इधर उधर की बात कर, भरमाता है रोज
झूठे झूठे आँकड़े, लाता है वह खोज ।।
:2:
पहले मन निर्मल करो, निर्मल करो सुभाय
तब मंदिर के द्वार पर , झुक कर शीश नवाय
:3:
अपनी डफली पीटता, बस अपना ही राग
औरों के हर काम में, ढूँढे सौ सौ दाग ।
:4:
जो नर जीता अहम में. रहिए उससे दूर
क्या समझेगा आप को, वह है मद में चूर ।
:5:
जो कुर्सी के लोभ में, बेच दिया ईमान
कभी भरोसा ना करें, वह हल्का इंसान ।
:6:
चाल चले दुरजन कुटिल, उसका अपना ढंग
मिलता है कुछ सुख उसे, करे रंग में भंग ।