मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

चन्द माहिए : क़िस्त 97/07-वी [होली 2023]

 क़िस्त 97/07 [होली 2023] [माही उस पार]

1

होली के दिन आए

आए न बालमवा

मौसम भी तड़पाए


2

रंगों का है मौसम

खेल रहे कान्हा

राधा भी कहाँ है कम


3

है प्रेम का रंग ऐसा

रंग अलग कोई

चढ़ता ही नहीं वैसा


4

होली का मज़ा क्या है

रंग लगा मन पे

इस तन में रखा क्या है


5

गोरी हँस कर बोली

" मन ही नहीं भींगा

फिर कैसी यह होली


-आनन्द.पाठक-

इन्ही माहियों को गाया है डा0 अर्चना पाण्डेय और उनकी बेटी रश्मि ने [ युगल गायन]






चन्द माहिए : क़िस्त 96/06

 क़िस्त 96/06 [माही उस पार]

1

तुम पास जो आओ तो

प्यास मेरी देखो

खुल कर जो पिलाओ तो


2

कब प्यास बुझी सब की

नदियाँ प्यासी हैं

प्यासा है समन्दर भी


3-

इक बार ही नाम लिया

नाम तेरा लेकर

जग ने बदनाम किया


4

मैं कैसे कह पाता

छू देती  गर तुम

तन और महक जाता


5

मौसम महका महका

रंग लगा देना

मन है बहका बहका


-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 312[77इ] : चिराग़-ए-इल्म जिसका हो --

 ग़ज़ल 312


1222---1222---1222---1222


चिराग़-ए-इल्म जिसका हो, सही रस्ता दिखाता है
जहाँ होता वहीं से ख़ुद पता अपना बताता  है

शजर आँगन में, जंगल में कि मन्दिर हो कि मसज़िद मे
जो तपता ख़ुद मगर औरों पे वो छाया लुटाता है

समन्दर है तो क़तरा है, न हो क़तरा समन्दर क्या
ये रिश्ता दिल हमेशा ही निभाया है निभाता है

नज़र आता नहीं फिर भी तसव्वुर में है वह रहता
बहस मैं क्या करूँ इस पर नज़र आता, न आता है

हवेली माल-ओ-ज़र, इशरत जो जीवन भर जुटाते हैं
यही सब छोड़ कर जाते, कभी जब वह बुलाता है

इनायत हो अगर उनकी  तो दर्या रास्ता दे दे
करम उनका भला इन्साँ कहाँ कब जान पाता है

 जो संग-ए-आस्ताँ उनका हवा छूकर इधर आती 
मुकद्दस मान कर ’आनन’ ये अपना सर झुकाता है


-आनन्द.पाठक-

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शब्दार्थ

शजर = पेड़

माल-ओ-ज़र इशरत = धन संपत्ति, ऐश्वर्य वैभव

संग-ए-आस्ताँ  = चौखट

मुक़द्दस =पवित्र


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 311[76इ] :दिखा कर झूठ के सपने हमें भरमा रहे हो

 1222---1222---1222--122


एक ग़ज़ल 311 [76इ]


दिखा कर झूठ के सपने हमें भरमा रहे हो
जो जुमले घिस चुके क्यों बारहा रटवा रहे हो

अकेले तो नहीं तुम ही जो लाए थे उजाले
यही इक बात हर मौके पे क्यों दुहरा रहे हो

दिखा कर ख़ौफ़ का  मंज़र जो लूटे हैं चमन को
उन्हीं को आज पलकों पर बिठाए जा रहे हो

अगर शामिल नहीं थे तुम गुजस्ता साजिशों में
नही है सच अगर तो किस लिए  घबरा रहे हो ?

सबूतों के लिए तुम बेसबब हो क्यों परेशाँ
खड़ा सच सामने जब है तो क्या झुठला रहे हो

ये मिट्टी का बदन है ख़ाक में मिलना है इक दिन
ये इशरत चार दिन की है तो क्यों इतरा रहे हो

तुम्हारी कैफ़ियत ’आनन’ यही है तो कहेँ क्या  
जहाँ पत्थर दिखा बस सर झुकाते जा रहे हो


-आनन्द पाठक-

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ग़ज़ल 310[75इ] : हमें कब से वह शिद्दत से


ग़ज़ल 310 [75इ]

