शुक्रवार, 3 जून 2022

ग़ज़ल 241(06E) : तुम्हारी जालसाजी में उन्हें कुछ तो--

 ग़ज़ल 241

1222---1222---1222--1222

तुम्हारी जालसाजी में उन्हें कुछ तो दिखा होगा

उन्हें कुछ तो सबूतों में, बयानों मे मिला होगा


बिना पूछॆ सफ़ाई में जो चाहे सो कहो, लेकिन

धुआँ बिन आग का होता कहाँ ? तुमको पता होगा


तुम्हीं मुजरिम, तुम्ही मुन्सिफ़, गवाही में खड़े तुम ही

सियासत की है मजबूरी ,तुम्हें करना पड़ा होगा


हमें तुम क्या समझते हो, हमे सच क्या नहीं मालूम?

"हरिशचन्दर’ नहीं हो तुम ,ये तुमको भी पता होगा 


तुम्हारी झूठ की खेती, तुम्हारे झूठ का धन्धा

तुम्हारा "ऎड" टी0वी0 पर निरन्तर चल रहा होगा


वो कह कर तो यही आया 'बदलना है निज़ामत को'

ख़बर क्या थी कि "कुर्सी" के लिए अन्धा हुआ होगा


जहाँ अपनी सफ़ाई में सदाक़त ख़ुद क़सम खाती

समझ लो झूठ की जानिब यक़ीनन फ़ैसला होगा


कहें हम क्या उसे ’आनन’,  मुख़ौटॊं पर मुखौटे हैं

लिए मासूम सा चेहरा वो सबको छल रहा होगा 


-आनन्द.पाठक--
शब्दार्थ

निज़ामत = व्यवस्था

सदाक़त = सच्चाई

पोस्टेड 04-06-22

सोमवार, 23 मई 2022

ग़ज़ल 240 [05E] : दिल ने जो कहा मुझसे--

 ग़ज़ल 240 [05E]


221---1222 // 221--1222


दिल ने जो कहा मुझसे, मैं काश ! सुना होता

दुनिया को समझने में धोखा न हुआ होता


करता भी वुज़ू कैसे, मन साफ़ नहीं था जब

दिल और कहीं हो तो, क्या सज्दा भला होता


तक़रीर तेरी ज़ाहिद माना कि सही लेकिन

मेरा भी सनम कैसा, मुझसे भी सुना होता


कूचे से तेरे गुज़रा,  याद आए गुनह मेरे

दिल साफ़ रहा होता ,नादिम न हुआ होता


आग़ाज़-ए-मुहब्बत का होता है मुहूरत क्या

शिद्दत से कभी तुमने आग़ाज़ किया होता


औरों की तरह तुमने अपना न मुझे समझा

जो बात दबी दिल में ,मुझसे तो कहा होता


दुनिया के मसाइल में, उलझा ही रहा ’आनन’

फ़ुरसत जो मिली होती, दर तेरे गया होता ।


-आनन्द.पाठक-

वुज़ू = नमाज़ के पहले शुद्ध होना

तक़रीर = प्रवचन

आग़ाज़  = शुरुआत

मसाइल = मसले

पोस्टेड 18-06-22

रविवार, 22 मई 2022

ग़ज़ल 239 [04 E] : इश्क़ रुस्वा नहीं हुआ होता

 ग़ज़ल 239 [04 E]


2122---1212--112/22


इश्क़ रुस्वा नहीं हुआ होता

नाम उ्नका न जो लिया होता


ग़ौर से देखते जो तुम मुझको

दिल में इक आइना दिखा होता


सोचता हूँ मैं इक ज़माने से

तुम न होते अगर तो क्या होता


ज़िन्दगी में तमाम रंग भरे

रंग तेरा भी जो भरा होता


आदमी में न कुछ कमी हो तो

आदमी देवता बना होता


हिज्र होता है क्या समझ जाते

दिल कहीं आप का लगा होता


उम्र भर मुन्तज़िर रहा ’आनन’

वो जो दो पल को  आ मिला होता



-आनन्द.पाठक-


हिज्र = जुदाई ,वियोग

मुन्तज़िर = इन्तज़ार में प्रतीक्षारत


शुक्रवार, 20 मई 2022

ग़ज़ल 238 [03 E]: सुरूर उनका जो मुझ पर चढ़ा नहीं होता

 ग़ज़ल 238 [03E]


