रिपोर्ताज

सोमवार, 30 सितंबर 2024

अनुभूतियाँ 153/40

अनुभूति 153/40


609
पहले वाली बात कहाँ अब
मौसम बदला तुम भी बदली
वो भी दिन क्या दिन थे अपने
मैं था ’पगला" तुम थी ’पगली
 
610
जिन बातों से चोट लगी हो
मन में उनको, फिर लाना क्यों
जख्म अगर थक कर सोए हो
फिर उनको व्यर्थ जगाना क्यों
 
611
जब से दूर गए हो प्रियतम
साथ गईं मेरी साँसे भी
देख रही हैं सूनी राहें
और प्रतीक्षारत आँखे भी

612
समझाने का मतलब क्या फिर
बात नहीं जब तुमने मानी
क्या कहता मैं जब तुमने ही
राह अलग चलने की ठानी
 

-आनन्द.पाठक

 


अनुभूतियाँ 152/39

अनुभूति 152/39

605
काट दिए जब दिन विरहा के
मत पूछो कैसे काटे हम
सारी ख़ुशियाँ एक तरफ़ थी
जीवन टुकड़ों में बाँटे हम
 
606
 हार गए हों जो जीवन से
टूट गईं जिनकी आशाएँ
एक सहारा देना उनको
मुमकिन है फिर से जी जाएँ

607
लाख मना करता है ज़ाहिद
कब माना करता है यह दिल
मयखाने से बच कर चलना
कितना होता है यह मुशकिल
 
608
नदिया की अपनी मर्यादा
तट के बन्धन में रहती है
अन्तर्मन में पीड़ा रखती
दुनिया से कब कुछ कहती है
 

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 29 सितंबर 2024

ग़ज़ल 426[75 फ़] : झूठे ख़्वाब दिखाते क्यों हो

 

ग़ज़ल  426[75 फ़]

21--121--121--122  =16


झूठे ख़्वाब  दिखाते क्यों हो

सच को तुम झुठलाते क्यों हो


कुर्सी क्या है आनी-जानी

तुम दस्तार गिराते क्यों हो


तर्क नहीं जब पास तुम्हारे

इतना फिर चिल्लाते क्यों हो।


गुलशन तो हम सबका है फिर

तुम दीवार उठाते क्यों हो ।


बाँध कफ़न हर बार निकलते

पीठ दिखा कर आते क्यों हो ।


जब जब लाज़िम था टकराना

हाथ खड़े कर जाते क्यों हो ।


पाक अगर है दिल तो ’आनन’

दरपन से घबराते क्यों हो ।


-आनन्द.पाठक - 





शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

ग़ज़ल 425 [74 फ़] : कोई आता है दुनिया में

 ग़ज़ल  425[74 फ़}


1222---1222---1222---1222


कोई आता है दुनिया में , कोई दुनिया से जाता है,

नवाज़िश है करम उसका, हमे क्या क्या दिखाता है


नही जो पाक सीरत हो, भरा हिर्स-ओ-हसद से दिल

इबादत या ज़ियारत हो, ख़ुदा नाक़िस बताता है ।


भरोसा है अगर उस पर, झिझक क्या है, हिचक फिर क्या

उसी का नाम लेता चल, अज़ाबों से बचाता है ।


न जाने क्या समझ उसकी, बहारों को ख़िज़ा कहता

हक़ीक़त जान कर भी वह, हक़ीक़त कह न पाता है ।


अदा करना जो चाहो हक़, तुम्हारी अहलीयत होगी

वगरना बेग़रज़ कोई फ़राइज़ कब निभाता है ।


तबियत आ ही जाती है जो ख़्वाहिश हो अगर उनकी

बना कर राहबर भेजे जिसे अपना बनाता  बनाता है ।


हुए गुमराह क्यों ’आनन’ ये सीम-ओ-ज़र के तुम पीछे

अगर दिल की सुना करते , सही राहें बताता है ।


-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 24 सितंबर 2024

ग़ज़ल 424 S [73-फ़] : गुनाह कर के भी होता वो---

 ग़ज़ल 424[73 फ़]

