बुधवार, 31 मार्च 2021

अनुभूतियाँ 07

 

अनुभूतियाँ  07

 

1

प्रेम स्नेह जब रिक्त हो गया

प्रणय-दीप यह जलता कब तक?

रात अभी पूरी बाक़ी है

बिन बाती यह चलता कब तक?

 

2

दुष्कर थीं पथरीली राहें-

हठ था कि तुम साथ चलोगी।

कितना तुम को समझाया था,

हर ठोकर पर हाथ मलोगी।

 

3

जीवन पथ का राही हूँ मैं,

एक अकेला कई रूप में ।

आजीवन चलता रहता हूँ,

कभी छांव में ,कभी धूप में।

 

4

बिना बताए चली गई तुम ,

क्या थी ग़लती,सनम हमारी।

इतना तो बतला कर जाती,

कब तक देखूँ राह तुम्हारी ।

 

-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 164 : ्जब कभी सच फ़लक से उतरा है

 ग़ज़ल 164
2212--1212--112/22
बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस 
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जब कभी सच फ़लकसे उतरा है
झूट को नागवार  गुज़रा है

बाँटता कौन है चिराग़ों को 
रोशनी पर लगा के पहरा  है

ख़ौफ़ आँखों के हैं गवाही में
हर्फ़-ए-नफ़रत हवा में बिखरा है

आग लगती कहाँ, धुआँ है कहाँ
राज़ यह भी अजीब  गहरा है

खिड़कियाँ बन्द हैं, नहीं खुलतीं
जब उजाला सहन में उतरा है

दौर-ए-हाज़िर की यह हवा कैसी?
सच  भी बोलूँ तो जाँ पे ख़तरा है ।

आज किस पर यकीं करे ’आनन’
कौन है क़ौल पर जो ठहरा है ?


-आनन्द.पाठक- 


शनिवार, 27 मार्च 2021

ग़ज़ल 163 : इश्क़ की राह पर चल दिए हो अगर---

 212---212---212---212


ग़ज़ल 163


इश्क़ की राह पर चल दिए हो, अगर

ख़ौफ़ क्यों हो ,भले रास्ता पुरख़तर ?


इत्तिफ़ाक़न कभी  आप आएँ इधर

देखिए ज़ौक़-ए-दिल, मेरा ज़ौक़-ए-नज़र


फिर न आये कभी उम्र भर होश में

देख ले आप को जो कोई भर नज़र


इश्क़ में डूब कर आप भी देखिए

कौन कहता है यह बेसबब दर्द-ए-सर


ये अलग बात है वो न अपना हुआ

उम्र भर जिसको समझा था लख़्त-ए-जिगर


खुद ही चल कर वो आयेंगे दर पर मेरे

मेरी आहों का होगा अगर पुरअसर


तुमने ’आनन’ को देखा, न जाना कभी

उसका सोज़-ए-दुरूँ और रक्स-ए-शरर


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

पुरख़तर = ख़तरों से भरा हुआ

ज़ौक़-ए-दिल = दिल की अभिरुचि

ज़ौक़-ए-नज़र = प्रेम भरी दॄष्टि

लख़्त-ए-जिगर - जिगर का टुकड़ा

सोज़-ए-दुरुँ = दिल की आग [प्रेम की]

रक्स-ए-शरर = [प्रेम की] चिंगारियों का नाच 


ग़ज़ल 162 : इक क़लम का सफ़र --

 ग़ज़ल 162
212---212---212---212
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन
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एक ग़ज़ल 162


इक क़लम का सफ़र, उम्र भर का सफ़र,
यूँ  ही चलता रहे,  बेधड़क हो निडर 

बात ज़ुल्मात से जिनको लड़ने की थी
बेच कर आ गए  वो नसीब-ए-सहर

जो कहूँ मैं, वो कह,जो सुनाऊँ वो सुन
या क़लम बेच दे, या ज़ुबाँ  बन्द कर 

उँगलियाँ ग़ैर पर तुम उठाते तो हो
अपने अन्दर न देखा, कभी झाँक कर 

तेरी ग़ैरत है ज़िन्दा तो ज़िन्दा है तू
ज़र्ब आने न दे अपनी दस्तार पर

झूठ ही झूठ की है  ख़बर चारसू
पूछता कौन है अब कि सच है किधर?

