अनुभूतियाँ 149/36 593 एक किसी के जाने भर से दुनिया ख़त्म नहीं हो जाती चाह अगर है जीने की तो राह नई खुद राह दिखाती 594 कहाँ गई वो ख़ुशी तुम्हारी कहाँ गया अब वो अल्हड़पन इस बासंती मौसम में भी दुखी दुखी सी क्यों रहती जानम 595 कब तक मौन रहोगी यूँ ही कुछ तो अन्तर्मन की बोलो अन्दर अन्दर क्यों घुलती हो कुछ तो मन की गाँठें खोलो 596 हर बार छला दिल ने मुझको हर बार उसी की सुनता हूँ क्या होता हैं सपनों का सच मालूम, मगर मैं बुनता हूँ
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