अनुभूतियाँ 029 ओके 113 दिल तो है आवारा बादल इधर उधर फिरता रहता है, प्यासी धरती दिखी कहीं तो जल प्लावन करता रहता है । 114 सोच रहा हूँ लोग यहाँ क्यों चेहरे बदल बदल कर मिलते ऊपर से तो सहज दिखे हैं भीतर भीतर चालें चलते । 115 वक़्त इधर क्या बदला मेरा लोगों ने भी आँखें फेरी, कलतक आँखों की पुतली थे आज उन्होने आँख तरेरी । 116 रब ने दिया बहुत कुछ सबको परबत, घाटी, गुलशन, झरना , लेकिन साथ नहीं हो जब तुम तो फिर क्या इन सबका करना । -आनन्द.पाठक- x
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