नए वर्ष की नव सुनहरी किरन से अनागत समय की इबारत लिखेंगे भला या बुरा जो गया बीत छोड़ो उठो और देखो ,सुबह हो रही है नई धूप आ कर खड़ी देहरी पे कि संकल्प की अब घड़ी हो रही है हृदय की पटल पे जो नफ़रत लिखा हो मिटा कर उसे हम मुहब्बत लिखेंगे अँधेरों की चाहे हो जितनी भी ताक़त हमेशा चिरागां से डरते रहे हैं बुझी राख से भी हैं शोले पनपते हवाओं से मिल कर दहकते रहें हैं क़लम के सिपाही हैं,अपना धरम है हक़ीक़त है जो भी ,हक़ीक़त लिखेंगे नए वर्ष में शान्ति की ज्योति फैले सभी हों सुखी, बस यही कामना है न बारूद का हो धुँआ,हो न दहशत न साज़िश हो कोई ,यही भावना है अगर पढ़ सको तो कभी आ के पढ़ना अदावत के बदले रफ़ाक़त लिखेंगे
नाम लेकर बुला गया कोई ख़्वाब दिल में जगा गया कोई बात मेरी तो ज़ेर-ए-लब ही थी बात अपनी सुना गया कोई हूर-ए-जन्नत तुम्हीं रखो, ज़ाहिद ! जल्वा अपना दिखा गया कोई रुख़ से पर्दा उठा लिया किसने ग़ुंचा ग़ुंचा खिला गया कोई हाय ! बिखरा के ज़ुल्फ़ को अपनी प्यास मेरी बढ़ा गया कोई रास्ता ज़िन्दगी का जो पूछा मैकदा क्यूँ बता गया कोई ? बात ग़ैरत की आ गई ’आनन’ जान अपनी लुटा गया कोई
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम फ़ऊलुन----फ़ऊलुन---फ़ऊलुन फ़ऊलुन 122-- -122--- --122---- 122
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मेरे दिल के धड़कन ने उनको पुकारा
ज़माने को हो ना सका ये गवारा
मुहब्बत में मुझको ख़बर ही कहाँ थी
कि तूफ़ाँ मिला कि मिला था किनारा ?
रह-ए-इश्क़ में ऐसे आये मराहिल
जो देखा नहीं वो भी देखा नज़ारा
तुम्हारे लिए ये हँसी-खेल होगा -
कभी दिल को तोड़ा कभी दिल संवारा
कोई अक्स दिल में उभरता नहीं अब
कि जब से तिरा अक्स दिल में उतारा
चला जो गया छोड़ कर इस मकां को
भला लौट कर कौन आया दुबारा ?
हुई रात "आनन’ की नींद आ रही है
कोई कर रहा अपनी जानिब इशारा
एक मन दो बदन की घनी छाँव में इक क़दम तुम चलो,इक क़दम मैं चलूँ
ये कहानी नई तो नहीं है मगर सब को अपनी कहानी नई सी लगे बस ख़ुदा से यही हूँ दुआ माँगता प्रीति अपनी पुरानी कभी ना लगे
एक ही श्वाँस में हम सिमट जायेंगे एक पल तुम ढलो,एक पल मैं ढलूँ
तेरे शाने से पल्लू सरक जो गया मान लेता हूँ कोई निमन्त्रण नहीं फिर वो पलकें झुकाने का क्या अर्थ था? क्या वो मन का था मन से समर्पण नहीं ?
एक पल मधु-मिलन के लिए प्राण !क्यूँ उम्र भर तुम जलो, उम्र भर मैं जलूँ ?
चाँदनी सी छलकती बहकती हुई मेरे आँगन में उतरो कभी तो सही कितनी बातें छुपा कर,दबा कर रखी पास बैठो ,कहूँ कुछ, कही अनकही
तुम ज़माने की बातों से डरना नहीं फूल बन तुम खिलो ,गन्ध बन कर मिलूँ उन के आने की कोई ख़बर तो नहीं आँख मेरी क्यूँ रह रह फड़कने लगी इस चमन में अचानक ये क्या हो गया हर कली क्यूँ चहकने बहकने लगी
नेह की डोर से जो कि टूटे नहीं तुम मुझे बाँध लो,मैं तुम्हे बाँध लूँ
किसके आँचल को छू कर हवा आ गई सोये सपने हमारे जगा कर गई मैं भटकने लगा किस के दीदार में और मुझ को ही मुझसे जुदा कर गई
एक आवाज़ आती रही उम्र भर एक आभास बन कर तुम्हें मैं छलूँ
शब्द मेरे भी चन्दन हैं, रोली बने भाव पूजा की थाली लिए, आ गया तुमको स्वीकार ना हो, अलग बात है दिल में आया ,जो भाया, वही गा गया
आरती का दीया हूँ तिरी ठौर का लौ लगी है,जली है ,तो क्या ना मिलूँ ?