1212--1122---1212---22


सुरूर उनका जो मुझ पर चढ़ा नहीं होता 

ख़ुदा क़सम कि मैं खुद से जुदा नहीं होता


हमारे इश्क़ में कुछ तो कमी रही होगी

क्यूँ आजकल वो सितमगर ख़फ़ा नहीं होता


निगाह आप की जाने किधर किधर रहती

निगाह-ए-शौक़ से क्यूँ सामना नहीं होता


निशान-ए-पाँव किसी और के रहे होते

यक़ीन मानिए यह सर झुका नहीं होता


ख़याल आप का दिन रात साथ रहता है

ख़याल-ओ-ख़्वाब में खुद का पता नहीं होता


नज़र जो आप की मुझसे नहीं लड़ी होती

सुकून-ओ-चैन मेरा यूँ लुटा नहीं होता


सफ़र हयात का ’आनन’ भला कहाँ कटता

जो साथ आप का मुझको मिला नहीं होता


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ


सुरूर = चढ़ता हुआ नशा

पस-ए-पर्दा = पर्दे के पीछे से 


गुरुवार, 19 मई 2022

ग़ज़ल 237 [02E ] : मुहब्ब्त में अब वो इबादत कहाँ है

 ग़ज़ल 237 [ 02E]


122---122--122---122


मुहब्बत में अब वो इबादत कहाँ है

हुई अब तिजारत ,सदाक़त कहाँ है


जिधर से चलो तुम उधर रोशनी है

उठा दो जो पर्दा तो जुल्मत कहाँ है


जो नाज़-ओ-अदा से खड़ी सामने हो

तुम्हीं पूछती हो क़यामत कहाँ है


करम वो, नवाज़िश, मुरव्वत, इयादत

तुम्हारी पुरानी वो आदत कहाँ है 


नया दौर है यह नई रोशनी है

मुहब्बत में शिद्दत की रंगत कहाँ है


वो लैला, वो मजनूँ,वो शीरी, वो फ़रहाद

हैं पारीन किस्से ,हक़ीक़त कहाँ है


इस ’आनन’ से तुमको शिकायत बहुत है

रफ़ाक़त है तुमसे ,अदावत कहाँ है 


-आनन्द.पाठक- 

शब्दार्थ

जुल्मत =अँधेरा

इयादत = रोगी का हाल-चाल पूछना

पारीन = पुराने

रफ़ाक़त = दोस्ती

रविवार, 15 मई 2022

ग़ज़ल 236 [37 D]: तुम्हारी ज़ुल्फ़ को छू कर

 


1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 236[37 D]


तुम्हारी ज़ुल्फ़ को छू कर हवाएँ गा रहीं सरगम

तुम्हे जब देख लेती हैं नशे में झूमती  हरदम


हमेशा पूछती कलियाँ बता ऎ बाग़वाँ मेरे !

चमन में कौन आता है बहारों का लिए मौसम


न कोई अब तमन्ना है, न कोई आरज़ू बाक़ी

हुए जब से हमारे तुम ख़ुशी का है इधर आलम


फ़रिश्तों ने बताया था तुम्हारी कैफ़ियत सारी

वही सच मान कर हर्फ़न इबादत कर रहे हैं हम


ज़ुबाँ जब दे दिया तुमको, निभाना जानता भी हूँ

कभी तुम आजमा लेना रहूँगा मैं सदा क़ायम


न कोई शर्त होती है, न शिकवा ही मुहब्बत में

मुहब्बत का सफ़र होता लब-ए-दम तक मेरे जानम 


तसव्वुर मे , ख़यालों में, तुम्हारा मुन्तज़िर ’आनन’

मुजस्सम तुम चले आते तो मिट जाते हमारे ग़म 


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

 कैफ़ियत =ब्यौरा, विवरण

हर्फ़न     = अक्षरश:

लब-ए-दम  तक =आखिरी साँस तक

मुन्तज़िर = प्रतीक्षारत

मुजस्सम = सशरीर


गुरुवार, 12 मई 2022

ग़ज़ल 235[03 D] : हालात-ए-ख़ुमारी में

 ग़ज़ल 235[03 D]


221--1222 //221---1222


हालात-ए-खुमारी में जाने मैं किधर आया

मालूम नहीं मुझको कब यार का दर आया


कैसी ये कहानी है तुमने जो सुनाई है

सीने में छुपा मेरा इक दर्द उभर आया


है कौन यहाँ ऐसा जिसको न मिला ग़म हो

हर बार तपा हूँ मैं, हर बार निखर आया


जीवन का सफ़र है क्या? मर मर के यहाँ जीना

कालीन बिछी राहें ?, ऐसा न सफ़र आया


आती है सदा किसकी करता है इशारे कौन?

