शनिवार, 22 जनवरी 2022

ग़ज़ल 208 : गुमराह हो गया तू बातों में किसकी आ कर

 ग़ज़ल 208


221--2122--// 221-2122


गुमराह हो गया तू बातों में किसकी आ कर

दिल राहबर है तेरा .बस दिल की तू सुना कर


किसको पुकारता है पत्थर की बस्तियों में

खिड़की नहीं खुलेगी तू लाख आसरा कर


मिलना ज़रा सँभल कर ,बदली हुई हवा है

हँस कर मिलेगा तुमसे ख़ंज़र नया छुपा कर


जब सामने खड़ा था भूखा ग़रीब कोई

फिर ढूँढता है किसको दैर-ओ-हरम में जाकर


मौसम चुनाव का है ,वादे तमाम वादे

लूटेंगे ’वोट’ तेरा ,सपने दिखा दिखा कर


मेरा जमीर मुझको देता नहीं इजाज़त

’सम्मान’ मैं कराऊँ ,महफ़िल सजा सजा कर


’आनन’ तेरी ये ग़ैरत अब तक नहीं मरी है

रखना इसे तू ज़िन्दा हर हाल में बचा कर


-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

कविता 15 [06] : मन बेचैन रहा करता है

 

कविता 06

 

मन बेचैन रहा करता है

न जाने क्यों ?

उचटी उचटी नींद ज़िन्दगी

इधर उधर की बातें आतीं

टूटे-फूटे सपने आते

खंड-खंड में जीवन लगता

बँटा हुआ है।

धुँधली-धुँधली, बिन्दु-बिन्दु सी

लगती मंज़िल

लेकिन कोई बिन्दु नहीं जुड़ पाता मुझसे

न जाने क्यों ।

 

एक हाथ में कुछ आता है

दूजे हाथ फिसल जाता है

रह रह कर है मन घबराता

न जाने क्यों ।

 

-आनन्द.पाठक-

 

 

कविता 14 [05] : जीवन के हर एक मोड़ पर

 

-कविता 14 [05]

 

जीवन के हर एक मोड़ पर

कई अजनबी चेहरे उभरे

भोले भाले

कुछ दिलवाले

चार क़दम चल कर,

कुछ ठहरे

कुछ अन्तस में

गहरे उतरे ।

 

जब तक धूप रही जीवन में

साया बन कर साथ रहे

हाथों में उनके हाथ रहे

अन्धकार जब उतरा ग़म का

छोड़ गए, मुँह मोड़ गए कुछ

वो छाया थे।


फिर वही जीवन एकाकी

आगे अभी सफ़र है बाक़ी

लोग यहाँ पर मिलते रहते

जुड़ते और बिछड़ते रहते

क्या रोना है

क्यों रोना है

जीवन है तो यह होना है ।

अनुभूतियाँ : क़िस्त 15

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 15


57

कितनी दूर चलेंगे हम तुम

सपनों की झूठी छाया में

जीवन है इक सख़्त हक़ीक़त

कब तक जीना इस माया में ।

 

58

यक्ष ने क्या क्या और कहा था

मेघ ! तुम्हें वह दूत बना कर ?

तुम भी मेरी पाषाणी को

हाल बताना बढ़ा-चढ़ा कर ।

 

59

मेघ ! ज़रा यह भी बतलाना

क्या वो मिली थी तुम से आकर?

हाल सुनी तो क्या क्या बोली ?

भाग गई या आँख चुरा कर ?

 

60

अगर तुम्हें लगता हो ऐसा

साथ छोड़ना ही अच्छा है

मिला तुम्हें हमराह नया जो

मुझसे क्या ज़्यादा सच्चा है? 


 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 14

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 14


53

आने वाले कल को किसने

कब देखा है, कब सोचा है ?

