री बैकुंठ राय जी शनै: शनै:  विलुप्त होते गए।

कथानक तो बस इतना ही है। मगर--

संजीव जी ने उस कालखंड का इतना बारीक़ से चित्रण किया है कि पाठको को बाँध कर रखता है और अन्त तक इसे पढ़ने को विवश करता है। इस कथा में, उस समय के गाँव के हालात, ग़रीबी की मार, सामाजिक दुर्दशा , जमींदार का वैभव, लगान वसूली, अंग्रेजी राज का ख़ौफ़गाँधी जी का आन्दोलन और लोगों का उससे जुड़ना, उस समय का”अकाल’, गाँव की सामाजिक स्थिति त्यौहार, परम्परा, शादी विवाह पारम्परिक लोकगीतआदि का संजीव जी ने इतना सजीव चित्रण किया है कि अगर पाठक एक बार इसे पढ़ना शुरु करता है  तो  एक साँस में अन्त तक पढ़ने की उत्कंठा बनी रहती है।

इस उपन्यास में गुप्ता जी ने जिला ग़ाज़ीपुर के कुछ छुपे हुए रहस्य पर, अनछुए तथ्यों पर, इतिहास पर भी प्रकाश डाला है जिससे ग़ाजीपुर की ही आज की पीढ़ी संभवत: अनजान ही होगी।उपन्यासकार ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि पात्रों के कथन वाचन प्रतिवाचन स्थानीय लोकभाषा [जो मेरी भी भाषा है] में ही रखा जो इस उपन्यास में चार चाँद  लगा देती है}रोचक बना देती है।

होनहार बिरवान के होत चिकने पात ।रामू गाँव का एक ही ग़रीब और साधन विहीन लड़का था। अगर ग़रीब की प्रतिभा को सही वक़्त पर सही सहारा ,अवलम्बन मिल जाए तो वक़्त आने पर प्रतिभा ज़रूर निखरती है और रामू कैसे अपने इसी प्रतिभा के बल पर उसी स्कूल में अध्यापक बन जाता है जो बचपन में उसी स्कूल में पढ़ने का सपना था और अपने जैसे सैकड़ॊ ”रामू’को "राम आधार ’ बनाने के इच्छा थी। उसका मिशन था।

कुल मिला कर ;वह दिन ; उपन्यास एक अत्यन्त रोचक सार्थक पठनीय संग्रहणीय उपन्यास है-जिसके लिए संजीव जी बधाई के पात्र है । यह उपन्यास और चर्चित हो इसी शुभकामना के साथ।


पुस्तक : 140 पृष्ठों की [सजिल्द]
मूल्य :--295
प्रकाशक : विजया बुक्स
1/10753 सुभाष पार्क, गली नं0 3
नवीन शाहदरा, नई दिल्ली 110031
फोन 011-22822514 , 99101 89445
Email : vijyabooks@gmail.com


लेखक से सम्पर्क सूत्र: 

संजीव गुप्त

एलिगेन्ट अप्लायेन्सेज, कचहरी रोड, गाज़ीपुर [उ0 प्र0

233001
फ़ोन 0548-2221803 / 099849 10999


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1-परती परिकथा = फ़णीश्वर नाथ रेणु जी एक आंचलिक उपन्यास

2-आधा गाँव    = राही मासूम रज़ा का बहुचर्चित उपन्यास


शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

गीत 094: 26-जनवरी गणतन्त्र दिवस

 26 जनवरी-गणतन्त्र दिवस

है मुक्त गगन, अपना विहान,
भरते रहते नित नव उड़ान ,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।

 हम नई चेतना के वाहक,
हम विश्व शान्ति के पोषक हैं
हम संविधान के निर्माता,
हम संविधान के रक्षक हैं ।

पावन है अपना संविधान,
 सबसे न्यारा सबसे महान ,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।--

जन जन की आशा का प्रतीक,
बहती विकास की धारा है
सबके इसमे अपने सपने,
यह भारत देश हमारा  है ।

भारत की रख्खे आन-बान,
नित रचा करे नव कीर्तिमान,गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।---

उत्तर से लेकर दक्षिण तक,
पूरब से लेकर पश्चिम तक 
हम एक सूत्र में बँधे हुए,
अग्रिम से लेकर अन्तिम तक

नारों से गूँजे आसमान,
जय ’जय जवान’ जय  ’जय किसान, गणतन्त्र दिवस, गणतन्त्र दिवस।

-आनन्द.पाठक ’आनन’

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

अनुभूतियाँ 191/78

अनुभूतियाँ 191/78

:1:
दिल से जब दिल बातें करता
फिर काहे की पर्दादारी ।
दुनिया वाले करा करेंगे
दिल पर कब  तक पहरेदारी।

:2:
मेरी सीधी सच्ची बातें
क्यों तुमको लगती हैं झूठी
ग़ैरों की बातों में आकर
क्यों रहती हो रूठी रूठी ।

:3:
वादे तो सब ही करते हैं
साथ निभाने का जीवन भर
मतलब जब  पूरा हो जाता
नहीं देखते फिर वो मुड़ कर।