कोई तो यक़ीनन है लेकिन न नज़र आया


जीवन के सफ़र में, हाँ ,ऐसा भी हुआ अकसर

ज़ुल्मत न उधर बीती, सूरज न इधर आया


दुनिया के झमेलों में, उलझा ही रहा ’आनन’

जब आँख खुली उसकी, तब लौट के घर आया


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

ज़ुल्मत = अँधेरा ,तीरगी


बुधवार, 11 मई 2022

आवाज़ 003 :एक अनुभूति


एक अनुभूति और 

बीती रातों की  बातें सब

मुझको कब सोने देती हैं ?

कस्म तुम्हारी खड़ी सामने

मुझको कब रोने देती हैं ?


-आनन्द.पाठक-


आवाज़ 002 : एक अनुभूति



एक अनुभूति  और

रात रात भर जग कर चन्दा

ढूँढा करता किसे गगन में ?

थक कर बेबस सो जाता है

दर्द दबा कर अपने मन में ।

-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 10 मई 2022

ग़ज़ल 234[98] : ज़िंदगी ग़म भी शादमानी भी

 ग़ज़ल 234[98]


2122---1212---22


ज़िंदगी ग़म भी शादमानी भी

इक हक़ीक़त भी है कहानी भी


हादिसे कुछ ज़मीन के आइद

कुछ बलाएँ भी आसमानी भी


प्यार मेरा पढ़ेगी कल दुनिया

एक राजा था एक रानी भी


तेरे अन्दर ही इल्म की ख़ुशबू

तेरे अन्दर ही बदगुमानी भी


अब न आएगा लौट कर  बचपन

अब न लौटेगी वो जवानी भी


दर्द अपना बयान करता है

कुछ तो आँखों से कुछ ज़ुबानी भी


लुत्फ़ है ज़िन्दगी अगर ’आनन’

साथ में तल्ख़-ए-ज़िंदगानी भी


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 233 [97] : जन्नत से वो निकाले--

 ग़ज़ल 233[97]


221--2122 // 221--2122


जन्नत से है  निकाला , हमको मिली सज़ा है

दिल आज भी हमारा ,उतना ही बावफ़ा है


तेरी नज़र में शायद , गुमराह हो गया हूँ

मैने वही किया है , इस दिल ने जो कहा है


जब तक नहीं मिले थे, सौ सौ ख़याल मन में

जब रूबरू हुए वो , सजदे में सर झुका है 


रहबर की शक्ल में थे, किरदार रहजनों -सा

दो-चार गाम पर ही, यह कारवाँ लुटा है


ज़ाहिद की बात अपनी, रिंदो की बात अपनी

दोनों के हैं दलाइल, दोनों को सच पता है


जो कुछ वजूद मेरा, तेरी ही मेहरबानी

आगे भी हो इनायत, बस इतनी इल्तिजा है


आरिफ़ नहीं हूँ ’आनन’, इतना तो जानता हूँ

दिल में न हो मुहब्बत,  फिर तो वो लापता है ।


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

गाम = क़दम

दलाइल = दलीलें ,तर्क [ दलील का ब0व0\

ज़ाहिद  = धर्मोपदेशक

रिंद      = शराबी

आरिफ़ = तत्व ज्ञानी, ध्यानी, ज्ञाता

पोस्टेड 28-05-22




आवाज़ 010

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आवाज़ 009

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आवाज़ 008

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आवाज़ 006

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आवाज़ 005

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आवाज़ 004

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सोमवार, 9 मई 2022

आवाज़ 001 : अनुभूति


एक अनुभूति मेरी आवाज़ में 

                क़तरा क़तरा दर्द हमारा
                हर क़तरे में एक कहानी
                शामिल है इसमे दुनिया की
                मिलन-विरह की कथा पुरानी

-आनन्द.पाठक--

गुरुवार, 5 मई 2022

ग़ज़ल 232[96] : हमारी सोच में चन्दन की ख़ुशबू है

 


ग़ज़ल 232

1222---1222---1222----1222


हमारी सोच में चन्दन की खुशबू है, मेरी थाती

तुम्हारी सोच नफ़रत से नहीं आगे है बढ़ पाती


चमन अपना, वतन अपना, ये कलियाँ फूल सब अपने

वो नफरत कौन सी ऐसी कि जो पत्थर है चलवाती


तुम्हारे रहबरों ने की अँधेरों की तरफ़दारी

नहीं पूछा किसी ने रोशनी क्यों घर नहीं आती


कहाँ होता है कोई फ़ैसला तलवार ख़ंज़र से

अगर मिल बैठ कर जो बात करते बात बन जाती


दिया तनहा तुम्हें दिखता है लेकिन है नहीं तनहा

दुआएँ अम्न की है साथ उसके, जल रही बाती


सभी अपनी ग़रज़ से हैं सियासत के बने मोहरे

ये दुनिया है जहाँ मौक़ा मिले तो चाल चल जाती


ये उनका काम है ’आनन’, लड़ाना और लड़वाना

तुम्हें उनकी खुली साज़िश समझ में क्यॊं नही आती


-आनन्द.पाठक-



गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 231[95] : ह्स्र--ए-उलफ़त तुम्हे पता होगा

