सोमवार, 9 मार्च 2026

ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

 ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---

1222----12222---1222---122


मुक़ाबिल सच के होते ही वो घबराने लगे हैं ।
अगर मैं सच भी बोलूँ, उनको अफ़साने लगे हैं ।

पले गमलों के ये पौधे चलेंगे धूप  में क्या !
ज़रा सी धूप होते ही ये मुरझाने ल्गे हैं ।

गया मौसम, गई ख़ुशबू, गई रौनक चमन की
जो अपने लोग थे अब दूर वो जाने लगे है ।

किनारे बैठ कर कुछ लोग बस बातें बनाते
गुहरवाले समंदर में उतर जाने लगे हैं ।

न दुनिया की ख़बर जिनको, नहीं अपनी ख़बर हो
ज़माने को वही सब लोग दीवाने लगे हैं ।

परिंदो को कहाँ फ़ुरसत कि मुड़ कर फिर वो देखें
पुराने शाख, आँगन, पेड़ बेगाने लगे हैं ।

मुहब्बत को समझते जो बहुत आसान ’आनन’
निभाने पर जो आती बात कतराने लगे हैं ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-





शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

मुक्तक 023

 मुक्तक 023

:1:

 मन से मैने तुमको
बस अपना माना है
मैं हूँ तेरी ’राधा’
तू मेरा ’कान्हा’ है ।

:2:
रंग अबीर गुलाल लगाए
होली के हैं शुभ दिन आए
भूल सभी रंजिश की बातें
दिल मस्ती  में झूमे गाए ।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है साहिब

 

ग़ज़ल 465[39-जी] : ये भी कैसा निज़ाम है, साहिब !

2122---1212--22

ये भी कैसा निज़ाम है , साहिब!
इश्क़ का, दिल गुलाम है साहिब !

जिस्म बस नाम ही का मेरा है
साँस तो उनके नाम है साहिब !

ज़िंदगी इक ग़ज़ल अधूरी है
ना मुकम्मल कलाम है साहिब !

आप आएँ तो दिल मुकद्दस हो 
आप का एहतराम  है साहिब !

सब के दिल में हो लौ मुहब्बत की
एक ही बस पयाम है साहिब !

एक ही राह के मुसाफ़िर सब
आख़िरत ही मक़ाम है साहिब !

हैफ़! क्या है नसीब ’आनन’ की
सुबह होते ही शाम है साहिब !

-आनन्द पाठक ’आनन’
880092 7181