एक उम्मीद बाक़ी है ’आनन’ अभी
तेरे नग़्मों  का होगा कभी तो असर ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ -
ज़ुल्मात से = अँधेरों से 
सहर        = सुबह 
दस्तार पर = पगड़ी पर, इज्जत पर 
चारसू      = चारो तरफ़


शुक्रवार, 26 मार्च 2021

ग़ज़ल 161: न उतरे ज़िन्दगी भर जो--

 1222---1222---1222----1222
मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
 
एक ग़ज़ल होली पर
 
न उतरे ज़िन्दगी भर जो, लगा दो रंग होली में,
हँसीं दुनिया नज़र आए , पिला दो भंग होली में ।         
 
न उतरी है न उतरेगी, तुम्हारे प्यार की रंगत,
वही इक रंग सच्चा है, न हो बदरंग  होली में ।--          
 
कहीं ’राधा’ छुपी  फिरती, कहीं हैं गोपियाँ हँसतीं,
चली कान्हा कि जब टोली, करे हुड़दंग होली में ।      
 
’परे हट जा’-कहें राधा-’कन्हैया छोड़ दे रस्ता’
“न कर मुझसे यूँ बरज़ोरी, नहीं कर तंग होली में” ।    
 
गुलालों के उड़ें बादल, जहाँ रंगों की बरसातें,
वहीं अल्हड़ जवानी के फड़कते अंग होली में ।         
 
थिरकती है कहीं गोरी, मचलता है किसी का दिल
बजे डफली मजीरा हैं, बजाते चंग होली में ।             
 
सजा कर अल्पना देखूँ, तुम्हारी राह मैं ’आनन’
चले आओ, मैं नाचूँगी, तुम्हारे संग होली  में ।            
 
-आनन्द,पाठक-
 

रविवार, 21 मार्च 2021

अनुभूतियाँ 06 -- होली पर

 

[ होली की अग्रिम  शुभकामनाओं के साथ----

 कुछ अनुभूतियाँ   ----[ होली पर ]

1

खुशियों के हर रंग भरे हैं,

प्रीत मिला कर रंगोली में,

फ़ागुन आया, सपने आए,

तुम भी आ जाते होली में।

 

2

एक बार में धुल जायेगा,

इन रंगों में क्या रख्खा है,

अगर लगाना है तो लगाना,

प्रीत-प्रेम का रंग सच्चा है।

 

3

राधा करतीं मनुहारें हैं,

"देख न कर मुझ से बरजोरी

“छोड़ कलाई ,मोरी कान्हा!

बातों में ना आऊँ तोरी” ।

 

4

होली का मौसम आया है,

फ़गुनह्टा’ आँचल सरकाए।

मादक हुई हवाएँ, प्रियतम !

रह रह कर है मन भटकाए ।

 

5

छोड़ मुझे,जाने दे घर को,

कान्हा ! मार न यूँ पिचकारी।

बड़े जतन से बचा रखी है,

कोरी चुनरिया, कोरी सारी ।

 

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 6 मार्च 2021

अनुभूतियाँ 05

 अनुभूतियाँ 05


1

सच ही कहा था तुम ने उस दिन, 

" जा तो रही हूँ  सजल नयन से"

छन्द छन्द में उभरूँगी मैं,  

गीत लिखोगे कभी लगन से। "


2

सुख-दुख का ताना-बाना है,

जीवन है रंगीन  चदरिया ।

नयनो के जल से धोता हूँ,

हँसी खुशी यह कटे उमरिया।


3

बरसों से सच समझ रहे थे ,

लेकिन वह था भरम हमारा।

भला किया जो तोड़ गई तुम

आभारी दिल, करम तुम्हारा ।


4

दीप भले हो और किसी का

ज्योति प्रीत की आती तो है।

पीड़ा मेरी चुपके चुपके ,

किरनों से बतियाती तो है 


-आनन्द.पाठक-