 ग़ज़ल 231[95]

2122---1212---22

हस्र-ए-उलफ़त तुम्हें पता होगा !
जब हक़ीक़त से सामना  होगा

वक़्त सबका हिसाब रखता है
फिर तुम्हारी अना का क्या होगा?

आग दामन को छू रही है, वो
मजहबी खेल में लगा होगा ।

गर्म होने लगी हवाएँ  हैं-
सानिहा फिर कोई नया होगा

ख़्वाब टूटा तो ग़मज़दा क्यों हो ?
 इक नया रास्ता खुला होगा

जो भी होना है वो तो होना है
तेरी क़िस्मत में जो लिखा होगा

 उस से अब भी उमीद है ’आनन’
एक दिन वह भी बावफा होगा ।


-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 25 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 230 [94] : ख़ुदाया काश वह मेरा--

 ग़ज़ल 230 [94]

1222---1222---1222---1222


ख़ुदाया ! काश वह मेरा कभी जो हमनवा होता

उसी की याद में जीता, उसी पर दिल फ़ना होता


कभी तुम भी चले आते जो मयख़ाने में ऎ ज़ाहिद !

ग़लत क्या है, सही क्या है, बहस में कुछ मज़ा होता


किसी के दिल में उलफ़त का दिया जो तुम जला देते

कि ताक़त रोशनी की क्या ! अँधेरों को पता होता 


उन्हीं से आशनाई भी , उन्हीं से है शिकायत भी

करम उनका नहीं होता तो हमसे क्या हुआ होता


नज़र तो वो नहीं आता, मगर रखता ख़बर सब की

 जो आँखें बन्द करके देखता, शायद दिखा होता 


वो आया था बुलाने पर, वो पहलू में भी था बैठा

निगाहेबद नहीं होती , न मुझसे वो ख़फ़ा होता


निहाँ होना, अयाँ होना, पस-ए-पर्दा छुपे रहना

वो बेपरदा चले आते समय भी रुक गया होता


हसीनों की निगाहों में बहुत बदनाम है ’आनन’

हसीना रुख बदल लेतीं, कभी जब सामना होता


-आनन्द.पाठक-

पोस्टॆड 30-04-22

रविवार, 24 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 229 [40] : अगर सच से न घबराते

 


1222--1222--1222-1222


ग़ज़ल 229 [40]

अगर सच से न घबराते, तो मंज़र और कुछ होता
गुनाहों से जो बाज़ आते, तो मंज़र  और कुछ होता

तुम्हारे हाथ में माचिस, चिराग़ों को जलाते तुम
उजाला दिल में फैलाते, तो मंज़र और कुछ होता

बना कर सीढ़ियाँ तुमको, वो तख़्त-ओ-ताज तक पहुँचे
अगर तुम बिक नहीं जाते, तो मंज़र और कुछ होता

बना ली दूरियाँ तुमने, इन आक़ाओं के कहने पर
न कहने में अगर आते , तो मंज़र और कुछ होता

डराते हैं तुम्हे हर दिन, कहीं यह ’वोट’ ना फिसले
अगर तुम डर नहीं जाते, तो मंज़र और कुछ होता

ग़रज उनकी जो होती है, तुम्हे मोहरा बनाते है
न आपस में वो लड़वाते, तो मंज़र और कुछ होता

यहाँ पर कौन है किसका, सभी मतलब के हैं ’आनन’
कभी तुम बेग़रज़ आते, तो मंज़र और कुछ होता


-आनन्द.पाठक-



शनिवार, 23 अप्रैल 2022

एक सूचना ---अनुभूतियों के रंग [ गीति काव्य]

 


मित्रो !