रविवार, 11 जनवरी 2026

अनुभूतियाँ 190 /77

अनुभूतियाँ 190/77 

:1: 
उतर गया हो मन से कोई
कैसे मन में उसे बसाऊँ ।
टूट गया जब दिल  ही मेरा
प्रेम गीत कैसे मैं गाऊँ ।

:2:
लोग हमे समझाने आए
जो ख़ुद ही ग़म के मारे हैं।
मुझे सहारा क्या वों देंगे
जीवन से ख़ुद हारा हो ।

:3:
सुना रहा हूँ कब से तुमको
बातें अपनी कही, अनकही
जो कहना था कह न सका मैं
दिल की दिल में दबी रह गई ।

:4:
सब अपने अपने मतलब से
मीठी मीठी बातें करते
जब भी उनको अवसर मिलता
छुप छुप कर करते हैं घातें

-आनन्द पाठक 'आनन'


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ग़ज़ल 459[ 33-जी ] : उतर जाए खुमार.ए.इश्क़ गर तो --

         ग़ज़ल 459 [ 33-जी]
1222---1222----1222----1222


उतर जाए ख़ुमार.ए.इश्क़ गर तो फिर नशा क्या है !
मुहब्बत में अगर तड़पे न दिल तो फिर मज़ा क्या है।

तुम्हे मालूम है सब कुछ हमारी आरज़ू , हसरत
 निगाह.ए.शौक़ से ज़ाहिर, छुपाने को बचा क्या है।

अभी से बेनियाज़ी, बेरुख़ी, ज़ौर.ओ.सितम मुझ पर
अभी आग़ाज़.ए.उल्फ़त है, अभी मैने कहा क्या है ।

तुम्हारा चाहने वाला खड़ा है सरनिगूँ कब से
ये पर्दे के तहत पर्दा. सनम ऐसी हया क्या है ।

बनाया ख़ाक से हमको, मिटाया ख़ाक में हमको
तसव्वुर आप ही का था, हमें फिर सोचना क्या है।

सरापा आप ही के हैं , भले हैं या बुरे हैं हम 
हमारे सामने अब रास्ता भी दूसरा क्या है ।

कहाँ रुकता कोई आशिक , ज़माना लाख समझाए
मरीजे.ए.इश्क की आख़िर कोई होती दवा क्या है।

नहीं चालाकियाँ चलती मुहब्बत में कभी ’आनन’
नहीं तू बाज़ आता है , इरादा फिर बता क्या है ?

-आनन्द.पाठक ’आनन’

बुधवार, 7 जनवरी 2026

अभी संभावना है--एक समीक्षा --राम अवध विश्वकर्मा [ प्रकाशित -हिंदी दैनिक देश पथ]--लखनऊ ] दिनांक 07-जनवरी-2026]


 मित्रो ! 
इसी मंच पर मेरे नवीनतम ग़ज़ल संग्रह ’ अभी संभावना है -" पर आ0 रामअवध विश्वकर्मा जी की समीक्षा 22 दिसम्बर 25 को आप ने मेरे फ़ेसबुक वाल पर पढ़ी थी और लोगो ने सराहा भी था।
वही समीक्षा राम अवध जी ने प्रकाशनार्थ एक हिंदी दैनिक "देश पथ ’ [ लखनऊ ] 
को भेज दिया था जो दिनांक 07-जनवरी-2026 प्रकाशित भी हो गई।

इस पत्र का पी0डी0एफ़0 फ़ाइल इस मंच पर लगा रहा हूँ । यदि आप आवश्यक समझे तो उक्त समीक्षा यहाँ पढ़ सकते है। साथ ही इसका कुछ भाग आप के अवलोकनार्थ भी लगा रहा हूँ|
https://www.akpathak.co.in/2026/01/07-2026.html
[ आप इस समीक्षा को मेरे व्यक्तिगत ब्लाग पर सही फ़ार्मेट मे पढ़ सकते है

इस सत्कार्य के लिए आ0 राम अवध विश्वकर्मा जी को और सम्पादक दैनिक ’देशपथ’[ लखनऊ] को बहुत बहुत धन्यवाद।
सादर

-आनन्द पाठक ’आनन’

समीक्षक :--- 

राम अवध विश्वकर्मा जी ---मो0  94793 28400






अनुभूतियाँ 189/76

 अनुभूतियाँ 189/76


:1:
सरगोशी कर रही हवा है
बात इधर की उधर कर रही
अगर भरोसा है तुम को खुद 
तो काहे को व्यर्थ डर रही ।

:2:
 एक  बात पूछी थी तुमसे
उत्तर तुमने अबतक न दिया
क्या मौन तुम्हारा मानू मैं
तुमने उसको स्वीकार किया ?

:3:
बात बनेगी फिर बिगड़ेगी
फिर काहे का शोक मनाना
अगर करम हो जाए उनक
बिगड़ी बात पुन: बन जाना ।

:4:
छोटी छोटी बातों को तुम
क्यों अपने दिल पर लेती हो
लोगों की सब कानाफूसी
क्यों न अनसुना कर देती हो ?

