अनुभूतियाँ : क़िस्त 027 ओके 105 मौन किसी का समझा,मैने स्वप्न मेरासाकार हुआ है, एक भरम था वह भी मेरा अर्पण कब स्वीकार हुआ है । 106 राह अलग जब चलना ही था साथ चलीफिर क्यों इतने दिन ? एक भुलावा था, जाने दो कितना जीना है अब तुम बिन । 107 तुम ने भी तो देखा होगा आँधी, तूफ़ाँ, बिजली, पानी, तोड़ सकीं हैं कब ये हमको जीने की जब हमने ठानी । 108 कभी
कभी जब अँधियारे में दिख
जाती है एक रोशनी मानॊ
मुझको बुला रही हो फिर
जीने को नई ज़िंदगी । -आनन्द.पाठक- x
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