फिर भी सपने बुनते रहते

जान रहे हैं सब धोखा है ।

 

54

किसको फ़ुरसत सुने हमारी

सब के अपने अपने ग़म हैं

ऊपर ऊपर हँसते रहते

भीतर भीतर आँखें नम हैं ।

55

औरों के ग़म एक तरफ़ हैं

अपना ग़म ही लगता बढ़ कर

और तुम्हारे हुस्न का जादू

बोल रहा है सर पर चढ़ कर ।

 

56

कितने थे मासूम तुम्हारे

प्रश्न जो तुम पूछा करती थी

प्यार मुहब्बत क्या होता है

जीवन क्या? सोचा करती थी ।


 

बुधवार, 19 जनवरी 2022

ग़ज़ल 207 [20] : आदमी में ’आदमीयत’ अब नहीं आती नज़र

 ग़ज़ल 207[20]


2122---2122--2122--212


आदमी में ’आदमीयत’ अब नहीं आती नज़र 

एक ज़िन्दा लाश बन करने लगा है तय सफ़र


और के कंधें पे चढ़ कर जब से चलने लग गया

वह बताने लग गया यह भी नया उसका हुनर


वह चला था गाँव से सर पर उठाए ’ संविधान’

’राजपथ’ पर लुट गया, बनती नहीं कोई ख़बर


आज के इस दौर में सुनता कहाँ कोई किसे

सबके हैं अपने  मसाइल ,सबकी अपनी रहगुज़र


लोग तो बहरे नहीं थे , लोग गूँगे भी नहीं

लोग क्यों ख़ामोश थे जब जल रहा था यह शहर


छोड़िए अब क्या रखा है आप के ’अनुदान’ में

आप ही के सामने जब जल गया लख़्त-ए-जिगर


लाख हो तारीक़ियाँ ’आनन’ तुम्हारे सामने

हौसला रखना ज़रा ,बस होने वाली है सहर


-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 18 जनवरी 2022

कविता 13 [08] : मन के अन्दर

  कविता 13 [08]


मैं हूँ 

मेरे  मन के अन्दर 

गंगा जी की निर्मल धारा

मन उँजियारा

शंखनाद से पूजन अर्चन

सुबह-शाम की भव्य आरती

चलता रहता भगवत कीर्तन

मन मेरा है सुबह-ए-बनारस

क्षमा दया और करुणा रस


मैं हूँ 

मेरे मन के अन्दर 

कहीं खनकती 

पायल-घुँघरु की झंकारें 

गजरे की ख़ुशबू

मुझे पुकारें

महफ़िल सजती 

हुस्न-ओ-अदा जब नाज़नीन की

जादू करती

रंग महल में ताता-थैय्या .रूप , रुपैय्या

तब मेरा दिल शाम-ए-अवध है


मैं हूँ 

मेरे मन के अन्दर

खिचीं मुठ्ठियाँ इन्क़्लाब की

तेज़ रोशनी आफ़ताब की

कहीं दहकते दिल में शोले

कहीं चाँदनी माहताब की


मन के अन्दर राम बसे है

मन में ही रावन बसता है

इस मन में ही कृष्ण कन्हैया

 इक कोने में 

"कंस’ खड़ा हो कर हँसता है


यह सब हैं तेरे भी अन्दर

किसे बसाना ,किसे मिटाना

तुझको ही यह तय करना 

कौन राह  तुझको चलना 


-आनन्द,पाठक-


सोमवार, 17 जनवरी 2022

कविता 12 [07] : गिद्ध नहीं वह

 कविता 12 [07]


गिद्ध नहीं वह

दॄष्टि मगर है गिद्धों जैसी

और सोच भी उनकी वैसी ।

हमें लूटते कड़ी धूप में 

खद्दरधारी टोपी पहने ।

रंग रंग की कई टोपियाँ

श्वेत-श्याम हैं और गुलाबी

नीली, पीली, लाल ,हरी हैं

’कुरसी’ पर जब नज़र गड़ी है

’जनता’ की कब किसे पड़ी है

ढूँढ रही हैं ज़िन्दा लाशें

पाँच बरस की ”सत्ता’ जी लें


ऊँची ऊँची बातें करना

हर चुनाव में घातें करना

हवा-हवाई महल बनाना

शुष्क नदी में नाव चलाना

झूठे सपने दिखा दिखा कर 

दिल बहलाना, मन भरमाना

संदिग्ध नहीं वह

सोच मगर संदिग्धों जैसी

गिद्ध नहीं वह 

दॄष्टि मगर है गिद्धों जैसी ।


-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 8 जनवरी 2022

ग़ज़ल 206[62] : जो बर्फ़ पड़ी दिल की चादर पे

 ग़ज़ल  206[62]

