शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

चंद माहिए 111/21 :

 चन्द माहिए  111/21 [ नोंक-झोंक के]

:1:

तुम चाँद से भी सुंदर

झील सी हैं आँखें

तुमसे न कोई बेहतर 

:2:

मस्का न लगाओ जी

पहले घर जा कर

मुँह धोकर आओ जी 

:3:

मुझसे भी कभी जुड़ कर

दिल सच्चा मेरा

देखो तो ज़रा मुड़ कर

:4:

बनते हो दिलवाले

जान रहीं हूँ मैं

तुम हो दिल के काले

:5:

मैं चाँद भी ला दूँगा

और सितारे भी

जुल्फ़ों में सजा दूँगा

:6:

हट ! सोच बड़ी सस्ती

दाँत नहीं मुँह में

करने को चला मस्ती

:7:

बेबात का रगड़ा क्यों ?

हम तुम जब राजी

फिर व्यर्थ का झगड़ा क्यॊ ?

:8:

अच्छा जी, मियाँ, मजनू !

पिचके गालों पर

कितना है गुमाँ, मजनू !


-आनन्द पाठक”आनन’
8800927181


सोमवार, 8 जून 2026

दोहा 027 : सामान्य दोहे

:1:
झूठे सारे आँकड़े,  झूठी सारी बात ।
टी0वी0 पर करता बहस, चीख रहा दिन रात ॥

:2:
कुछ ऐसे भी लोग हैं बाबा और फ़क़ीर ।
डाल गले में घूमते, सोने की ज़ंजीर ॥

गुरुवार, 4 जून 2026

कविता 034 : वही ढाक के तीन पात है

 कविता 034: वही ढाक के तीन पात हैं । 

[03 जून 2026 , नई दिल्ली ,मालवीय नगर इलाके के एक होटल में आग लगी और 21-22 आदमी
जल कर मर गए, कुछ झुलस गए। उस पर भी दुखद यह कि एक ही परिवार के 8-सदस्यों
की भी मृत्यु हो गई। व्यवस्था की लापरवाही का एक और उदाहरण । मामले की लीपा पोती, आश्वासनॊ का दौर
किसी को बख़्शा नही जाएगा --वही घिसे पिटे जुमले। यह दुर्घटना न पहली है न आख़िरी है ।
इस घटना पर उपजा एक सहज आक्रोश,  एक वेदनात्मक अनुभूति-एक कविता---।]


  कविता 034: वही ढाक के तीन पात है ।

आग लगी जब.
नीद खुली तब ।
मरने वाले मर गए, 
जलने वाले जल गए
कुछ झुलस गए ।

हम कुर्सी पर बैठे बैठे 
ढूँढ रहे हैं।
इसकी ग़लती, उसकी ग़लती
इसकी टॊपी, उसके सर
असर नहीं मोटी चमड़ी पर।
फोड़ ठीकरा औरों के सर।

कुछ न होगा।
चन्द दिनों तक शोर मचेगा
और बाद में धुँआ छँटेगा ।
हर घटना मे वही बात है।
वही ढाक के तीन पात हैं।

-आनन्द. पाठक ’आनन’-
 880092 7181