 

कुछ दिपहले, आप लोगों से अपनी एक किताब ’अनुभूतियॊं के रंग’ [ गीति-काव्य] का आवरण पृष्ठ साझा किया था जिस पर आप लोगों की उत्सावर्धक टिप्पणियाँ  मिलीं । उसी क्रम में –यह सूचित करते हुए हर्ष का अनुभव हो रहा है कि उक्त संग्रह अब छप कर बाज़ार में आ गया है जिसके मिलने का पता है ---

 

संजय जी

अयन प्रकाशन

जे-19/39 राजापुरी. उत्तम नगर , नई दिल्ली-59

Email : ayanprakashan@gmail.com

Website : www.ayanprakashan.com

 

मोबाइल नं0/व्हाट्स अप नं0----92113 12372 पर भी सम्पर्क किया जा सकता है।

यह संग्रह अमेज़ान पर भी उपलब्ध है --लिंक है

https://www.amazon.in/s?i=merchant-items&me=A2UV5DLW4L6UU7&page=2&marketplaceID=A21TJRUUN4KGV&qid=1650948545&ref=sr_pg_2

 

 

इस पुस्तक को आशीर्वचन मेरे प्रवासी मित्र श्री राकेश खंडेलवाल जी ने दिया है जो वर्तमान में अमेरिका में रहते है संभवत: आप लोग उनकी गीत-साधना से परिचित  होंगे।  खंडेलवाल जी स्वयं गीत विधा के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं । कहते हैं उनके गीतों को गुनगुनाना तो आसान है पर भाव समझना ज़रा मुश्किल इस संग्रह के बारे में उन्हीं के शब्दों में ---

 

------भाई आनंद पाठक के लेखन की विभिन्न शैलियों में उनकी रचनात्मकता का सुसज्जित आभूषण युक्त रूप सँवर कर सामने आता है। उनकी रचनाएँ अनुभूति की प्रगाढ़ता और अभिव्यक्ति की परिपक्वता से समृद्ध हैं। व्यंग्य,  गजल,  गीत और कविता के विविध आयामों में उनके विचार और अनुभव का प्रखर क्षेत्र दृष्टिगोचर होता है ।

इस संग्रह के बारे में, मैं इतना ही कह सकता हूँ—---अनुभूतियाँ होती है तो  अनुभूतियों के रंग भी होते हैं।

            जब तक मनुष्य में चेतना है , अनुभव होते रहेंगे अनुभूतियाँ होती रहेंगी ।कभी सुख की , कभी दुख की .कभी मिलन की ,कभी जुदाई की। । यही अनुभूतियॊ के रंग हैं यही जीवन के रंग भी हैं,  इन्द्रधनुष के रंगों की तरह बँधे हुए। जीवन क्या है? अनुभूतियों का एक -“ कैलिडियोस्कोप”-है । जितनी बार घुमाइए हर बार एक नए रंग का ’पैटर्न’ बनता  नज़र आता है , कभी आशा का , कभी निराशा का। यानी

शम्मअ’ हर रंग में जलती है सहर होने तक-----------[[ग़ालिब ]

            ये अनुभूतियाँ मुक्त बदलियों की तरह मानस पटल पर  किस कोने से,  कहाँ से उमड़्ती  है , बरसती हैं , तन-मन भिगोती हैं और फिर कहाँ चली जाती हैं-पता नहीं। कभी कभी तो मात्र उमड़ती-घुमड़ती भर है और-बिना बरसे ही चली जाती है  तरसा कर। इन बदलियों  के रंग भी मेरी वेदनाऒ के रंग की तरह , कभी श्वेत,कभी श्याम  कभी भूरे , कभी घनी वेदनाओं की तरह काले काले।और जब बरस जाती हैं तो मन हल्का हो जाता है --रुई के फ़ाहे की तरह। -शुभ्र-धवल निश्छल मन  

कुछ अनुभूतियाँ इसी संग्रह से इस पटल पर समय समय पर लगाता रहा हूँ और आप लोगों का आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है ।

इसी संग्र्ह से कुछ और  अनुभूतियाँ आप लोगों के के लिए लगा रहा हूँ –शायद पसन्द आए।


पर्वत जितना धीर-अटल हो

उसके अन्दर भी इक दिल है

दर्द उसे भी होता रहता

दुनिया क्यों इस से ग़ाफ़िल है ।

 

00                                  00

 

कतरा क़तरा आँसू मेरे

जीवन के मकरन्द बनेंगे

सागर से भी गहरे होंगे

पीड़ा से जब छन्द बनेंगे।

 

00   -----00

 

 

सच ही कहा था तुम ने उस दिन

"जा तो रही हूँ सजल नयन से"

छन्द छन्द बन कर उतरूँगी

गीत लिखोगे अगर लगन से ।"

Xx         xx         xx

 

सच का साथ न छोड़ा मैने,

द्वन्द  रहा आजीवन मन में.

