क़िस्त 112/22 : चन्द माहिए [ नोक-झोंक -2]
1
बेबात का रगड़ा क्यों ?
हम तुम जब राजी
फिर व्यर्थ का झगड़ा क्यॊ ?
2
अच्छा जी, मियाँ, मजनू !
पिचके गालों पर
कितना है गुमाँ, मजनू !
3
सौगात में दिल अपना
देना है तुमको
मेरा है इक सपना
4
कुछ भी न मुझे सुनना
दो कौड़ी का दिल
लेकर भी क्या करना
-आनन्द पाठक”आनन’
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