अनुभूतियाँ 194/81
:1:
एक बार जो आ जाओ तुम
सुख दुख की बातें करनी है
कुछ अपनी पीड़ा कहनी है
और तुम्हारी कुछ सुननी है ।
अनुभूतियाँ 194/81
:1:
एक बार जो आ जाओ तुम
सुख दुख की बातें करनी है
कुछ अपनी पीड़ा कहनी है
और तुम्हारी कुछ सुननी है ।
ग़ज़ल 466[40-जी] : मुक़ाबिल सच के होते ही---
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मुक्तक 023
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