सोमवार, 23 मई 2022

ग़ज़ल 240 [05E] : दिल ने जो कहा मुझसे--

 ग़ज़ल 240 [05E]


221---1222 // 221--1222


दिल ने जो कहा मुझसे, मैं काश ! सुना होता

दुनिया को समझने में धोखा न हुआ होता


करता भी वुज़ू कैसे, मन साफ़ नहीं था जब

दिल और कहीं होता, सर सिर्फ झुका होता


तक़रीर तेरी ज़ाहिद माना कि सही लेकिन

मेरा भी सनम कैसा, मुझसे भी सुना होता


कूचे से तेरे गुज़रा,  याद आए गुनह मेरे

दिल साफ़ रहा होता ,नादिम न हुआ होता


आग़ाज़-ए-मुहब्बत का होता है मुहूरत क्या

शिद्दत से कभी तुमने आग़ाज़ किया होता


औरों की तरह तुम भी अपना न मुझे समझा

जो बात दबी दिल में ,मुझसे तो कहा होता


दुनिया के मसाइल में, उलझा ही रहा ’आनन’

फ़ुरसत जो मिली होती, दर उनके गया होता ।


-आनन्द.पाठक-

वुज़ू = नमाज़ के पहले शुद्ध होना

तक़रीर = प्रवचन

आग़ाज़  = शुरुआत

मसाइल = मसले

पोस्टेड 18-06-22

रविवार, 22 मई 2022

ग़ज़ल 239 [04 E] : इश्क़ रुस्वा नहीं हुआ होता

 ग़ज़ल 239 [04 E]


2122---1212--112/22

इश्क़ रुस्वा नहीं हुआ होता

नाम उसका न जो लिया होता


ग़ौर से देखते अगर खुद को

दिल में इक आइना दिखा होता


सोचता हूँ मैं एक मुद्दत से

तुम न होते अगर तो क्या होता


जिंदगी और भी हसीं होती

 आप का साथ जो मिला होता


आदमी में न कुछ कमी हो तो

आदमी देव बन गया  होता


हिज्र होता है क्या समझ जाते

दिल कहीं आप का लगा होता


मुन्तज़िर हूँ अज़ल से मैं ’आनन’

आखिरी दम तो वह मिला होता

-आनन्द.पाठक-


हिज्र = जुदाई ,वियोग

मुन्तज़िर =  प्रतीक्षारत




शुक्रवार, 20 मई 2022

ग़ज़ल 238 [03 E]: सुरूर उनका जो मुझ पर चढ़ा नहीं होता

 ग़ज़ल 238 [03E]


1212--1122---1212---22


सुरूर उनका जो मुझ पर चढ़ा नहीं होता 

क़सम खुदा कि मैं खुद से जुदा नहीं होता


हमारे इश्क़ में कुछ तो कमी रही होगी

सितमशिआर सनम क्यों खफा नहीं होता


निगाह आप की जाने किधर कहाँ रहती

निगाह-ए-शौक़ से क्यूँ सामना नहीं होता


निशान-ए-पा जो किसी और के रहे होते

यक़ीन मानिए सर यह झुका नहीं होता


ख़याल आप का दिन रात साथ रहता है

ख़याल-ओ-ख़्वाब में खुद का पता नहीं होता


नज़र जो आप की मुझसे मिली नहीं होती

क़रार दिल का मेरा यूँ लुटा नहीं होता


सफ़र हयात का कटता भला कहाँ 'आनन'

सफर में साथ जो उनका  मिला नहीं होता


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ


सुरूर = चढ़ता हुआ नशा

इसी ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुने


गुरुवार, 19 मई 2022

ग़ज़ल 237 [02E ] : मुहब्ब्त में अब वो इबादत कहाँ है

 ग़ज़ल 237 [ 02E]