एक मन दो बदन की घनी छाँव में ......
गो धूप तो हुई है , पर ताब वो नहीं है
जो ख़्वाब हमने देखा ,ये ख़्वाब वो नहीं है
मजलूम है कि माना,ख़ामोश रहता अकसर
पर बे-नवा नहीं है ,बे-आब वो नहीं है
कुछ मगरिबी हवाओं का पुर-असर है शायद
फ़सलें नई नई हैं ,आदाब वो नहीं है
अपनी लहू से सींचे हैं जांनिसारी कर के
आई बहार लेकिन शादाब वो नहीं है
एहसास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत,अस्बाक़-ए-तर्क़-ए-उलफ़त
मेरी किताब-ए-हस्ती में बाब वो नहीं है
इक नूर जाने किसकी दिल में उतर गई है
एहसास तो यक़ीनन ,पर याब वो नहीं है
ता-उम्र मुन्तज़िर हूँ दीदार-ए-यार का मैं
बेताब जितना "आनन",बेताब वो नहीं है
शब्दार्थ
ताब = गर्मी ,चमक
बे-नवा= बिना आवाज़ के
बे-आब= बिना इज्ज़त के
मगरिबी [हवा]= पश्चिमी [सभ्यता]
जांनिसारी =प्राणोत्सर्ग
आदाब =तमीज-ओ-तहज़ीब
शादाब = हरी भरी ,ख़ुशहाली
एहसास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत,अस्बाक़-ए-तर्क़-ए-उलफ़त= लालच औत नफ़रत की अनुभूति और प्यार मुहब्बत के छोडने/भुलाने के सबक़]
बाब = अध्याय [chapter]
मेरी किताब-ए-हस्ती में=मेरे जीवन की पुस्तक में
मुन्तज़िर = प्रतीक्षक
याब =प्राप्य
चार दिन की ज़िन्दगी से चार पल हमने चुराये मिलन के पावन क्षणों में,दूर क्यों गुमसुम खड़ी हो ?
जानता हूँ इस डगर पर हैं लगे प्रतिबन्ध सारे और मर्यादा खड़ी ले सामने अनुबन्ध सारे मन की जब अन्तर्व्यथा नयनों से बहने लग गईं तो समझ लो टूटने को हैं विकल सौगन्द सारे
हो नहीं पाया अभी तक प्रेम का मंगलाचरण तो इस जनम के बाद भी अगले जनम की तुम कड़ी हो मिलन के पावन क्षणों में .......
आ गई तुम देहरी पर कौन सा विश्वास लेकर ? कल्पनाओं में सजा किस रूप का आभास लेकर ? प्रेम शाश्वत सत्य है ,मिथ्या नहीं ,शापित नहीं है गहन चिन्तन मनन करते आ गई चिर प्यास लेकर
केश बिखरे ,नयन बोझिल कह रही अपनी जुबानी प्रेम के इस द्वन्द में तुम स्वयं से कितनी लड़ी हो मिलन के पावन क्षणों में .....
हर ज़माने में लिखी जाती रहीं कितनी कथायें कुछ प्रणय के पृष्ट थे तो कुछ में लिक्खी थीं व्यथायें कौन लौटा राह से, इस राह पर जो चल चुका है जब तलक है शेष आशा ,मिलन की संभावनायें
यह कभी संभव नहीं कि चाँद रूठे चाँदनी से तुम हृदय की मुद्रिका में एक हीरे से जड़ी हो मिलन के पावन क्षणों में .....
दर्द-ए-उल्फ़त है ,भोला भाला है
दिल ने मुद्दत से इसको पाला है
सैकड़ों तल्ख़ियां ज़माने की
जाम-ए-हस्ती में हम ने ढाला है
मैं तो कब का ही मर गया होता
मैकदो ने मुझे सँभाला है
जब हमें फिर वहीं बुलाना था
ख़ुल्द से क्यूँ हमें निकाला है
अब तो दैर-ओ-हरम के साए में
झूट वालों का बोलबाला है
हर फ़साना वो नामुकम्मल है
जिसमें तेरा नहीं हवाला है
आँख मेरी फड़क रही कल से
लगता वो आज आनेवाला है
आज तक हूँ ख़ुमार में ’आनन’
हुस्न ने जब से जादू डाला है
शब्दार्थ
मुद्दत = लम्बे समय से
तल्ख़ियां = कटु अनुभव
जाम-ए-हस्ती= जीवन के प्याले में
खुल्द = स्वर्ग से [ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन...]
नामुकम्मल =अधूरा है
खुमार = नशे में [ध्यान रहे चढ़ते हुए नशे को ’सुरूर’ कहते है
और उतरते हुए नशे को ’ख़ुमार’ कहते हैं
परदे के पीछे से छुप कर ,मन ही मन शरमाती क्यों हो?
