अनुभूतियाँ 192/79
:1:
अपना ग़म तो अपना ग़म है
जिसको जीवन भर ढोना है
कौन यहाँ किसकी सुनता है
दुनिया भर से क्या रोना है ।
:2:
एक नशा मयखाने वाला
एक नशा है धन दौलत का
वो जो हवा में उड़ते रहते
जीते जीवन है गफ़लत का ।
:3:
जैसा चाहूँ वैसा तो यह
मिला नहीं करता है जीवन’
मिला नहीं करता है जीवन’
कभी मिला करता है मरुथल
कभी मिला करता है मधुबन ।
:4:
कभी मिला करता है मधुबन ।
:4:
रंग मंच पर कठपुतली सा
कौन नचाता है जीवन भर
और हमें भ्रम रहा हमेशा
हम हैं इस दुनिया से ऊपर।
और हमें भ्रम रहा हमेशा
हम हैं इस दुनिया से ऊपर।
-आनन्द पाठक ’आनन’-
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