साँस साँस बन हर पल उतरी,

’अनुभूति’ मेरे जीवन में ।

 

Xx         xx         xx

 

प्रेम समर्पण एक साधना

चलता नहीं दिखावा इसमें

पाने की कुछ चाह न रहती

बस देना ही देना जिसमें              

 

 

काल चक्र को चलना ही है

कोई गिरता, उठता कोई

जीवन और मरण का सच है

कोई सोता ,जगता कोई ।

 

मेरे मन की इस दुनिया में

एक तुम्हारी भी दुनिया थी

आज वहाँ बस राख बची है

जहाँ कभी अपनी बगिया थी

 

ऐसी ही बहुत सी अनुभूतियाँ  इस संग्रह में संग्रहित हैं  

कुछ इश्क-ए-हक़ीक़ी की , कुछ इश्क़-ए-मजाज़ी की।
कुछ ग़म-ए-जानां की, कुछ ग़म-ए-दौरां की ।

 

आशा है यह संग्रह आप को पसन्द आएग।

 

सादर  

           -आनन्द.पाठक-

8800927181

ग़ज़ल 228 [92] सबक़ उलफ़त का दुहराते---

 ग़ज़ल 228 [92]


1222--1222---1222--1222


सबक़ उलफ़त का पढ़ आते ,नज़ारा और कुछ होता

अगर नफ़रत न फैलाते , नज़ारा और कुछ होता ।


जहाँ पत्थर थे बरसाए, जहाँ तलवार लहराए

वहाँ गर फूल बरसाते ,नज़ारा और कुछ होता ।


जलाते जा रहे हो बस्तियाँ, दूकाँ ,मकाँ ,छप्पर

ज़हानत पर उतर आते, नज़ारा और कुछ होता ।


अगर तुम क़ैद ना करते चमन के रंग, ख़ुशबू तो

सुमन हर डाल खिल जाते, नज़ारा और कुछ होता ।


फ़रेबी रहनुमाओं के जो चालों में न तुम फँसते

निकल बाहर चले आते, नज़ारा और कुछ होता ।


सियासत भी है मज़हब में, बने हैं क़ौम के लीडर

इरादे जो समझ जाते ,नज़ारा और कुछ होता ।


इधर भी सरफ़िरे कुछ हैं  उधर भी सरफ़िरे ;आनन’ 

तराने प्यार के गाते, नज़ारा और कुछ होता ।


आनन्द.पाठक



मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 227 [91]: यूँ उनकी शान के आगे है--

 ग़ज़ल 227 [91]


1222--1222--1222--12


यूँ उनकी शान के आगे है  मेरी शान क्या  !

इनायत हो न जब उनकी मेरी पहचान क्या !


हवा नफ़रत जो फ़ैलाए तो है किस काम की

न फैलाएअगर ख़ुशबू हवा का मान क्या


गिरह तू चाहता है खोलना ,खुलती नहीं

तेरा अख़्लाक़ क्या है ताक़त-ए-ईमान क्या  !


शराइत हैं हज़ारों जब, हज़ारों बंदिशें

तुम्हारे दर तलक जाना कहीं आसान क्या !


दिखाता राह इन्सां को मुहब्बत का दिया

जले ना आग सीने में तो फिर इन्सान क्या


कभी तुमने नहीं देखा ख़ुद अपने आप को

वगरना ज़िंदगी होती कभी अनजान क्या


जो कहना चाहते हो तुम ज़रा खुल कर कहो

तुम्हारी चाहतें क्या ,ख़्वाब क्या, अरमान क्या


अक़ीदत हो तुम्हारे दिल में हो जो हौसला

तो  ’आनन’ सामने हो आँधियाँ तूफ़ान क्या !


-आनन्द.पाठक-


शराइत = शर्तें

अक़ीद्त = श्रद्धा विश्वास


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

गीत 74 : कहने को तो शिल्पी हैं

  गीत 74


कहने को तो शिल्पी हैं कुछ शब्द रचा करते हैं

लेकिन कितने भाव है कि अव्यक्त रहा करते हैं


शब्द अगर हों अस्त-व्यस्त तो भाव कहाँ कब ठहरे

सही शब्द हो सही जगह पर अर्थ हुए हैं गहरे

आँसू की हर एक बूँद ख़ुद कहती एक कहानी ,

बाँधू कैसे शब्दों में जब अक्षर अक्षर  बिखरे ।


जब तक पारस परस न हो तो शब्द नहीं खिल पाते

शब्द कोश में पड़े पड़े अभिशप्त  रहा करते हैं ।


पत्थर तो पत्थर ही रहता शिल्पकार ना मिलता

अनगढ़ पत्थर में जब तक वह रंग-प्राण ना भरता

अपने कौशल कला शक्ति से ऐसे शैल तराशे

बोल उठा करती हैं प्रतिमा जब जब पत्थर गढ़ता


भाषा नहीं कला की कोई भाव-भंगिमा होतीं

जब जब बातें करती, हम आसक्त रहा करते हैं


माँ की ममता का शब्दों से कैसे थाल सजाऊँ ?

