101 आँख खुली तो देखा मैने बात कहाँ से कहाँ बढ़ गई । मैं सपनॊ में खोया खोया धूप कहाँ से कहाँ चढ़ गई 102 फेर लिया मुँह तुमने जिससे कौन भला उसको अपनाए , इधर उधर कब तक भटकेगा शाम ढलेगी लौट कर आए। 103 जीवन की अब शाम हुई है सुधियों के कुछ दीप जले हैं, व्यस्त रहे हम भाग दौड़ में यादों से हम आज मिले हैं । 104 शाम हुई अब तो घर आ जा थका हुआ होगा दिन भर का, कितनी खोंच लगा दी तू ने हाल किया क्या इस चादर का । -आनन्द पाठक- x
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