1212---1122---1212---112/22


गुनाह कर के भी होता वो शर्मसार नहीं

दलील यह है कि दामन तो दाग़दार नहीं


हज़ार रंग वो बदलेगा, झूठ बोलेगा,

मगर कहेगा कि "कुर्सी’ से उसको प्यार नहीं।


बताते ख़ुद को ही मजलूम बारहा सबको

चलेगा दांव तुम्हारा ये बार बार नहीं ।


ख़याल-ओ-ख़्वाब में जीता, मुगालते में है

कि उससे बढ़ के तो कोई ईमानदार नहीं।


दिखा के झूठ के आँसू , ख़बर बनाते हो

तुम्हारी बात में वैसी रही वो धार नहीं ।


यक़ीन कौन करेगा तुम्हारी बातों पर

तुम्हारी साख रही अब तो आबदार नहीं।


भले वो जो भी कहे सच तो है यही ’आनन’

किसी भी शख्स पे उसको है ऎतबार नहीं ।


-आनन्द.पाठक-

इस ग़ज़ल को विनोद कुमार उपाध्याय की आवाज़ में 

यहाँ सुने

https://www.facebook.com/share/v/15xtiaXiqU/



ग़ज़ल 423 [72-फ़] : मुख़ालिफ़ जो चलने लगी हैं हवाएँ

 ग़ज़ल  423 [72-फ़]

122---122---122---122


मुख़ालिफ़ जो चलने लगी हैं हवाएँ

चिराग़-ए-मुहब्बत कहाँ हम जलाएँ ।


बला आसमानी से क्या ख़ौफ़ खाना

अगर साथ होंगी तुम्हारी दुआएँ ।


बदल जाएगी मेरी दुनिया यक़ीनन

मेरी ज़िंदगी में अगर आप आएँ ।


मिलेगा ठिकाना कहाँ और हमको

जहाँ जा के सजदे में यह सर झुकाएँ।


सभी अपने ग़म में गिरफ़्तार बैठे

यह जख़्म-ए-जिगर जा के किसको दिखाएँ ?


परिंदे शजर छोड़ कर उड़ गए हैं 

शजर कैसे अपनी जमीं छोड़ जाएँ ।


तुम्ही को ये दुनिया बनानी है ’आनन’

फ़रिश्ते उतर कर जो आएँ न आएँ ।


-आनन्द.पाठक-






शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

कविता 030 : आसुरी शक्तियाँ

 कविता 030 : आसुरी शक्तियाँ



आसुरी शक्तियाँ 
पाशविक प्रवृत्तियाँ
देवासुर संग्राम में
कल भी थी, आज भी है |
रावण मरा नहीं करता है
कंस सदा ज़िंदा रहता है
मन के अंदर   
सत्य असत्य का
 द्वंद सदा चलता रहता है ।
निर्भर करता 
आप किधर किस ओर खड़े हैं
कितना कब तक आप लड़े हैं ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’

इस गीत को आप यहाँ सुन सकते हैं--



सोमवार, 16 सितंबर 2024

अनुभूतियाँ 151/38


अनुभूतियाँ 151/ 38


601
आसमान के कितने ग़म है
धरती के भी क्या कुछ कम हैं?
कौन देखता इक दूजे की
आँखे किसकी कितनी नम हैं ।
 
602
एक समय ऐसा भी आया
जीवन में अंगारे बरसे
जलधारों की बात कहाँ थी
बादल की छाया को तरसे
 
603
एक बात को हर मौके पर
घुमा-फिरा कर वही कहेगा।
ग़लत दलीलें दे दे कर वह
ग़लत बात को सही कहेगा
 
604
जब अपने मन का ही  करना
फिर क्या तुमसे कुछ भी कहना
जिसमें भी हो ख़ुशी तुम्हारी
काम वही तुम करती रहना
 