1222---1222---1222--122


हमे कब से वो शिद्दत से यही बतला रहा है
लहू के रंग कितने हैं  हमें समझा  रहा है

उसे भाता नहीं सुख चैन मेरी बस्तियों का
हवा दे कर बुझे शोलों को वो भड़का रहा है

फ़रिश्ता बन के उतरेगा न कोई आसमाँ से
बचे हैं जो उन्हें सूली चढ़ाया  जा रहा है

जो बाँटी 'रेवड़ी' उसने, दिखे बस लोग अपने
ज़माने को वह असली रंग अब दिखला रहा है

वो कर के दरजनो वादे हुआ सत्ता पे काबिज़
निभाने की जो पूछी बात तो हकला रहा है ।

इधर पानी भरा बादल तो आता है यक़ीनन
पता चलता नहीं पानी किधर बरसा रहा है

वो मीठी बात करता सामने हँस हँस कर ’आनन’
पस-ए-पर्दा वो टेढ़ी चाल चलता जा रहा है


-आनन्द.पाठक-

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शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 309 [74इ] : अवाम जो भी सुनाए उसे सुना करिए

 ग़ज़ल 309


1212---1122--1212--22


अवाम जो भी सुनाए उसे सुना करिए
हवा का रुख भी ज़रा देखते रहा करिए

हुजूम आ गया सड़कों पे तख़्तियाँ लेकर
कभी तो हर्फ़-ए-इबारत जरा पढ़ा करिए

हर एक बात मेरी फूँक कर उड़ा देना
हुजूर दर्द सलीक़े से तो सुना करिए

ज़ुबान आप की है आप को मुबारक हो
जलील-ओ-ख्वार तो कम से न कम किया करिए

तमाशबीन ही बन कर न देखिए मंज़र
जनाब वक़्त ज़रूरत पे तो उठा करिए

चला किए है अभी तक किसी के पैरों से
उतर के पाँव पे अपने, कभी चला करिए

सही है बात बुरा मानना नहीं ’आनन’
बँधी हो आँख पे पट्टी, किसी का क्या करिए


-आनन्द.पाठक-

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 308[73 इ] : इश्क़ क्या है, दो दिलों की बस्तगी है


ग़ज़ल 308

2122---2122---2122


इश्क़ क्या है? दो दिलों की बस्तगी है 
एक ने’मत है , खुदा की बंदगी  है

राह-ए-उलफ़त का सफ़र क्या तय करेगा
सोच में ही जब तेरी आलूदगी है

इश्क़ कब अंजाम तक पहुँचा हमारा
इक अधूरी सी कहानी ज़िंदगी है

लोग हैं खुशबख़्त जिनको प्यार हासिल
चन्द लोगों के लिए यह दिल्लगी है

आप का मैं मुन्तज़िर जब से हुआ हूँ
एक मैं हूँ इक मेरी शाइस्तगी है

दूसरा चेहरा नज़र आता नहीं अब
जब से मेरे दिल से उनकॊ लौ लगी है

आप आनन को भले समझे न समझें
दिल में मेरे आज भी पाकीजगी है ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

बस्तगी = लगाव खिंचाव

ने’मत = ईश्वरी कूपा

आलूदगी = खोट, मिलावट,अपवित्रता

मुन्तज़िर = प्रतीक्षक इन्तज़ार करने वाला

शाइस्तगी = शिष्टता शराफ़त

पाकीजगी =पवित्रता

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 307[72इ] : बात मे उसके रही कब पुख्तगी है

 ग़ज़ल 307

2122--2122--2122

 

बात में उसकी  रही कब पुख्तगी  है
सोच में साजिश भरी है, तीरगी है

एक चेहरे पर कई चेहरे लगाता
पर चुनावों में भुनाता सादगी है

लग रही है कुछ निज़ामत में कमी क्यों
लोग प्यासे हैं लबों पर तिश्नगी है

घर के आँगन में उठीं दीवार इतनी
मर चुकी आँखों की अब वाबस्तगी है

रोशनी देखी नहीं जिसने अभी तक
जुगनुओं की रोशनी अच्छी लगी है

चन्द लोगों के यहाँ जश्न-ए-चिरागाँ
बस्तियों में दूर तक बेचारगी है

भीड़ में क्या ढूँढते रहते हो ’आनन’
अब न रिश्तों में रही वो ताजगी है ।


-आनन्द पाठक-

शब्दार्थ 

पुख्तगी = दृढ़ता, स्थायित्व

निज़ामत = शासन व्यवस्था

वाबस्तगी = लगाव खिंचाव

जश्न-ए-चिरागाँ = रोशनी का त्यौहार

तीरगी = अँधेरा

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 306[71इ] : मंज़िल पे है नज़र मुझे काँटों का डर नहीं

 ग़ज़ल 306 [71 इ]

221---2121--1221---212


मंज़िल पे  है नज़र, मुझे काँटों का डर नहीं
छाले पड़े हैं पाँव में कहता मगर नही

पत्थर के देवता से ही अब कुछ उमीद है
गो, आँसुओं का उस पे भी होता असर नहीं

यह तो मकान और किसी का मकीन तू
दो दिन का है क़याम यहाँ, तेरा घर नहीं

ठोकर लगा के आप ने दिल तोड़ क्यों दिया
 क्या दिल गरीब का अभी है मोतबर नहीं ?
 