221---1222 // 221- 1222


जो बर्फ़ पड़ी दिल की चादर पे, पिघलने दो

रिश्तों को तपिश दे दो, इक राह निकलने दो


क़िस्मत से मिला करते ,ज़ुल्फ़ों के घने साए

गर आग मुहब्बत की जलती है तो जलने दो


मायूस नहीं होना हालात-ए-मुकद्दर से 

आएँगी बहारें भी, मौसम तो बदलने दो 


तुम हाथ बढ़ा दो तो , इतिहास बदल देंगे

रग रग में लहू उबले . कुछ और उबलने दो


गुलशन हैं लगे खिलने, महकी हैं हवाएँ भी

बहके हैं क़दम मेरे ,मुझको न सँभलने दो


मालूम मुझे भी है, यह नाज़-ओ-अदा नख़रे

यह हुस्न मुझे छलता , छलता है तो छलने दो


आज़ाद परिन्दें हैं ,रोको न इन्हें ’आनन’

पैग़ाम-ए-मुहब्बत से , दुनिया को बदलने दो


-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 205[19] : तुम्हें जब तक ख़बर होगी--

 ग़ज़ल  205 [19]

1222---1222---1222--1222--


तुम्हें जब तक ख़बर होगी बहुत कुछ हो गया होगा

वो सूली से उतर कर भी दुबारा चढ़ चुका होगा


जो कल तक घूमता था हाथ में लेकर खुला ख़ंज़र

वो ’दिल्ली’ की इनायत से मसीहा बन गया होगा


तुम्हे जिसकी गवाही पर ,अरे ! इतना भरोसा है

वो अपने ही बयानों से मुकर कर हँस रहा होगा


फ़क़त कुरसी निगाहों में, जहाँ था ’स्वार्थ’ का दलदल

तुम्हारा ’इन्क़लाबी’ रथ ,वहीं अब तक धँसा होगा


चलो माना हमारी मौत पर ’अनुदान ’ दे दोगे

मगरमच्छों के जबड़ों से वो क्या अबतक बचा होगा ?


गड़े मुरदे उखाड़ोगे कि जब तक साँस फ़ूँकोगे

कि ज़िन्दा आदमी सौ बार जी जी कर मरा होगा 


उठानी थी जिसे आवाज़ मेरे हक़ में, संसद में

वो कुरसी के ख़यालों में, जम्हाई ले रहा होगा 


भला ऐसी अदालत से करे फ़रियाद क्या ’आनन’

जहाँ क़ानून अन्धा हो ,जहाँ आदिल बिका होगा


-आनन्द.पाठक-



 

ग़ज़ल 204 [ 06] : ख़ामोश रहे कल तक--

ग़ज़ल 204 [06] 

221--1222  // 221-1222

ख़ामोश रहे कल तक, मुठ्ठी न भिंची उनकी

आवाज़ उठाए अब , बस्ती जो जली उनकी

 

बच बच के निकलते हैं, मिलने से भी कतराते

कल तक थे प्रतीक्षारत  हर रात कटी उनकी


जाने वो ग़लत थे या, थी मेरी ग़लतफ़हमी

जो नाज़ उठाते थे ,क्यों बात लगी उनकी


कश्ती भी वहीं डूबी ,जब पास किनारे थे

जो साथ चढ़े सच के, कब लाश मिली उनकी


साज़िश थीं हवाओं की, मौसम के इशारों पर

जब राज़ खुला उनका , हर बात खुली उनकी


बातें तो बहुत ऊँची, पर सोच में बौने है

हर मोड़ पे बिकते हैं ,ग़ैरत न बची उनकी 

’आनन’ तू किसी पर भी ,इतना भरोसा कर

लगता हो भले तुमको ,हर बात भली उनकी


-आनन्द. पाठक-


रविवार, 2 जनवरी 2022

ग़ज़ल 203 : आप के आने से पहले ---

 
ग़ज़ल 203

2122---2122--2122--212

आप के आने से पहले आ गई ख़ुश्बू इधर

ख़ैरमक़्दम के लिए मैने झुका ली है नज़र


यह मेरा सोज़-ए-दुरूँ, यह शौक़-ए-गुलबोसी मेरा

अहल-ए-दुनिया को नहीं होगी कभी इसकी ख़बर


नाम भी ,एहसास भी, ख़ुश्बू-सा है वह पास भी

दिल उसी की याद में है मुब्तिला शाम-ओ-सहर


तुम उठा दोगे मुझे जो आस्तान-ए-इश्क़ से

फिर तुम्हारा चाहने वाला कहो जाए किधर ?


