गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

कविता 033 : एक आदमी क़लम घिसता है --

  स्व0] कवि धूमिल जी की प्रेरणा से,  क्षमा याचना सहित ]---

एक आदमी 
क़लम घिसता है ।
एक आदमी कवि मंच की
गणेश परिक्रमा करता है 
एक तीसरा आदमी भी है
जो न क़लम घिसता है, 
न आयोजकों की परिक्रमा करता है ।
वह जुगाड भिड़ाता है
जुगाड़ करता है 
और पुरस्कार बटोरता है।
मैं पूछता हूँ 
"यह तीसरा आदमी कौन है"
साहित्य सभा इस प्रश्न पर मौन है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

ग़ज़ल 463[37-जी] :तुम मेरी इयादत क्या करते

 ग़ज़ल 463[37-जी] : तुम मेरी इयादत क्या करते

221---1222---112/22

बह्र-ए-हज़ज मुसद्दसअख़रब अब्तर

तुम मेरी इयादत क्या करते
बातिल हो, इनायत क्या करते

सुनना ही नहीं है जब तुमको
हम तुमको नसीहत क्या करते ।

माना कि हमारे तुम न हुए
दुनिया से शिकायत क्या करते

अपने न हुए जो अपने थे 
ग़ैरों की हिमायत क्या करते

हर  शै में तुम्हारा अक्स निहाँ
हम शौक़-ए-जियारत क्या करते

यह हुस्न तुम्हारा लासानी
हम इसकी क़िताबत क्या करते।

’आनन’ को नहीं समझा तुम ने
हम और वज़ाहत क्या करते ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-

बातिल हो = झूठे हो
इयादत   = हाल चाल पूछना
इनायत = मेहरबानी ,कृपा
लासानी = अद्वितीय , अनुपम
वज़ाहत = स्पष्टीकरण

बुधवार, 28 जनवरी 2026

ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा

 ग़ज़ल 462[36-जी] : वह आदमी है ऐसा---

221---2122  // 221---2122 

वह आदमी है ऐसा, ख़ुद को बड़ा बताता
बैठा जहाँ घड़ी भ, अपना ही गीत गाता ।

वह ख़ुदगरज़ है इतना, जब हाथ भी मिलाता
रिश्तों को अपने हक़ में, वह सीढ़ियाँ बनाता

ख़ामोशियाँ ये मेरी, कमज़ोरियाँ न समझो
अपनी ज़ुबाँ अदब की ,क्यों तुमको मुँह लगाता 

यह नौजवान नस्लें. अपनी पे जब हैं आतीं
हुंकार जब ये भरतीं, मुर्दा भी जाग जाता ।

अब वो चमन नहीं है, गुंचे हुए सयाने
माली को आजकल अब, ख़ातिर में कौन लाता?

बीती बहार कब की, अब तो ख़िज़ां का आलम
इन सूखी डालियों पर , कौन आशियाँ  बनाता !

कितना बचेगा ’आनन’, हर हाथ में है पत्थर
यह सरफ़िरों की बस्ती, क्यों आइना दिखाता ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-