109 हाथ बढ़ा कर छूते कैसे हाथ हमारे कटे हुए थे. मिलते भी तो क्या देते हम वक़्त के हाथों लुटे हुए थे । 110 बात तुम्हारी नहीं है, जानम ! बात ज़माने की, सब की है ? प्रेम कहानी सबकी यक-सा तुमने ही क्यों दिल पर ली है? 111 मेरी ख़ुशियों में रहती है दुनिया भर की साझेदारी पर जब अपना ग़म होता है ढोने की होती लाचारी । 112 छोड़ गई पूजा की थाली बिखर गए सब पत्रम-पुष्पम , कब तक रहूँ प्रतीक्षारत मै तुम्हीं बता दो मेरे प्रियतम ! -आनन्द.पाठक- x
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