गुरुवार, 23 जनवरी 2020

ग़ज़ल 142 : आप से क्या मिले----

ग़ज़ल 142 : आप से क्या मिले---

212--212---212---212

आप से क्या मिले ,फिर न ख़ुद से मिले
उम्र भर को मिले दर्द के  सिलसिले

वो निगाहे झुकीं, फिर उठीं. फिर झुकीं
ख़्वाब दिल में न पूछो कि क्या क्या खिले

तुम गले से लगा लो अगर प्यार से
दूर हो जाएँगे सारे शिकवे  गिले

उसने नफ़रत से आगे पढ़ा ही नहीं
फिर दिलों के मिटेंगे  कहाँ फ़ासिले

’क़ौल’ उनके हैं  कुछ और ’नीयत’ है कुछ
जाने लेकर चले वो किधर क़ाफ़िले

बोलना लाज़िमी था ,ज़रूरी जहाँ
होंठ अपने वहीं लोग क्यों थे सिले ?

 प्यार ’आनन’ लुटाते चलो राह में
क्या पता ज़िन्दगी फिर मिले ना मिले

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 11 जनवरी 2020

ग़ज़ल 141 : गर्द दिल से अगर ---

2122---1212--112/22

एक ग़ज़ल : गर्द दिल से अगर--

गर्द दिल से अगर उतर जाए
ज़िन्दगी और भी  निखर जाए

कोई दिखता नहीं  सिवा तेरे
दूर तक जब मेरी नज़र जाए

तुम पुकारो अगर मुहब्बत से
दिल का क्या है ,वहीं ठहर जाए

डूब जाऊँ तेरी निगाहों में
यह भी चाहत कहीं न मर जाए

एक हसरत तमाम उम्र रही
मेरी तुहमत न उसके सर जाए

ज़िन्दगी भर हमारे साथ रहा
आख़िरी वक़्त ग़म किधर जाए

वो मिलेगा तुझे ज़रूर ’आनन’
एक ही राह से अगर जाए

-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

ग़ज़ल 140 : आदमी का कोई अब---

212---212---212---212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
---------

एक ग़ज़ल : आदमी का कोई अब---

आदमी का कोई अब भरोसा नहीं
वह कहाँ तक गिरेगा ये सोचा नहीं

’रामनामी’ भले ओढ़ कर घूमता
कौन कहता है देगा  वो धोखा नहीं

प्यार की रोशनी से वो महरूम है
खोलता अपना दर या दरीचा नहीं

उनके वादें है कुछ और उस्लूब कुछ
यह सियासी शगल है अनोखा नहीं

या तो सर दे झुका या तो सर ले कटा
उनका फ़रमान शाही सुना या नहीं ?

मुठ्ठियाँ इन्क़लाबी उठीं जब कभी
ताज सबके मिले ख़ाक में क्या नहीं ?

जुल्म पर आज ’आनन’ अगर चुप रहा
फिर कोई तेरे हक़ में उठेगा नहीं

-आनन्द.पाठक--

उस्लूब = तर्ज-ए-अमल, आचरण