 
-आनन्द पाठक-

अनुभूतियाँ 150/37

 
क़िस्त 150/37
 
597
बहुत दिनों के बाद मिली हो
आओबैठॊ पास हमारे -
यह मत पूछो कैसे काटे
विरहा में, दिन के अँधियारे ।
 
598
मन के अन्दर ज्योति प्रेम की
राह दिखाती रही उम्र भर
जिसे छुपाए रख्खा मैने
पीड़ा गाती रही उम्र भर
 
599
साथ तुम्हारा ही संबल था
जिससे मिला सहारा  मुझको
साँस साँस में तुम ना घुलती
मिलता कहाँ किनारा मुझको
 
600
सदियों की तारीख़ भला मै
लम्हों में बतलाऊं कैसे ?
जीवन भर की राम-कहानी
पल दो पल में गाऊँ कैसे ?
-आनन्द.पाठक-
 
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अनुभूतियां 149/36

अनुभूतियाँ 149/36
593
एक किसी के जाने भर से
दुनिया ख़त्म नहीं हो जाती
चाह अगर है जीने की तो
राह नई खुद राह दिखाती
 
594
कहाँ गई वो ख़ुशी तुम्हारी
कहाँ गया अब वो अल्हड़पन
इस बासंती मौसम में भी
दुखी दुखी सी क्यों रहती जानम
 
595
कब तक मौन रहोगी यूँ ही
कुछ तो अन्तर्मन की बोलो
अन्दर अन्दर क्यों घुलती हो
कुछ तो मन की गाँठें खोलो
 
596
 हर बार छला दिल ने मुझको
हर बार उसी की सुनता हूँ
क्या होता हैं सपनों का सच
मालूम
मगर मैं बुनता हूँ
 


अनुभूतियाँ 149/36

 अनुभूतियाँ 149/36

1:
लाख मना करता है ज़ाहिद
कब माना करता है यह दिल ।
मयखाने से बच कर चलना
कितना होता है यह मुशकिल ।

:2;

रविवार, 15 सितंबर 2024

अनुभूतियाँ 114/01

 [ अब यहाँ से ये तमाम अनुभूतियाँ -कही अनकही-      [ नया संग्रह] में संकलित होंगी]


क़िस्त 114/ क़िस्त 1

453
कब आना था तुमको लेकिन
निश दिन मैने पंथ निहारे
हर आने जाने वाले से
पूछ रहा हूँ  साँझ-सकारे।


454
जिन रिश्तों में तपिश नहीं हो
उन रिश्तों को क्या ढोना है
हाय’ हेलो तक ही रह जाना
रस्म निबाही का होना है


455
कैसे मैं समझाऊँ तुमको
नही समझना ना समझोगी
तुम्ही सही हो, मैं ही ग़लत हूँ
बिना बात मुझ से उलझोगी


456
बात बात पर नुक़्ताचीनी
बात कहाँ से कहाँ ले गई
क्या क्या तुमने अर्थ निकाले
जहाँ न सोचा, वहाँ ले गई


शुक्रवार, 13 सितंबर 2024

मुक्तक 22

122   122   122   122
1
तुम्हे लग न जाए किसी की नजर
मेरे हमनवा ऐ मेरे हमसफर
जुदाई की रातें न काटे कटी
शब-ए-वस्ल क्यूँ है लगे मुख्तसर

2
212   212  212
दिल में उलफत जगी तो रहे
इक शराफत बनी तो रहे
वह फरिश्ता बने ना बने
आदमी, आदमी तो रहे ।

3
212   212   212   212
खुशनुमा जिंदगी कौन जी कर गया
कौन ग़म मे जिया खुदकुशी कर गया
मैकदे को कहाँ फर्क क्या फिक्र क्या
कौन प्यासा गया कौन पी कर गया ।

4
221   2121   1221   212
कुछ सिरफिरे हैं लोग तुम्हे बरगला रहें
मजहब के नाम पर तुम्हे जन्नत दिखा रहें
दीपक जला के राह दिखाना था कल जिन्हे
मिल कर हवा के साथ वो बस्ती जला रहे

