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शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

अनुभूतियाँ 184/71

 अनुभूतियाँ 184/71

733
माली अगर सँवारे गुलशन
प्रेम भाव से मनोयोग से ।
ख़ुशबू फ़ैले दूर दूर तक
डाली डाली के सुयोग से।

734
बदले कितने रूप शब्द ने
तत्सम से लेकर तदभव तक
कितने क्रम से गुज़रा करतीं
जड़ी बूटियाँ ज्यों आसव तक ॥

735
सबका अपना अपना जीवन
सुख दुख सबके अपने अपने
सबकी अपनी अपनी मंजिल
कुछ हासिल कुछ टूटे सपने

736
जो वह कह दे सत्य वही बस
भरा हुआ यह उसके मन में
आँखे बंद किया रहता है
नहीं देखता वातायन में

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

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