-आनन्द.पाठक ’आनन’

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

अनुभूतियाँ 188/75

 अनुभूतियाँ 188/75

:1:
कैसे छुपा सकोगी बातें-
राज़ आँख से खुल जाती हैं ।
विरह वेदना मन की पीड़ा
कब आँसू से धुल पाती हैं ।

;2;
मन महका महका-सा रहता
खुशियों का फिर रहता मौसम।
 वक्त निभाता साथ हमारा
साथ अगर तुम देते हमदम ।

:3:
यह प्रश्न तुम्हारा बेमानी
किसने किससे मुुँह मोड़ा है।
प्रारब्ध कहूँ, दुर्भाग्य कहूँ
किसने किसका दिल तोड़ा है। 

:4:
 एक बात बतला कर जाना
लौट  के आना है क्या मुमकिन?
वरना तो जीने की खातिर
आँसू तनहाई है हर दिन ।

-आनन्द पाठक 'आनन'-

रविवार, 4 जनवरी 2026

कविता 032 : राजनीति के जुमले हैं हम

 कविता : 032

राजनीति के जुमले हैं हम
हर "रैली’ के गमले से हम
जहाँ लगा दो, जहाँ सजा दो

हम सवर्ण है, हम शोषित हैं
हमी दलित हैं, हम वंचित हैं
हमी सनातनी, हमी ज़िहादी
फिरकों में बँटने के आदी
रंग लहू का एक बताते
खुद की मंशा नेक बताते

जाति-पाँत में बटे हुए हम
खाचें खाँचों में अँटे हुए हैं
वोट बैंक हम ।

सब कुछ हैं हम
लेकिन हम इंसान नहीं है
मानवता की पहचान नहीं है
" मुफ़्त रेवड़ी’-पर फ़िसलें  हम
राजनीति के जुमले हैं हम ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’


शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

अभी संभावना है--एक समीक्षा --राम अवध विश्वकर्मा [ प्रकाशित -विश्व विधायक हिंदी समाचार पत्र--लखनऊ ] दिनांक 31-दिसम्बर-2025]



 मित्रो !

इसी मंच पर मेरे नवीनतम ग़ज़ल संग्रह ’ अभी संभावना है -" पर आ0 रामअवध विश्वकर्मा जी की समीक्षा 22 दिसम्बर 25 को आप ने पढ़ी थी और लोगो ने सराहा भी था।
वही समीक्षा राम अवध जी ने प्रकाशनार्थ एक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ’विश्व विधायक’ [ लखनऊ ] को भेज दिया था जो प्रकाशित भी हो गई।
इस पत्र का पी0डी0एफ़0 फ़ाइल इस मंच पर लगा रहा हूँ । यदि आप आवश्यक समझे तो उक्त समीक्षा यहाँ पढ़ सकते है। साथ ही इसका कुछ भाग आप के अवलोकनार्थ भी लगा रहा हूँ|
[प्रथम दॄष्टया -पत्र के उक्त भाग के editing में और अपेक्षित सुधार की आवश्यकता थी--आनन्द पाठक ’आनन’

समीक्षक :

समीक्षक :- राम अवध विश्वकर्मा [मो0 94793 28400




अनुभूतियाँ 187/74

 अनुभूतियाँ 187/74

:745:
छ्द्म आवरण ओढ़े ओढ़ कर
सभी दिखावे में व्याकुल हैं
जान रहे हैं वो भी ख़ुद को
मिथ्या भावों के संकुल हैं ।

:746:
उनकी आदत वही पुरानी
बिना बात के टाँग अड़ाना
राई को परबत बतलाना
बेमतलब का शोर मचाना ।

747
आजीवन चलते रहना है
रूकना कोई कर्म नहीं है
प्राणी का उत्पीड़न करना
यह तो कोई धर्म नहीं है

748
बात अभी क्या तुमसे करना
अभी नशे में डूबे हो तुम ।
दीन धरम तुम क्या समझोगे
धन दौलत के भूखे हो तुम ।

-आनन्द पाठक 'आनन'





गुरुवार, 1 जनवरी 2026

अनुभूतियाँ 186/73

 अनुभूतियाँ 186/73

:741:
अर्ज़ किया है मैने तुमसे
चाहे मानो या ना मानो
कौन है अपना, कौन पराया
कम से कम इतना पहचानो ।

742:
प्रेम हमेशा रद कर देता
मतलब,स्वार्थ,ग़रज़, प्रत्याशा
प्रेम सदा समझा करता है
प्रेम समर्पण वाली भाषा ।

743
शब्द जहाँ पर चुप हो जाते
पीड़ा को बतलाने में जब
आँखें सूनी सूनी रहती -
मौन मुखर हो जाता है तब।

744
कितने रूप ज़िंदगी तेरे
कितने मोड़ अभी राहों में
जीन है तो चलना होगा
कड़ी धूप में या छावों में ।

-आनन्द पाठक ’आनन’