अनुभूतियाँ 054 ओके 213 अच्छा, कोई बात नहीं है जाना चाहो, जा सकती हो, लेकिन दर यह खुला रहेगा जब चाहो तुम आ सकती हो । 214 दुनिया में सबकी होती है कुछ ना कुछ अपनी मजबूरी , रूठ गई क्यों चली गई तुम बिना सुने ही बातें पूरी। 219 माना मेरी ही ग़लती थी अब तो बताओ क्या है करना, उलझे रहना उन बातों में या कि उससे कभी उबरना ? 216 बात चली तो कई कहाँ तक रातों-रात कहाँ तक फैली, तिल का ताड़ बना देते है दुनियावालों की है शैली । x
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