गुरुवार, 14 मई 2026

दोहा 23:सामान्य दोहे

:1:
इधर उधर की बात कर, भरमाता है रोज
झूठे झूठे आँकड़े, वह लाता है  खोज ।।

:2:
पहले मन निर्मल करो, निर्मल करो सुभाय
तब मंदिर के द्वार पर , झुक कर शीश नवाय

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

ग़ज़ल 467 [41-जी] : तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी

ग़ज़ल 467 [41-जी] :  तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी

1222---1222---1222---1222


तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी लगती अधूरी है ।
भले सब कुछ हमे हासिल, जिगर में नासबूरी है ।

कभी  हम पास थे इतने, बदन दो एक थी धड़कन
ख़ता क्या हो गई हमसे कि तुमसे आज दूरी है ?

वो आते भी तो क्यों आते, तुम्हारी तिश्नगी कमतर
तुम्हारी आरजू दिल की अभी आधी अधूरी है । 

नज़र आता रहेगा वो, जिसे तुम ढूँढते रहते-
कि जब तक पाक है दिल और जब तक रूह नूरी है।

भले तुम कुछ कहो ख़ुद को, सभी हैं जानते तुमको
अक़ीदा तो नहीं है ये, तुम्हारी जी हज़ूरी  है ।

न जाने लोग क्यों उसको यहाँ पागल समझते हैं
जो हक़ की बात करता है. उसे कहते फ़ितूरी है
 
चिराग़ों को डराती है हवा की साज़िशें अकसर
नताइज़ जो भी हो ’आनन’ मगर लड़ना ज़रूरी है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181






मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

अनुभूतियाँ 194/81

 अनुभूतियाँ 194/81


:1:

एक बार जो आ जाओ तुम

सुख दुख की बातें करनी है

कुछ अपनी पीड़ा कहनी है

और तुम्हारी कुछ सुननी है ।