बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 303 [68इ] :वतन के हाल का उसको भी कुछ पता होता

 ग़ज़ल 303 [68इ]


1212---1122---1212---22


वतन के हाल का उसको भी कुछ पता होता

हसीन ख्वाब में गर वो न मुब्तिला होता


चिराग़ दूर से जलता हुआ नज़र आता-

जो उसकी आँख पे परदा चढ़ा नहीं होता


तुम्हारे हाथ में तस्बीह और ख़ंज़र भी

समझ में काश! यह पहले ही आ गया होता


सितम शिआर भी सौ बार सोचता तुझको

अगर तू वक़्त पे जो उठ खड़ा हुआ होता


तमाम दर्द ज़माने का तुम समेटे हो

कभी ज़माने से अपना भी ग़म कहा होता


क़लम, ज़ुबान नहीं आप की बिकी होती

ज़मीर आप का ज़िंदा अगर रहा होता ।


इधर उधर न भटकते तेरी तलाश में हम

तवाफ़ दिल का कभी हम ने जो किया होता


अना की क़ैद से बाहर वो जो निकल आता

सफ़र हयात का उसका भी खुशनुमा होता


हर एक दर पे झुकाता नहीं है सर ’आनन’

दयार आप का होता तो सर झुका होता ।


-आनन्द.पाठक-

तस्बीह = माला .सुमिरनी जो हाथ में लेकर फेरते हैं

तवाफ़ = परिक्रमा 



मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 302 [ 67इ] : [वैलन्टाइन 2023] पर एक हास्य गज़ल

 "वैलेन्टाइन डे पर-[2023]


हास्य ग़ज़ल 302 [ 67इ\]


1222---1222---1222---1222


इधर दिखती नहीं अब तुम, किधर रह्ती हो तुम जानम !

चलो मिल कर मनाते हैं ’ वेलनटाइन’ मेरी शबनम


दिया जो हार पिछली बार पीतल का बना निकला

सनम इस बार हीरे का नहीं दस लाख से हो कम


खड़े हैं प्यार के दुश्मन लगा लेना ज़र ’हेलमेट’

मरम्मत कर न दें सर का "पुलिसवाले" मेरे रुस्तम ! 


ज़माने का नहीं है डर करेगा क्या पुलिसवाला

अगर तुम पास मेरे हो नहीं दुनिया का है फिर ग़म


बता देती हूँ मैं पहले , नहीं जाना तुम्हारे संग

कि बस ’फ़ुचका’ खिला कर तुम मना लेते हो ये मौसम


इधर क्या सोच कर आया कि है यह खेल बच्चों का !

अरे ! चल हट निकल कंजड़, नहीं ’पाकिट’ में तेरे दम


घुमाऊँगा , खिलाऊँगा,  सलीमा भी दिखाऊँगा, 

ये वादा है अब ’आनन’ का, चली आओ मेरी हमदम !


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 301 [ 66इ] तुम्हारे हुस्न का जल्वा

 ग़ज़ल 301[66इ]


1222---1222---1222---1222


तुम्हारे हुस्न का जल्वा किसी को जब दिखा होगा

ख़ुमारी आजतक होगी नहीं उतरा नशा  होगा


ख़यालों में किसी के तुम कभी जो आ गए होगे

भला वह शख़्स अपने आप में फिर क्या रहा होगा


तुम्हे हूँ चाहता दिल से. फ़ना होने की हद तक मैं

न दुनिया को ख़बर होगी, तुम्हे भी क्या पता होगा


यकीं करना तुम्हारा राज़ मेरे साथ जाएगा

न घबराना कभी जानम ! सदा दिल में दबा होगा


कभी तुम लौट कर आना समझ लेना करिश्मा क्या

तुम्हारा नाम ले कैसे  कोई ज़िंदा रहा होगा


अगर ढूढोंगे शिद्दत से तो मिल ही जाएगा वो भी

तो मकसद ज़िंदगी का और ज़ियादा ख़ुशनुमा होगा


निगाह-ए-शौक़ से ढूँढा इसी उम्मीद से ’आनन’

कभी दैर-ओ-हरम में एक दिन तो सामना होगा


-आनन्द.पाठक--


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 300 [65इ] : आँधियों से तुम अगर यूँ ही डरोगे

 ग़ज़ल 300 [65इ]

2122--2122--2122


आँधियों से तुम अगर यूँ ही डरोगे

किस तरह लेकर दिया आगे बढ़ोगे


मंज़िले तो ख़ुद नहीं आतीं है चल कर

नीद से तुम कब उठोगे कब चलोगे ?


वक़्त का होता अलग ही फ़ैसला है

कर्म जैसा तुम करोगे, तुम भरोगे


 हो चुका उड़ना तुम्हारा आसमाँ में

तुम ज़मीं की बात बोलो कब करोगे


झूठ ही जब बोलना दिन रात तुमको

सच की बातें सुन के भी तुम क्या करोगे


कब तलक पानी पे खींचोगे लकीरे

कब तलक तुम झूठ को ही सच कहोगे


हक़ बयानी पर हैं वो पहरे बिठाए

अब नहीं ’आनन’ तो फिर तुम कब उठोगे ?


-आनन्द.पाठक-



बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 299 [64इ] : तुम्हें क्या दे सकूँगा मै---

 ग़ज़ल 299 [64इ]


1222--1222--1222--1222


तुम्हे क्या दे सकूँगा मै सिवा इक प्यार, होली में

प्रणय से है भरा उद्गार यही उपहार  होली  में


भले ही भूल जाओ तुम, गिला कुछ भी नहीं तुमसे

करूंगा याद मैं तुमको सनम सौ बार होली में ््


तेरी तसवीर में ही रंग भर कर मान लूँगा मै

मेरी चाहत हुई पूरी मेरी सरकार ! होली में


ये तुम भी जानती होगी  कि हसरत क्या जवाँ दिल की 

खुला रखना सनम इस बार घर का द्वार होली में


जब आता मौसिम-ए-गुल तो कली लेती है अँगड़ाई

बिना छेड़े ही बज उठते हॄदय के तार होली में


न रंगों का कोई मजहब, तो रंगों पर सियासत क्यों

सदा रंग-ए-मुहब्बत ही लगाना यार होली में 


न रखने हाथ देती हो झिड़क देती हो क्यो मुझको

सुना बूढ़े भी होते हैं जवाँ ,हर बार होली में


मुहब्बत का यही मौसम नहीं छोटा-बड़ा कोई

यही संदेश 'आनन' का सुनाना यार होली में


-आनन्द पाठक-