पायल फिर खनकाती क्यों हो ?
माटी से ही अगर बनाया ,माटी में क्यों मिला दिया है ?
मेरे आराधन को बोलो तुमने कैसा सिला दिया है ?
कैसा खेल रचाया तुमने , कैसी मुझको सज़ा मिली है ?
नज़रों में जब बसा लिया था, दिल से फिर क्यों भुला दिया है ?
मेरा दर्द नहीं सुनना तो अपना दर्द सुनाती क्यों हो ?
हुँक्कारी भरवाती क्यों हो ?
जितना सीधा सोचा था पर उतनी सीधी नहीं डगरिया
आजीवन भरने की कोशिश,फिर भी खाली रही गगरिया
दूर क्षितिज के पार गगन से करता रहा इशारा कोई
ढलने को जब शाम हो चली ,अब तो आजा मेरी नगरिया
काट चिकोटी मुझको ,हँस कर दूर खड़ी हो जाती क्यों हो ?
मुझको व्यर्थ सताती क्यों हो?
कितना चाहा रूप तुम्हारा शब्दों में कुछ ढाल सकूँ मैं
अल्हड़ यौवन पे था चाहा प्रेम चुनरिया डाल सकूँ मैं
गर्दन झुका के पलक झुकाना माना नहीं निमन्त्रण,फिर भी
चाहत ही रह गई अधूरी प्रणय दीप कि बाल सकूँ मैं
रह रह कर साने से अपने आँचल फिर सरकाती क्यों हो ?
अपने होंठ दबाती क्यों हो?
आज तो तुम पल रही हो चाँद की नाज़ुक किरन में
कल अँधेरा साथ हो तो प्रिय ! मुझे फिर याद करना
आज कितने फूल शुभ बिखरे तुम्हारी राह में हैं
सैकड़ों आंखे प्रतीक्षारत तुम्हारी चाह में हैं
झूलती हो ,कुछ अनागत स्वप्न को लेकर,हिंडोले
जब कि यह विस्तृत गगन सिमटा तुम्हारी बाँह में हैं
आज तो तुम छल रही हो स्वप्न बन कर ज़िन्दगी में
जब कभी एकान्त मन से डर लगे तो याद करना
देखता हूँ रोज नभ में टूटते कितने सितारे
देखता हूँ रोज कितनी डूबती नैया किनारे
पर तुम्हारे पायलों के रुनझुनी मधुरिम खनक पे
चाँद भी चूमा करे है पाँव दो संझा-सकारे
आज तो तुम सज रही सौन्दर्य की इक मूर्ति बन कर
खण्डहर बन जब कभी तन बिखर जाये ,याद करना
तुम पली हो चाँदनी में, मैं अँधेरे में जिया हूँ
तुम जली हो सोमरस से ,मैं हलाहल भी पिया हूँ
आज तो लगता तुम्हें डसती है बैरिन चाँदनी भी
मैं जला ख़ुशियां ,तुम्हारी राह को रौशन किया हूँ
चाहते कई लोग हैं भर दें सितारे माँग मे
मैं प्रतीक्षारत रहूंगा ,तुम मुझे फिर याद करना
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181
इस गीत का English अनुवाद हमारे मित्र डा0 ख़लिश साहब ने किया है जो मैं अपने पाठकों की सुविधा के लिए नीचे लगा रहा हू“
From: Dr.M.C. Gupta
To: ekavita Cc: Hindienglishpoetry ; anand pathak ; Tekk Savvy Sent: Friday, 1 March 2013 5:18 PM Subject: [ekavita] YOUR PATH’S LIGHTED BY THE MOON (English version of the original Hindi poem by Anand Pathak)
YOUR PATH’S LIGHTED BY THE MOON
[The everlasting hope of the silent lover.]
Your path’s lighted by the moon;
It sends serene rays today.
Yet if darknes does prevail,
Be sure to call me some day.
Your path is stewn with flowers;
Millions now wait for your glance.
You are lost in golden dreams;
Nature around you does dance.
Today this world charms you much
Through the prism of your wild thoughts.
When loneliness does haunt you,
Be sure to call me some day.
Daily in the sky I see,
There breaks up a shining star.
From the shore I watch helpless
A boat that does sink afar.
As you move, silver anklets’
Lilting tunes bewitch the moon;
When your weary gait totters,
Be sure to call me some day.
Today moon and stars guide you;
Darkness has brought up me though.
Manna has nurtured you but
Poison in my life does show.
Your tenderness is threatened
Today by silken moon rays.
My heart has burned for your sake,
That you may call me some day.
*Written in 7-7-7-7, abcb format. M C Gupta "खलिश" 26 February 2013
NOTE—This is an English version of the original Hindi poem, given below, written by