122---122--122---122


मुहब्बत में अब वो इबादत कहाँ है

 तिजारत हुई अब ,सदाक़त कहाँ है


जिधर से चलो तुम उधर रोशनी हो

उठा दो जो पर्दा तो जुल्मत कहाँ है


जो नाज़-ओ-अदा से खड़ी सामने हैं

वही पूछती हैं क़यामत कहाँ है


करम हो नवाज़िश, मुरव्वत, इयादत

तुम्हारी पुरानी वो आदत कहाँ है 


नए दौर की यह नई रोशनी है

मुहब्बत में शिद्दत की रंगत कहाँ है


वो लैला, वो मजनूँ,वो शीरी, वो फ़रहाद

हैं पारीन किस्से ,हक़ीक़त कहाँ है


इस ’आनन’ से तुमको शिकायत बहुत है

रफ़ाक़त है तुमसे ,अदावत कहाँ है 


-आनन्द.पाठक- 

शब्दार्थ

जुल्मत =अँधेरा

इयादत = रोगी का हाल-चाल पूछना

पारीन = पुराने

रफ़ाक़त = दोस्ती

रविवार, 15 मई 2022

ग़ज़ल 236 [37 D]: तुम्हारी ज़ुल्फ़ को छू कर

 


1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 236[37 D]


तुम्हारी ज़ुल्फ़ को छू कर हवाएँ गा रहीं सरगम

तुम्हे जब देख लेती हैं नशे में झूमती  हरदम


हमेशा पूछती कलियाँ बता ऎ बाग़वाँ मेरे !

चमन में कौन आता है बहारों का लिए मौसम


न कोई अब तमन्ना है, न कोई आरज़ू बाक़ी

हुए जब से हमारे तुम ख़ुशी का है इधर आलम


फ़रिश्तों ने बताया था तुम्हारी कैफ़ियत सारी

वही सच मान कर हर्फ़न इबादत कर रहे हैं हम


ज़ुबाँ जब दे दिया तुमको, निभाना जानता भी हूँ

कभी तुम आजमा लेना रहूँगा मैं सदा क़ायम


न कोई शर्त होती है, न शिकवा ही मुहब्बत में

मुहब्बत का सफ़र होता लब-ए-दम तक मेरे जानम 


तसव्वुर मे , ख़यालों में, तुम्हारा मुन्तज़िर ’आनन’

मुजस्सम तुम चले आते तो मिट जाते हमारे ग़म 


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

 कैफ़ियत =ब्यौरा, विवरण

हर्फ़न     = अक्षरश:

लब-ए-दम  तक =आखिरी साँस तक

मुन्तज़िर = प्रतीक्षारत

मुजस्सम = सशरीर


गुरुवार, 12 मई 2022

ग़ज़ल 235[03 D] : हालात-ए-ख़ुमारी में

 ग़ज़ल 235[03 D]


221--1222 //221---1222


हालात-ए-खुमारी में जाने मैं किधर आया

मालूम नहीं मुझको कब यार का दर आया


कैसी ये कहानी है तुमने जो सुनाई है

सीने में छुपा मेरा इक दर्द उभर आया


है कौन यहाँ ऐसा जिसको न मिला ग़म हो

हर बार तपा हूँ मैं, हर बार निखर आया


जीवन का सफ़र है क्या? मर मर के यहाँ जीना

कालीन बिछी राहें ?, ऐसा न सफ़र आया


आती है सदा किसकी करता है इशारे कौन?

कोई तो यक़ीनन है लेकिन न नज़र आया


जीवन के सफ़र में, हाँ ,ऐसा भी हुआ अकसर

ज़ुल्मत न उधर बीती, सूरज न इधर आया


दुनिया के झमेलों में, उलझा ही रहा ’आनन’

जब आँख खुली उसकी, तब लौट के घर आया


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

ज़ुल्मत = अँधेरा ,तीरगी

इसी ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में यहाँ सुने



एक अनुभूति और 

बीती रातों की  बातें सब

मुझको कब सोने देती हैं ?

कस्म तुम्हारी खड़ी सामने

मुझको कब रोने देती हैं ?


-आनन्द.पाठक-


आवाज़ 002 : एक अनुभूति



एक अनुभूति  और

रात रात भर जग कर चन्दा

ढूँढा करता किसे गगन में ?