बेनियाज़ी , बेरुख़ी तो ठीक है लेकिन कभी

देखने को हाल-ए-दुनिया आसमाँ से तो उतर ।


यह मुहब्बत का असर या इश्क़ का जादू कहें

आदमी में ’आदमीयत’ अब लगी आने नज़र


शेख़ जी ! क्या पूछते हो आप ’आनन’ का पता ?

बुतकदे में वह कहीं होगा पड़ा थामे जिगर 


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

सोज़-ए-दुरुँ = हृदय की आन्तरिक वेदना

शौक़-ए-गुलबोसी = फूलों को चूमने की तमन्ना

अहल-ए-दुनिया को = दुनिया वालों को


नए वर्ष [2022 ] की प्रथम भेंट --

         नए वर्ष [ 2022 ]की प्रथम भेंट --- एक सूचना 


मित्रो !


कुछ दिन पूर्व , अपनी एक प्रकाशाधीन पुस्तक - रोज़ तमाशा --मेरे आगे  [ व्यंग्य संग्रह ] का आवरण पृष्ठ [ कवर ] आप लोगों से साझा किया था ।

आप लोगों के आशीर्वाद और शुभकामनाओं के फलस्वरूप उक्त पुस्तक अब प्रकाशित हो कर आ गई है और पाठकों के लिए उपलब्ध है ।

 इसमे 29- व्यंग्य लेख संग्रहित हैं जो समाज में व्याप्त सामाजिक, राजनैतिक विद्रूपताओं पर और अन्य विसंगतियों पर लिखी गईं  व्यंग्य कथाएँ, लघु व्यथाएँ हैं । इनमे से कुछ व्यंग्य-लेख

इस मंच पर समय समय पर लगाता  रहा हूँ और आप की उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ  प्राप्त होती रही हैं ।


आदरणीय समीर लाल ’समीर’ जी ने इस संग्रह का आमुख  लिख कर ’आशीर्वचन’ दिया है । समीर लाल जी स्वयं में व्यंग्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं  और ’मोटिवेशनल लेखक भी हैं।

आप का एक  एक ब्लाग -www.udantashtari.blogspot.com "उड़न तश्तरी’- के नाम से बहु चर्चित है। आमुख में लिखते हैं--


"---आज जब उनके  [ आनन्द.पाठक के ] आने वाले व्यंग्य-संग्रह की पांडुलिपि से गुज़र रहा हूँ तब पुन: वही आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा भाव से भरा हुआ हूँ । 

एक सिविल अभियन्ता जो  गीत, ग़ज़ल, कविता,माहिया के माध्यम से दिल लिखता हो, वो दूसरी तरफ़ समाज में पसरी विद्रूपताओं पर कितनी पैनी नज़र रखता है । 

यह बात हैरान करती है ।---[ इसी पुस्तक से ]


यह मेरी आठवीं प्रकाशित पुस्तक है । जिनमे से  3- पुस्तकें तो व्यंग्य संग्रह की ही हैं । बाक़ी सब किताबें -गीत-ग़ज़ल-माहिया संग्रह की हैं।


शरणम श्रीमती जी [ व्यंग्य संग्रह ]

सुदामा की खाट [ -तदैव- ]

अल्लम गल्लम बैठ निठल्लम [ -तदैव ]


इन सभी पुस्तकॊ का प्रकाशन अयन प्रकाशन .नई दिल्ली ने किया है । यह तमाम पुस्तकें निम्न पते से प्राप्त की जा सकती है या सम्पर्क किया जा सकता है।

 

श्री संजय 

अयन प्रकाशन 


जे-19/39 ,राजापुरी ,उत्तम नगर

नई दिल्ली 110 059

Mobile/whatsapp  92113  12372


आशा है कि पूर्व की भाँति यह संग्रह भी आप लोगों को पसन्द आएगा।

पुस्तक के गुण-दोष की विवेचना /समीक्षा आप सुधी पाठकों से ज़्यादा कौन कर सकता है । आप की टिप्पणियों का स्वागत रहेगा।


सादर 

-आनन्द.पाठक-