ग़ज़ल 464[38-जी] : लहज़े में लताफ़त है---
221---1222 // 221---1222
लहज़े है में लताफ़त है, पर दिल में कबाहत है
मासूम से लगते वो, आँखों में शरारत है ।
मुद्दत से मुलव्विस है, साज़िश में, अदावत में
मालूम नहीं उसको, क्या चीज मुहब्बत है ।
खुद को वो समझता है, बस एक वही क़ाबिल
माहिर है करामाती , आलिम है ये ग़फ़लत है।
करना भी भरोसा क्या,अख़्लाक़ नहीं उसका
एहसान फ़रामोशी, उस शख़्स की आदत है ।
हर बात में नुक़्ता चीं, बस टाँग अड़ा देना ,
मिलता है सुकूँ उसको , करता वो शरारत है।
बेपर की उड़ा देना, बिन आग धुआँ करना
उसका ये हुनर अपना, हासिल ये महारत है।
’आनन’ तू परिशाँ क्यों, लोगो के छलावों से
जीना है इसी में जब, काहे की शिकायत है ।
-आनन्द पाठक ’आनन’--
880092 7181
’आनन’ तू परिशाँ क्यों, लोगो के छलावों से
जीना है इसी में जब, काहे की शिकायत है ।
-आनन्द पाठक ’आनन’--
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