बुधवार, 29 अप्रैल 2026

ग़ज़ल 467 [41-जी] : तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी

ग़ज़ल 467 [41-जी] :  तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी

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तुम्हारे बिन हमारी ज़िंदगी लगती अधूरी है ।
भले सब कुछ हमे हासिल, जिगर में नासबूरी है ।

कभी  हम पास थे इतने, बदन दो एक थी धड़कन
ख़ता क्या हो गई हमसे कि उनसे आज दूरी है ।

वो आते भी तो क्यों आते, तुम्हारी तिशन्गी कमतर
तुम्हारी आरजू दिल की अभी आधी अधूरी है ।

भले तुम को कहो ख़ुद को सभी हैं जानते तुमको
अक़ीदा तो नहीं है ये, तुम्हारी जी हज़ूरी  है ।

न जाने लोग क्यों उसको यहाँ पागल समझते हैं
जो हक़ की बात करता है. उसे कहते फ़ितूरी है
 
चिराग़ों को डराती है हवा की साज़िशें अकसर
नताइज़ जो भी हो ’आनन’ मगर लड़ना ज़रूरी है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181






मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

अनुभूतियाँ 194/81

 अनुभूतियाँ 194/81


:1:

एक बार जो आ जाओ तुम

सुख दुख की बातें करनी है

कुछ अपनी पीड़ा कहनी है

और तुम्हारी कुछ सुननी है ।

सोमवार, 9 मार्च 2026

ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

 ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

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मुक़ाबिल सच के होते ही वो घबराने लगे हैं ।
अगर मैं सच भी बोलूँ, उनको अफ़साने लगे हैं ।

पले गमलों के ये पौधे चलेंगे धूप  में क्या !
ज़रा सी धूप लगते ही ये मुरझाने ल्गे हैं ।

गया मौसम, गई ख़ुशबू, गई रौनक चमन की
जो अपने लोग थे अब दूर वो जाने लगे है ।

किनारे बैठ कर कुछ लोग बस बातें बनाते
गुहरवाले समंदर में उतर जाने लगे हैं ।

न दुनिया की ख़बर जिनको, नहीं अपनी ख़बर हो
ज़माने को वही सब लोग दीवाने लगे हैं ।

परिंदो को कहाँ फ़ुरसत कि मुड़ कर फिर वो देखें
पुराने शाख, आँगन, पेड़ बेगाने लगे हैं ।

मुहब्बत को समझते जो बहुत आसान ’आनन’
निभाने पर जो आती बात, कतराने लगे हैं ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-