मंगलवार, 3 अगस्त 2021

ग़ज़ल 191 चाह अपनी कभी छुपा न सके

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ग़ज़ल 191 : चाह अपनी छुपा न सके--


चाह अपनी कभी छुपा न सके
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके

आँख उनकी कही न भर आए
ज़ख़्म दिल का उन्हे दिखा न सके

सामने यक ब यक जो आए वो
शर्म से हम नज़र मिला न  सके

कैसे करता यक़ीन मैं तुम पर
एक वादा तो तुम निभा न सके

ज़िन्दगी के हसीन पहलू को
एक हम हैं कि आजमा न सके

लोग इलजाम धर गए मुझ पर
हम सफ़ाई में कुछ बता न सके

याद क्या हम को आ गया ’आनन’
हम नदामत से आँख उठा न सके 

-आनन्द पाठक-

रविवार, 1 अगस्त 2021

ग़ज़ल 190 : बगुलों की मछलियों से---

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ग़ज़ल 190


बगुलों की मछलियों से, साजिश में रफ़ाक़त है
कश्ती को डुबाने की, साहिल की  इशारत  है

वो हाथ मिलाता है, रिश्तों को जगा कर के
ख़ंज़र भी चुभाता है , यह कैसी शरारत है

शीरी है ज़ुबां उसकी , क्या दिल में, ख़ुदा जाने 
हर बात में नुक़्ता चीं ,उसकी तो ये आदत है

जब दर्द उठा करता, दिल तोड़ के अन्दर से
इक बूँद भी आँसू की कह देती हिकायत है

इकरार नहीं करते ,’हां’ भी तो नहीं कहते
दिल तोड़ने वालों से, क्या क्या न शिकायत है

अब कोई नहीं मेरा, सब नाम के रिश्ते हैं
हस्ती से मेरी अपनी ताउम्र बग़ावत है

इक राह नहीं तो क्या ,सौ राह तेरे आगे
चलना है तुझे ’आनन’ कोई न रिआयत है

=आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

रफ़ाक़त = दोस्ती, सहभागिता

हिकायत = कथा-कहानी ,वृतान्त

रिआयत = छूट 



बुधवार, 28 जुलाई 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 09

 


कुछ अनुभूतियाँ : क़िस्त 09


1

नावाक़िफ़ मैं कैसे कह दूँ ,

इतनी तो नादान नहीं हो

प्यार मुहब्ब्त की बातों से

इतनी भी अनजान नहीं हो

 

2

प्रथम मिलन की यादें बाक़ी

आई थी तुम नज़र झुका कर

जाने किसकी  नज़र लग गई

चली गई तुम बाँह छुड़ा कर

 

3

वैसे थी तो बात ज़रा सी  

तुम ने तिल का ताड़ बनाया

ख़ता किसी की, सज़ा किसी को

मेरे सर इलजाम लगाया

 

4

बिना बताए चली गई तुम

 दिल के टुकड़े चुन कर जाती

मेरी थी क्या क्या  मजबूरी

 वह भी तो कुछ सुन कर जाती


-आनन्द.पाठक--


ग़ज़ल 189 : जो रंग अस्ल है ---

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ग़ज़ल 189

जो रंग अस्ल है वो दिखाएगा एक दिन

वो सरफ़िरा है होश में आएगा  एक दिन


नफ़रत के शह्र में भरा बारूद का धुआँ

पैग़ाम-ए-इश्क़ कोई सुनायेगा एक दिन


कुछ लोग हैं कि अम्न के दुश्मन बने हुए

यह वक़्त उनको खुद ही मिटाएगा एक दिन


किस बात पर गुरूर है ,किस बात का नशा

सब कुछ यहीं तू छोड़ के जाएगा एक दिन


हम तो इसी उमीद में करते रहे वफ़ा

वह भी वफ़ा का फ़र्ज़ निभाएगा एक दिन


वैसे हज़ार बार वो इनकार कर चुका

आने को कह गया है तो आएगा एक दिन


’आनन’ उमीद रख अभी आदम के हुनर पर

सूरज उतार कर यही लाएगा एक दिन


-आनन्द,पाठक-


रविवार, 25 जुलाई 2021

ग़ज़ल 188 :अगर मिलते न तुम मुझको

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ग़ज़ल 188

अगर मिलते न तुम मुझको, ख़ुदा जाने कि क्या होता
सफ़र तनहा मेरा होता कि दिल फिर रो दिया होता

हमें खुद ही नहीं मालूम किस जानिब गए होते
इधर जो मैकदा होता ,उधर जो बुतकदा  होता

चलो अच्छा हुआ, ज़ाहिद! अलग है रास्ता अपना
जो मयख़ाने के दर पर सामना होता तो क्या होता

निक़ाब-ए-रुख़ उठा लेते वो, मेरा दिल सँवर जाता
हक़ीक़त सामने होती ,मज़ा कुछ दूसरा होता

ये दुनिया भी किसी जन्नत से कमतर तो नहीं दिखती
हसद से या अना से तू जो बाहर आ गया होता

भले कुछ दो न झोली में ,ये दिल अपना फ़क़ीराना
फ़क़ीरों के लबों पर तो सदा हर्फ़-ए-दुआ होता

मुहब्बत भर गई होती सभी के दिल में जो”आनन’
तो फिर यह देखती दुनिया ज़माना क्या से क्या होता !

-आनन्द.पाठक-

हसद = ईर्ष्या ,जलन,डाह
अना = अहम , अहंकार ,घमंड