-आनन्द पाठक-

गुरुवार, 12 सितंबर 2024

अनुभूतियाँ 148/35 :

अनुभूतियाँ 148/35
589
सदा बसें  हिरदय में मेरे
राम रमैया सीता मैया
अंजनि पुत्र केसरी नंदन
साथ बिराजै लछमन भैया
 
590
हो जाए जब सोच तुम्हारी
राग द्वेष मद मोह से मैली
राम कथा में सब पाओगे
जीवन के जीने की शैली
 
:591
एक बार प्रभु ऐसा कर दो
अन्तर्मन में ज्योति जगा दो
काम क्रोध मद मोह  तमिस्रा
मन की माया दूर भगा दो
 
592
इस अज्ञानी, इस अनपढ़ पर
कृपा करो हे अवध बिहारी 
भक्ति भाव मन मे जग जाए
कट जाए सब संकट भारी
-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 10 सितंबर 2024

मुक्तक 21 : आइने से

1
2122   2122   212
जो भी कहना था उन्हें वह कह गए
हम सियासत में उलझ कर रह गए
'वोट' वो आँसू बहा कर माँगते
भावनाओं में हम आकर बह गए ।

2
221    2121    1221   212
ग़ैरों से तेरे हाल की मिलती रही खबर
हर रोज देखता रहा तेरी ही रहगुजर
वैसे तमाम उम्र तेरा मुंतजिर रहा
ऐ जान! क्यों न भूल से आई कभी इधर?

3
122   122   122   122
कटी उम्र, उनको बुलाते बुलाते
जमाना लगेगा उन्हे आते आते
सफर जिंदगी में वो गाहे ब गाहे
हमे बेसबब क्यों रहे आजमाते

4
122    122   122   122
इशारों से गर तुम न हमको बुलाते
गुनह जाने हमको कहाँ ले के जाते
अगर दिल मे होता उजाला न तुमसे
सही क्या, ग़लत क्या, कहाँ जान पाते

-आनन्द पाठक -



कविता 29 : जब सच उठ कर

  कविता 29 : जब सच  उठ कर


सच जब उठ कर ---

 सत्य ढूँढना, माना मुश्किल
झूठ फूस की ढेरी में
धुआँ धुआँ फैला देते हो
सच है तो फिर सच उठ्ठेगा
भले उठे वह देरी से ।

  झूठ मूठ के पायों पर
खड़ा तुम्हारा सिंहासन
आज नहीं तो कल डोलेगा
सच  उठ कर जब सच बोलेगा ।

-आनन्द पाठक-

इस कविता को आप मेरे यू-ट्यूब चैनेल -आवाज़ का सफ़र- पर सुन सकते है


कविता 28 : वही तितलियाँ--

  कविता 28 : वही तितलियाँ---

जब बचपन मे
रंग बिरंगी शोख तितलियाँ
बैठा करती थी फूलों पर
भागा करता था मै
 पीछे पीछे ।

जब भी उनको छूना चाहा
उड़ जाती थीं इतरा कर
इठला कर, मुझे थका कर ।
समय कहाँ रुकता जीवन में
वही तितलियाँ बैठ गईं अब
अपने अपने फूलों पर
पास से गुज़रूँ, पूछे हँस कर
"अब घुटनों का दर्द तुम्हारा, कैसा कविवर" ?

