गुरुवार, 6 अक्तूबर 2022

ग़ज़ल 272 [37इ] : ज़िंदगी रंग क्या क्या दिखाने लगी

 ग़ज़ल 272 /37इ

212---212---212---212

बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम

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ज़िंदगी रंग क्या क्या दिखाने लगी

आँख नम हो भले मुस्कराने लगी


उसके रुख से जो पर्दा उठा यक बयक

रूबरू भी हुई, मुँह छुपाने लगी


सामने जब मैं उसको नज़र में रखा

फिर ये दुनिया नज़र साफ़ आने लगी


बागबाँ की नज़र, बदनज़र हो गई

हर कली बाग़ की खौफ़ खाने लगी


जब बनाने चला मैं नया आशियाँ

बर्क़-ए-ख़िरमन मुझे क्यों डराने लगी ?


आप की जब से मुझ पर इनायत हुई

ज़िंदगी अब मुझे रास आने लगी


तुमको ’आनन’ कहाँ की हवा लग गई

जो ज़ुबाँ झूठ को सच बताने लगी ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 

बर्क़-ए-ख़िरमन = आकाशीय बिजली

जो खलिहान तक जला दे


मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

ग़ज़ल 271 [ 36इ]: इक अजब अनजान सा रहता है डर

 ग़ज़ल 271/36 ई


2122---2122--212


इक अजब अनजान सा रहता है डर

आजकल मिलती नहीं उसकी ख़बर


लौट आएँगे परिन्दे शाम तक -

मुन्तज़िर है आज भी बूढ़ा शजर


देश की माटी हमारी ख़ास है

ज़र्रा ज़र्रा है वतन का सीम-ओ-ज़र


पत्थरों के शहर में शीशागरी

कब तलक क़ायम रहेगा यह हुनर


दास्तान-ए-दर्द तो लम्बी रही

और ख़ुशियों की कहानी मुख़्तसर


उलझने हों, पेच-ओ-ख़म हो या बला

काटना होगा तुम्हें ही यह सफ़र


सब्र कर ’आनन’ कभी वो आएगा

तेरी आहों का अगर होगा असर


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

मुन्तज़िर = इन्तज़ार में

सीम-ओ-ज़र   =चाँदी-सोना ,धन दौलत

शीशागरी  =  शीशे /कांच का काम

पेच-ओ-ख़म = मोड़ घुमाव 


मंगलवार, 27 सितंबर 2022

ग़ज़ल 270 [35 E] : तू उतना ही चलेगा---

 1222---1222--1222---1222
मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
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ग़ज़ल 27035   [E]

तू उतना ही चलेगा , वह तुम्हें जितना चलाएगा
भरेगा चाबियाँ उतनी तू जितना नाच पाएगा ।

हक़ीक़त जानता है वह, हक़ीक़त जानते हम भी
वतन ख़ुशहाल है अपना, वो टी0वी0 पर दिखाएगा

उजालों से इधर बातें ,अँधेरों से उधर यारी
खुदा जाने है क्या दिल में, नही वह सच बताएगा।

 ख़रीदेगा वो पैसों से, अगर बिकने पे तुम राजी
तुम्हें वह "पंच तारा" होटलों मे क्या छुपाएगा

ज़ुबाँ होगी तुम्हारी और उसकी बात बोलेगी
तुम्हें कहना वही होगा तुम्हें वह जो बताएगा

निगाहों में अगर खुद को नहीं ज़िंदा रखोगे तुम
ज़माना उँगलियों पर ही सदा तुमको नचाएगा

जो सुन कर भी नहीं सुनते, जो अंधे बन गए’आनन’
जगाने से नहीं जगते, उन्हें कब तक जगाएगा

-आनन्द.पाठक-

 



शनिवार, 24 सितंबर 2022

ग़ज़ल 269 [34 E]: आप की बात में वो रवानी लगी

 


ग़ज़ल 269 / 34 E


212---212---212---212


आप की बात में वो रवानी लगी

एक नदिया की जैसे कहानी लगी


आप जब से हुए हैं मेरे हमसफ़र

ग़मजदा ज़िंदगी भी सुहानी लगी


आप की साफ़गोई, अदा, गुफ़तगू

कुछ नई भी लगी कुछ पुरानी लगी


छोड़ कर वो गया करते शिकवा भी क्या

उसको शायद वही शादमानी लगी


झूठ के साथ सोते हैं जगते हैं वो

सच भी बोलें कभी लन्तरानी लगी


राह सबकी अलग, सबके मज़हब अलग

एक जैसी सभी की कहानी लगी


यह फ़रेब-ए-नज़र या हक़ीक़त कहूँ

ज़िंदगी दर्द की तरज़ुमानी लगी


एक तू ही तो ’आनन’ है तनहा नहीं

राह-ए-उलफ़त जिसे राह-ए-फ़ानी लगी


-आनन्द पाठक - 


गुरुवार, 22 सितंबर 2022

अनुभूतियाँ : किस्त 25

 

97

दो दिन की उस मुलाकात में

जीवन भर के सपने देखे,

पागल था दिल दीवाना था

औक़ात नहीं अपने देखे ।

  

98

टूट चुका है दिल अन्दर से

तुमको नहीं दिखाई देगा,

अन्दर अन्दर ही रोता है

तुमको नहीं सुनाई देगा ।

 

99

ऎ दिल ! क्यों सर पीट रहा है

बात ये क्या मालूम नहीं थी ?

जितना उसको समझ रहा था

वो उतनी मासूम नहीं थी ।

 

100

 हँस कर मिलना जुलना मेरा

दुनिया ने कमजोरी समझा,

मेरी ख़ामोशी को अकसर,

लोगों ने मजबूरी समझा