गो, हादिसे तमाम तेरे सामने हुए
उस पर दलील यह कि तुझे कुछ ख़बर नहीं 

दो-चार लाइनों में सुनाऊँ तो किस तरह
ये दास्तान ज़िंदगी की मुख़्तसर नहीं

जब इन्तखाब तुमको निगाहों ने कर लिया”
आनन’ को दूसरा कोई आता नज़र नहीं


-आनन्द.पाठक-

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 305[70इ] : निज़ाम आया नया है

 ग़ज़ल 305 [ 70इ]


1222---122


निज़ाम आया नया है
बयाँ सच का मना है

उधर आँसू गिरे हैं
इधर पत्थर गला है

अगर तुम चुप रहोगे
तो फिर मालिक ख़ुदा है

अमीर-ए-कारवाँ बन
हमे फिर छल रहा है

मेरी ख़ामोशियों का
किसी को क्या पता है

दिया नन्हा सही, पर
अँधेरों से लड़ा  है

सवालों के मुक़ाबिल
इधर ’आनन’ खड़ा है 


-आनन्द.पाठक-

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 304 [69इ] : सफ़र हयात का आसाँ मेरा हुआ होता

 ग़ज़ल 304 [69इ]

1212---1122---1212---22


सफ़र हयात का आसाँ मेरा हुआ होता 
हबीब आप सा कोई अगर मिला होता

निगाह आप ने मुझसे न फ़ेर लॊ होती
हक़ीर आप के कुछ काम आ गया होता

इधर उधर न भटकते तेरी तलाश में हम
तवाफ़ दिल का कभी हम ने कर लिया होता

अना की क़ैद से बाहर कभी नहीं निकला
अगर वो शख़्स निकलता तो कुछ भला होता

सज़ा गुनाह की मेरे न कुछ मिली होती
बयान आप ने ख़ारिज़ न कर दिया होता

जो दिल में आप की तसवीर हम नहीं रखते
ख़ुमार प्यार का अबतक उतर गया होता

हर एक दर पे झुकाता नहीं है सर ’आनन’
दयार आप का होता तो सर झुका होता ।


-आनन्द.पाठक-


तवाफ़ = परिक्र्मा करना

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बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 303 [68इ] :वतन के हाल का उसको भी कुछ पता होता

 ग़ज़ल 303 [68इ]

1212---1122---1212---22

वतन के हाल का उसको भी कुछ पता होता
हसीन ख्वाब में गर वो न मुब्तिला होता

चिराग़ दूर से जलता हुआ नज़र आता-
जो उसकी आँख पे परदा नहीं पड़ा होता

तुम्हारे हाथ में तस्बीह और ख़ंज़र भी
समझ में काश! यह पहले ही आ गया होता

क़लम, ज़ुबान नहीं आप की बिकी होती
ज़मीर आप का ज़िंदा अगर रहा होता ।

किसी के पाँव से चलता रहा है वो अकसर
मज़ा तो तब कि वह ख़ुद पाँव से चला होता

तमाम दर्द ज़माने का तुम समेटे हो
कभी ज़माने से अपना भी ग़म कहा होता

सितम शिआर भी सौ बार सोचता ’आनन’
सितम के वक़्त ही पहले जो उठ खड़ा होता

-आनन्द.पाठक-

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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 302 [ 67इ] : इधर दिखती नहीं अब तुम [वैलन्टाइन 2023 - हास्य ]

 "वैलेन्टाइन डे पर-[2023]


हास्य ग़ज़ल 302 [ 67इ]


1222---1222---1222---1222


इधर दिखती नहीं अब तुम, किधर रहती हो तुम जानम !
चलो मिल कर मनाते हैं ’ वेलनटाइन’ ्मेरी शबनम !

दिया जो हार पिछली बार पीतल का बना निकला
दिला दो हार  हीरे का नहीं दस लाख से हो कम

खड़े हैं प्यार के दुश्मन लगा लेना ज़रा ’हेलमेट’
मरम्मत कर न दें सर का "पुलिसवाले" मेरे रुस्तम ! 