-आनन्द पाठक-




कविता 27: सूरज निकले उससे पहले--

  कविता 27: सूरज निकले उस से पहले--


सूरज निकले उससे पहले

या डूबे तो बाद में उसके

रोज़ हज़ारों क़दम निकलते

कुआँ खोदने पानी पीने

तिल तिल कर वो मरने ,जीने

साँस साँस को गिरवी रखने

सबकी अपनी अलग व्यथा है

महानगर की यही कथा है ।

-आनन्द.पाठक-


कविता 26 : चन्दन वन से

 कविता 26: चन्दन वन से


जब बबूल बन से गुज़रोगे
क्या पाओगे ?
राहों में  काँटे ही काँटे
दूर दूर तक  बस सन्नाटे ।

चन्दन बन से जब गुज़रोगे 
एक सुगन्ध 
भर जाएगी साँसों में
 सावधान भी रहना होगा
शाखों से लिपटे साँपों से ।

-आनन्द.पाठक-



कविता 25 : ख़्वाब देखना

  कविता 25 :ख़्वाब देखना--


ख़्वाब देखना ,बुरा नहीं है ।
हक़ है तुम्हारा।
यह किसी की दुआ नहीं है।
सिर्फ़ देखना रोज़ देखना
और देखते ही बस रहना, कुछ न करना
फिर सो जाना, फिर खो जाना
ठीक नहीं है ।
 उठो , जगो, पुरुषार्थ जगाओ
पुरुषार्थ तुम्हारा भीख नही है ।


-आनन्द.पाठक-



कविता 24 : बदलते रिश्ते

 कविता 24 :बदलते रिश्ते 


नहीं उतरते आसमान से 
कहीं फ़रिश्ते
नहीं दिखाते सच के रस्ते
लोग यहाँ ख़ुद गर्ज़ है इतने
बदले जैसे कपड़े, वैसे
रोज़ बदलते रहते रिश्ते ।

-आनन्द.पाठक-

विविध 12: एक कवि ने-- [हास्य]

विविध 12 : एक कवि ने --- [हास्य]


एक कवि ने

अपनी कन्या की शादी का
विज्ञापन छपवाया
लेखन कुछ ऐसा बनवाया
'वर चाहिए'
'रचना' मेरी स्वरचित मौलिक
अब तक नहीं प्रकाशित
इसी लिए रह गई आज तक
क्वारी अविवाहित
विज्ञापन के तथ्य यदि शंकित है
मौलिकता  का प्रमाण-पत्र
'रचना ' के पृष्ठ भाग पर
अंकित है
-----०----०

किसी पत्र के संपादक ने
हामी भर दी
कवि जी ने शादी कर दी
एक साल के बाद
संपादक ने

धन्यवाद के साथ
खेद सहित
'रचना ' वापस कर दी।
और लिख दिया
रचना सुन्दर अति-श्रेष्ठ है
उम्र में हम से वरिष्ठ है
छप नही सकती
अन्य कोई हो छोटी रचना यदि आप की
तो शायद खप सकती है


-आनन्द.पाठक-

विविध 11 : सतवाँ जनम यही है--[हास्य]

विविध 11 :सतवाँ जनम यही है [ हास्य]


पत्नी बोली
'सुनते हैं जी !
कल शाम मंदिर में मैंने
क्या माँगा था ?
सात जनम तक पति रुप में
तुम को पाऊ
चरणों की सेवा कर
जीवन सफल बनाऊँ" ।
मैंने बोला " भाग्यवान !
एक बात तो तुम ने कही सही है।
छह जनम तो बीत चुका है
सतवाँ जनम यही है ।

-आनन्द.पाठक-

कविता 023 : एक देश लड़ता है

 
कविता 023 [ आ0 धूमिल जी की एक कविता की प्रेरणा से]

एक देश लड़ता है
दूसरा देश विरोध में लड़ता है ।
एक तीसरा देश भी है 
जो न लड़ता है, अपितु लड़ाता है  ।
 अपना हथियार बेच 
मोटा मुनाफ़ा कमाता है।
मैं पूछता हूँ
वह तीसरा देश कौन है
इस विषय पर  U.N.O मौन है।

-आनन्द.पाठक-




शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

ग़ज़ल 422 [ 71-फ़] : हाल इतना तेरा बुरा तो नहीं-

 ग़ज़ल 71-फ़

2122---1212---112


हाल इतना तेरा बुरा तो नहीं ।

वक़्त तेरा अभी गया तो नहीं ।


सामने हैं अभी खुली राहें ,

हौसला है,अभी मरा तो नहीं ।


एक दीपक तमाम उम्र जला

आँधियों से कभी डरा तो नहीं ।


जानता हूँ तू बेवफ़ा न सही

चाहे जो है तू बावफ़ा तो नहीं ।


इश्क अंजाम तक भले न गया

इश्क करना कोई ख़ता तो नहीं ।


आँख तेरी है क्यूँ छलक आई,

ज़िक्र मेरा कहीं हुआ तो नहीं ?