या विरहिन के आँसू का मैं दर्द कहाँ कह पाऊँ ?

कल कल करती नदिया बहती गाती अपनी धुन में

उसी राग में उसी लहर पर कैसे गीत सुनाऊँ ?


गूंगे के गुड़-सी अनुभूति व्यक्त कहाँ हो पाती ?

जितना संभव गाते हैं , आश्वस्त रहा करते हैं ।


-आनन्द.पाठक-


बुधवार, 13 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 226 [90] : बुजुर्गों की दुआएँ हो तो

 ग़ज़ल 226 [90]


1222---1222--1222--1222


बुजुर्गों की दुआएँ  हो तो हासिल हर ख़ुशी होगी

उन्हीं से रहबरी होगी, उन्हीं से रोशनी  होगी


न हुस्ना हमसफ़र कोई, न काँधे पर टिका सर हो

मुहब्ब्त के बिना भी ज़िंदगी क्या ज़िंदगी होगी


हमें मालूम है उनकी बुलंदी की हक़ीक़त क्या

क़लम गिरवी रखी होगी ज़ुबाँ उनकी  बिकी होगी


वो आया था यही कह कर बदल देगा ज़माने को

सियासत में उलझ कर बात उसकी रह गई होगी


समझ कर भी न समझो तो फिर आगे और क्या कहना

तुम्हारी सोच में शायद कहीं कोई कमी होगी


जो नफ़रत से भरा हो दिल नज़र कुछ भी न आएगा

मुहब्ब्बत से जो भर लोगे ख़ुदा की बंदगी होगी


सही क्या है ग़लत क्या है न समझोगे कभी ’आनन’

कि जबतक आँख पर ख़ुदगर्ज़ की पट्टी बँधी होगी



-आनन्द पाठक-


रविवार, 10 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 225 [89] : मुलव्विस हूँ हमेशा मैं---

 

ग़ज़ल 225 [89]

1222-----1222-----1222----1222


मुलव्विस हूँ हमेशा मै, गुनाहों में, ख़ताओं में

मगर वो याद रखता है, मुझे अपनी दुआओं मे

 

रहूँ या ना रहूँ कल मैं ग़ज़ल मेरी मगर होंगी

जो ख़ुशबू बन के फैलेंगी ज़माने की हवाओं में

 

नजूमी तो नहीं हूँ मैं मगर इतना तो कह सकता

सुनाऊँ दास्ताँ अपनी तो गूँजेंगी फ़िज़ाओं में

 

कभी शे’र-ओ-सुख़न मेंरे सुनोगे जो अकेले में

छ्लक आएँगे दो आँसू तुम्हारी भी निगाहों में

 

रफ़ाक़त अब नहीं वैसी कि पहले थी कभी जैसी

मगर शामिल रहोगी तुम सदा मेरी दुआओं में

 

नज़ाक़त भी, तबस्सुम भी, लताफ़त भी, क़यामत भी

कहीं मैं खो नहीं जाऊँ तुम्हारी इन अदाओं में

 

ख़ला में बारहा तुमको पुकारा नाम लेकर मैं

सदा आती है किसकी लौट कर आती सदाओं में

 

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 224 : एक रिश्ता जो ग़ायबाना है

 

ग़ज़ल 224

2122—1212—22

 

एक रिश्ता जो ग़ायबाना1 है ,

उम्र भर वह हमें निभाना है ।

 

इतनी ताक़त दे ऎ ख़ुदा मेरे !

आज उनसे नज़र मिलाना है ।

 

शेख जी ! फिर वही रटी बातें ?
और क्या कुछ नया बताना है ?