ज़माने का नहीं है डर करेगा क्या पुलिसवाला
अगर तुम पास मेरे हो नहीं दुनिया का है फिर ग़म

बता देती हूँ मैं पहले , नहीं जाना तुम्हारे संग
कि बस ’फ़ुचका’ खिला कर तुम मना लेते हो ये मौसम

इधर क्या सोच कर आया कि है यह खेल बच्चों का !
अरे ! चल फ़ुट निकल टकले, नहीं ’पाकिट’ में तेरे दम

घुमाऊँगा , खिलाऊँगा,  सलीमा भी दिखाऊँगा, 
अब ’आनन’ का ये वादा है, चली आ ,ओ मेरी हमदम !


-आनन्द.पाठक-

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ग़ज़ल 301 [ 66इ] तुम्हारे हुस्न का जल्वा

 ग़ज़ल 301[66इ]


1222---1222---1222---1222


तुम्हारे हुस्न का जल्वा किसी को जब दिखा होगा
ख़ुमारी आजतक होगी नहीं उतरा नशा  होगा

ख़यालों में किसी के तुम कभी जो आ गए होगे
भला वह शख़्स अपने आप में फिर कब रहा होगा

तुम्हे हूँ चाहता दिल से. फ़ना होने की हद तक मैं
न दुनिया को ख़बर होगी, तुम्हे भी क्या पता होगा

यकीं करना तुम्हारा राज़ मेरे साथ जाएगा 
जमाने से दबा है यह जमाने तक दबा होगा

कभी तुम लौट कर आना समझ लेना करिश्मा क्या
तुम्हारा नाम रट रट कर , कोई ज़िंदा रहा होगा

अगर ढूढोंगे शिद्दत से तो मिल ही जाएगा वो भी
तो मकसद ज़िंदगी का और अपना ख़ुशनुमा होगा

निगाह-ए-शौक़ से ढूँढा इसी उम्मीद से ’आनन’
कभी दैर-ओ-हरम में एक दिन तो सामना होगा


-आनन्द.पाठक--

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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 300 [65इ] : आँधियों से तुम अगर यूँ ही डरोगे

 ग़ज़ल 300 [65इ]

2122--2122--2122


आँधियों से तुम अगर यूँ ही डरोगे
किस तरह लेकर दिया आगे बढ़ोगे

मंज़िले तो ख़ुद नहीं आतीं है चल कर
नीद से तुम कब उठोगे कब चलोगे ?

वक़्त का होता अलग ही फ़ैसला है
कर्म जैसा तुम करोगे, तुम भरोगे

 कब तलक उड़ते रहोगे आसमाँ में
तुम ज़मीं की बात आकर कब करोगे?

झूठ ही जब बोलना दिन रात तुमको
सच की बातें सुन के भी तुम क्या करोगे

कब तलक पानी पे खींचोगे लकीरे
और खुद विरदावली गाते रहोगे

हक़ बयानी पर यहाँ पहरे लगे हैं
अब नहीं ’आनन’ तो फिर तुम कब उठोगे ?


-आनन्द.पाठक-

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बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 299 [64इ] : ये दिल अपना है दिवाना (होली)

 ग़ज़ल 299 [64इ]


1222--1222--1222--1222

एक ग़ज़ल : होली पर

ये दिल अपना है दीवाना, हुआ दिलदार होली मे
चढ़ी है भाँग की मस्ती, लुटाए प्यार होली में

अभी तक आप से होती रही हैं 'फोन' पर बातें
यही चाहत हमारी है कि हो दीदार होली में

तुम्हे भी तो पता होगा, जवाँ दिल की है हसरत क्या.
खुला रखना सनम इस बार घर का द्वार होली में ।

उधर हैं राधिका रूठी, न खेलेंगी वो कान्हा से
इधर कान्हा मनाते हैं,  करें मनुहार होली में

जब आता मौसिम-ए-गुल तो कली लेती है अँगड़ाई.
बिना छेड़े ही बज उठते हॄदय के तार होली में ।

न रंगों का कोई मजहब, तो रंगों पर सियासत क्यों ,
सदा रंग-ए-मुहब्बत ही लगाना यार होली में।

न रखने हाथ देती हो झटक देती हो क्यो हँसकर ,
जवानों से जवाँ लगते हैं बूढ़े यार होली में ।

 नहीं छोटा-बड़ा कोई हुआ करता कभी ’आनन’
यही पैगाम देना है समन्दर पार,  होली में ।


-आनन्द पाठक-

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