बात यह भी तो है सही ’आनन’

ज़िन्दगी क़ैद की सज़ा तो नहीं ।


-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 3 सितंबर 2024

गीत 88 : इससे पहले कि हम रोशनी से जलें--

  गीत 88: गीत 14 [ अभी संभावना है ]

इससे पहले कि हम  रोशनी से जलें,’आदमी’ तो जगा आदमी में ।

आदमी से अजनबी हुआ आदमी
रंग के भेद में रंग गया आदमी ।
काल गोरे हो तन पर लहू एक रंग
जात और पात में बँट गया आदमी ।

इससे पहले कि हम धर्म अधूरा पढ़ें,"ढाई आख़र" पढ़े आख़िरी में ।

आदमी है खड़ा लेकर ’परमाणु-बम्ब’
आदमी बन गया साँप का तन-बदन ।
हर ज़हर से ज़हरीला हुआ आदमी 
आदमी बन गया एक सीलन घुटन ।

इससे पहले कहीं हम-नस्ल ना बचे, ’गाँधी-गौतम’ बचा आदमी ।

आदमी को निगलता हुआ आदमी
आदमी से उबलता हुआ आदमी ।
आदमी आदमी से परेशान है -
अग्नि-शलाका उगलता हुआ आदमी ।

इससे पहले कि हम पर अँधेरा हँसे, रोशनी तो जगा आदमी में ।

’गाँधी’ वह जो मिटे आदमी के लिए
’सुकरात’ वह जो ज़हर के प्याले पिए
आदमी ने ही सूली चढ़ाया उसे -
आदमी जो जिया आदमी के लिए ।

इससे पहले कि फिर कोई सूली चढ़े, एक "ईशा" जगा आदमी में ।
इससे पहले कि हम  रोशनी से जलें,’आदमी’ तो जगा आदमी में ।
-आनन्द.पाठक-



गीत 87 : वह नई रोशनी की फिर से बातें करते है --

 

गीत 87 [ अभी संभावना है]


वह नई रोशनी की फिर से  बातें करते हैं
मैं एक अँधेरा तब से अब तक भोग रहा हूँ ।

गलियों गलियों नुक्कड़ नुक्कड़ चौराहों पर
’सम्पूर्ण क्रान्ति" का नारा हमसे लगवाएँगे ।
पुन: सुनहले स्वप्न दिखा सूनी आँखों  में
सिंहासन सत्ता का हमसे हिलवाएँगे ।

तार तार हो गई मेरी विश्वास चदरिया
मैं पेबन्द पेबन्द तब से अब तक जोड़ रहा हूँ।

हम आज तलक है  खड़े उन्हीं चौराहों पर
कल हमे अकेला छोड़ कि "दिल्ली’ चले गए ।
सब सत्ता के बँटवारे  में आसक्त रहे 
                  कितने वर्षों हम उनके हाथों छले गए ।

वह आश्वासन का बोझ सौंप आश्वस्त हुए
मैं टुकड़ा-टुकड़ा अब तक जीवन जोड़ रहा हूँ ।

हर कोई एक मशाल लिए अपने हाथों में
" जे0पी0 बनने का दम्भ लिए फिरता रहता है।
हर रथी यहाँ अब स्वयं सारथी बन बैठा
हर नेता खुद को महारथी सोचा करता ।

वह शहर शहर में अश्वमेध की बातें करता
मैं बलिवेदी की तब से अब तक सोच रहा हूँ।


-आनन्द.पाठक-