 

रंग-सा घुल गई समन्दर में ,

बूँद का बस यही फ़साना है ।

 

वो पुकारेगा जब कभी मुझको,

काम हो लाख , छोड़ जाना है।

 

तेरी आदत वही पुरानी है -

ज़ख़्म देकर के भूल जाना है ।

 

बात सबकी सुना करो ’आनन’ ,

जो कहे दिल वो आज़माना है ।

 

-आनन्द.पाठक-

 

1-    1- परोक्ष में. छिपा छिपा

सोमवार, 4 अप्रैल 2022

ग़ज़ल 223 : अनाड़ी था नया था राहबर

 

ग़ज़ल 223

1222---1222---1222---1222


अनाड़ी था, नया था, राहबर था बदगुमाँ मेरा

कि उसकी रहबरी में लुट गया है कारवाँ मेरा

 

धुआँ जब फेफड़ॊ में था, जलन आँखों में थी उसकी

 मिली जी भर खुशी उसको जला जब आशियाँ मेरा

 

ज़माने की हवाओं से मुतासिर हो गया वह तो

कि अपनी पीठ खुद ही थपथापाता हमज़ुबाँ मेरा

 

चमन मेरा, वतन मेरा, सभी मिल बैठ कर सोचें

जहाँ तक भी हवा जाए ,ये महके गुलसिताँ मेरा

 

ग़म-ए-दौरां, ग़म-ए-जानाँ, कभी मज़लूम के आँसू

यही हर्फ़-ए-सुख़न मेरा, यही रंग-ए-बयाँ  मेरा

 

अगर दिल तोड़ दे कोई, बिना पूछे चले आना

मुहब्बत से भरा है दिल ये बह्र-ए-बेकराँ1  मेरा

 

कहाँ मिलता है कोई अब यहाँ दिल खोल कर ’आनन’

किसे फ़ुरसत पड़ी है जो सुने दर्द-ए-निहां2 मेरा

 

 

-आनन्द.पाठक-

 

1-     अत्यधिक, असीम सागर 2- दिल का छिपा हुआ दर्द

 

रविवार, 20 मार्च 2022

एक सूचना --अनुभूतियों के रंग

 

                            -- एक सूचना--


 

मित्रों !

 

 आप लोगों के आशीर्वाद से , मेरॊ नौवीं [9-वीं] पुस्तक] ---अनुभूतियों के रंग--मुद्रण हेतु प्रेस में चली गई है ।
उमीद है कि इस महीने के अन्त  तक प्रकाशित हो जाएगी  । तबतक उस पुस्तक का

आवरण-पृष्ठ आप लोगों से साझा कर रहा हूँ ।

 

-अनुभूतियों के रंग-एक गीति-काव्य संग्रह हैं जिसमें लगभग 450 [ 4-4- लाइनों के ] स्वतन्त्र गेय पद हैं जो समय समय पर दिल में उभरती गईं। इन्हीं अनुभूतियों

को शाब्दिक रूप देने का एक प्रयास मात्र किया है, शायद आप लोगों को पसन्द आए।


इन अनुभूतियों के रंग अलग अलग  हैं --हर्ष के विषाद के
, मिलन के भी  विरह के भी । इकरार के भी, इनकार के भी । ग़म-ए-जानाँ के भी ,ग़म-ए-दौरां के भी।

संक्षेपत: आप यूँ समझ लें --

 

भावनाएँ कभी बन गई तितलियाँ

वेदनाएँ तड़प कर बनी बिजलियाँ

जब न पीड़ा मेरी ढल सकी शब्द में

बन के आँसू ढली मेरी 'अनुभूतियाँ'

 

इन में से कुछ अनुभूतियाँ समय पर इस मंच पर लगाता रहा हूँ और आप लोगो का आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है ।

फ़िलवक़्त इसी संग्रह से कुछ अनुभूतियाँ आप के अवलोकनार्थ यहाँ लगा रहा हू॥

पुस्तक छपने के बाद -इस पर विस्तार से और चर्चा करूँगा।

 

क़तरा क़तरा दर्द हमारा

हर क़तरे में एक कहानी

शामिल है इसमे दुनिया की

मिलन-विरह की कथा पुरानी ।


 

 

जीवन पथ का राही हूँ मैं,

एक अकेला कई रूप में

आजीवन चलता रहता हूँ,

कभी छांव में, कभी धूप में।

 

 

प्रश्न तुम्हारा वहीं खड़ा है

मैं ही उत्तर ढूँढ न पाया,

ज्ञान-ध्यान क्या दर्शन क्या है

मूढ़मना को समझ न आया |

 

 

जाना ही था, कह कर जाती

दिल के टुकड़े चुन कर जाती

मेरी भी क्या थी मजबूरी 

कुछ तो मेरी सुन कर जाती ।

 

 

वह एक ’कल्पना’  कि ’प्रेरणा’

कौन बसी है? ज्ञात नहीं है,

जीवन भर की "अनुभूति" है

पल-दो पल की बात नहीं है ।

 

सादर

 

-आनन्द.पाठक-

88009 27181