थक कर बेबस सो जाता है

दर्द दबा कर अपने मन में ।

-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 10 मई 2022

ग़ज़ल 234[98 D] : ज़िंदगी ग़म भी शादमानी भी

 ग़ज़ल 234[98 D]


2122---1212---22


ज़िंदगी ग़म भी शादमानी भी

इक हक़ीक़त भी है कहानी भी


हादिसे कुछ ज़मीन के आइद

कुछ बलाएँ भी आसमानी भी


प्यार मेरा पढ़ेगी कल दुनिया

एक राजा था एक रानी भी


तेरे अन्दर ही इल्म की ख़ुशबू

तेरे अन्दर ही बदगुमानी भी


अब न आएगा लौट कर  बचपन

अब न लौटेगी वो जवानी भी


दर्द अपना बयान करता है

कुछ तो आँखों से कुछ ज़ुबानी भी


लुत्फ़ है ज़िन्दगी अगर ’आनन’

साथ में तल्ख़-ए-ज़िंदगानी भी


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 233 [97 D] : जन्नत से वो निकाले--

 ग़ज़ल 233[97 D]


221--2122 // 221--2122


जन्नत से है  निकाला , हमको मिली सज़ा है

दिल आज भी हमारा ,उतना ही बावफ़ा है


तेरी नज़र में शायद , गुमराह हो गया हूँ

मैने वही किया है , इस दिल ने जो कहा है


जब तक नहीं मिले थे, सौ सौ ख़याल मन में

जब रूबरू हुए वो , सजदे में सर झुका है 


रहबर की शक्ल में थे, किरदार रहजनों -सा

दो-चार गाम पर ही, यह कारवाँ लुटा है


ज़ाहिद की बात अपनी, रिंदो की बात अपनी

दोनों के हैं दलाइल, दोनों को सच पता है


जो कुछ वजूद मेरा, तेरी ही मेहरबानी

आगे भी हो इनायत, बस इतनी इल्तिजा है


आरिफ़ नहीं हूँ ’आनन’, इतना तो जानता हूँ

दिल में न हो मुहब्बत,  फिर तो वो लापता है ।


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

गाम = क़दम

दलाइल = दलीलें ,तर्क [ दलील का ब0व0\

ज़ाहिद  = धर्मोपदेशक

रिंद      = शराबी

आरिफ़ = तत्व ज्ञानी, ध्यानी, ज्ञाता

पोस्टेड 28-05-22




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सोमवार, 9 मई 2022

आवाज़ 001 : अनुभूति


एक अनुभूति मेरी आवाज़ में 

                क़तरा क़तरा दर्द हमारा
                हर क़तरे में एक कहानी
                शामिल है इसमे दुनिया की
                मिलन-विरह की कथा पुरानी

-आनन्द.पाठक--

गुरुवार, 5 मई 2022

ग़ज़ल 232[96D] : हमारी सोच में चन्दन की ख़ुशबू है

 ग़ज़ल 232 [96 D]

1222---1222---1222----1222


हमारी सोच में चन्दन की खुशबू है, मेरी थाती

तुम्हारी सोच नफ़रत से नहीं आगे है बढ़ पाती


चमन अपना, वतन अपना, ये कलियाँ फूल सब अपने

वो नफरत कौन सी ऐसी कि जो पत्थर है चलवाती


तुम्हारे रहबरों ने की अँधेरों की तरफ़दारी

नहीं पूछा किसी ने रोशनी क्यों घर नहीं आती


कहाँ होता है कोई फ़ैसला तलवार ख़ंज़र से

अगर मिल बैठ कर जो बात करते बात बन जाती


दिया तनहा तुम्हें दिखता है लेकिन है नहीं तनहा

दुआएँ अम्न की है साथ उसके, जल रही बाती


सभी अपनी ग़रज़ से हैं सियासत के बने मोहरे

ये दुनिया है जहाँ मौक़ा मिले तो चाल चल जाती


ये उनका काम है ’आनन’, लड़ाना और लड़वाना

तुम्हें उनकी खुली साज़िश समझ में क्यॊं नही आती


-आनन्द.पाठक-