त्रिपदी 002
;1:
जगत चराचर के स्वामी तुम
मम अपराध क्षमा करना, प्रभु !
मुझ पर सदा दया करना, प्रभु !
:2:
जीवन सफल उसी का जिसने
सीख लिया हो क्या होता बस
मौन समर्पण, प्रेम सुधा-रस ।
:3:
साध्य सदा रहता है मन में
साधक का जब मन पावन हो
तब ही प्रभु का शुभ दर्शन हो ।
:4;
अमर प्रेम तुम तब समझोगी
डूबोगी तुम जब गहराई में
सोचोगी जब तनहाई में ।
:5:
प्रवचन सुन कर ही क्या होगा
पाप-पुण्य तो तब तोलोगे
द्वार हृदय का जब खोलोगे।
-आनन्द.पाठक ’आनन’-