दोहे: क़िस्त 025
हार कभी ना मानना, ना करना विश्राम ।
कष्ट मिटे, बंधन कटे, बोलो "जय श्री राम" ॥
:2:
मंदिर मसजिद बाद मे, पहले मन की मान ।
मन के अंदर झाँक तो, खुद को तू पहचान ॥
:3:
मिल जाएँगी मंजिले, मन मे हो गर चाह ।
दुखी विकल मत हो सखे!, जीने की सौ राह ॥
:5:
कह 'आनन' क्यो कर रहा, आदर्शों की बात ।
सभी यहाँ तैयार हैं , करने को आघात ॥
:6:
कथनी करनी में दिखे, तुम्हे किसी में फ़र्क ।
नहीं भरोसेमंद वह ,जो भी देवे तर्क ॥
:7:
ऊपर से वह दिखा रहा , भले मधुर मुसकान ।
लेकिन भीतर हँस रहा , एक कुटिल शैतान ॥
-आनन्द.पाठक ’आनन’
880092 7181
880092 7181
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें