शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

एक ग़ज़ल 033 [22-ब] : वो मुखौटे बदलता रहा.....

 ग़ज़ल  033:[22-ब] वो मुखौटे बदलता रहा.... ओके

212--212--212--212


वो मुखौटे बदलता रहा उम्र भर  ।
ख़ुद को क्या क्या समझता  रहा उम्र भर ।

मुठ्ठियाँ जब तलक गर्म होती रहीं
मोम सा वो पिघलता रहा उम्र भर

वो खिलौने से ज़्यादा था कुछ भी नहीं
चाबियों से खनकता रहा उम्र भर

जिसके आँगन में उतरी नहीं रोशनी
वो अँधेरों से डरता रहा उम्र भर

उसको गर्द-ए-सफ़र का पता ही नहीं
झूट की छाँव पलता रहा उम्र भर

उसको मंज़िल मिली ही नहीं आजतक
मंज़िलें जो बदलता रहा उम्र भर

बुतपरस्ती मेरा हुस्न-ए-ईमान है
फिर ये ज़ाहिद क्यूं जलता रहा उम्र भर?

मैकदा है इधर और का’बा उधर
दिल इसी में उलझता रहा उम्र भर

आ गया कौन ’आनन’ ख़यालों में जो
दर-ब-दर यूं भटकता रहा उम्र भर ?



-आनन्द पाठक-

3 टिप्‍पणियां:

ANAND ने कहा…

SIR MAJAA AA GAYAA PADHKAR...GAJAB LIKHTYE HAI AAP...

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 झा जी
सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक

virendra sharma ने कहा…

आला दर्जे की गजल कह रहें हैं आप।