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शनिवार, 12 जून 2021

गीत 70: ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

2122---2122--2122--2122

गीत 70 : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ,मैं अभी हारा नहीं हूँ ,
बिन लड़े ही हार मानूँ यह, नहीं स्वीकार मुझकॊ

जो कहेंगे वो, लिखूँ मैं ,शर्त मेरी लेखनी पर,
और मेरे ओठ पर ताला लगाना चाहते हैं ।
जो सुनाएँ वो सुनूँ मैं, ’हाँ’ में ’हाँ’ उनकी मिलाऊँ
बादलों के पंख पर वो घर बनाना चाहते हैं॥

स्वर्ण-मुद्रा थाल लेकर आ गए वो द्वार मेरे,
बेच दूँ मैं लेखनी यह ? है सतत धिक्कार मुझको

ज़िन्दगी आसां नहीं तुम सोच कर जितनी चली हो,
कौन सीधी राह चल कर पा गया अपन ठिकाना ।
हर क़दम, हर मोड़ पर अब राह में रहजन खड़े हैं
यह सफ़र यूँ ही चलेगा, ख़ुद ही बचना  या बचाना ।

जानता हूँ  तुम नहीं मानोगी  मेरी बात कोई-
और तुम को रोक लूँ मैं, यह नहीं अधिकार मुझको।

लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,
आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।
नम्रता की क्यों कमी है, क्यों ”अहम’ इतना भरा है
सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।

एक ढूँढो, सौ मिलेंगे हर शहर में, हर गली में ,
रूप बदले हर जगह मिलते वही हर बार मुझको।

-आनन्द.पाठक- 

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

गीत 68 : नए वर्ष का स्वागत वन्दन--

 [ शनै: शनै: हम आ ही गए ,आगत और अनागत के मुख्य द्वार पर,जहाँ जाने वाले वर्ष की

कुछ विस्मरणीय स्मृतियाँ हैं तो आने वाले नववर्ष से कुछ आशाएँ हैं। इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत है

एक गीत--- 

नए वर्ष पर एक गीत : आशाओं की नई किरण से---

आशाओं की नई किरण से, नए वर्ष का स्वागत -वन्दन ,
नई सुबह का नव अभिनन्दन।

ग्रहण लग गया विगत वर्ष को 
उग्रह अभी नहीं हो पाया  ।
बहुतों ने खोए  हैं परिजन ,
"कोविड’ की थी काली छाया ।

इस विपदा से कब छूटेंगे, खड़ी राह में बन कर अड़चन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।

देश देश आपस में उलझे
बम्ब,मिसाइल लिए खड़े हैं ।
बैठे हैं शतरंज बिछाए ,
मन में झूठे दम्भ भरे हैं ।

ऐसा कुछ संकल्प करें हम, कट जाए सब भय का बन्धन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।

धुंध धुआँ सा छाया जग पर
साफ़ नहीं कुछ दिखता आगे ।
छँट जाएँगे काले बादल ,
ज्ञान-ज्योति जब दिल में जागे ।

हम सब को ही एक साथ मिल ,करना होगा युग-परिवर्तन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।

मानव-पीढ़ी रहेगी ज़िन्दा ,
जब तक ज़िन्दा हैं मानवता ।
सत्य, अहिंसा ,प्रेम, दया का
जब तक दीप रहेगा जलता ।

महकेगा यह विश्व हमारा ,जैसे महके चन्दन का वन ।
नई सुबह का नव अभिनन्दन।
-आनन्द.पाठक--


सोमवार, 28 जनवरी 2019

ग़ज़ल 113 [34] : हाथ क्या उनसे मिलाते---

ग़ज़ल 113 [34]

बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन
2122----------2122
---------
हाथ जो उन से मिलाते
उँगलियाँ अपनी कटाते

दुश्मनी तो ठीक है ,पर
दोस्ती कुछ तो निभाते

जाग कर सोए हुए -सा
हम तुम्हें फिर क्या जगाते

झूठ को सच मानते हो
सच की बातें क्या बताते

आइने को  बद दुआएँ
ख़ुद मुखौटे  हो चढ़ाते

जब तुम्हें सुनना नहीं ,तो
हाल-ए-दिल क्या,हम सुनाते

दिल फ़क़ीराना है ’आनन’
मिलते रहना ,आते जाते


-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

गीत 051 : जीवन के सुबह की

गीत 051

जीवन के सुबह की --यह एक युगल गीत  :किसकी यह पाती है-----

[ बचपन की प्रीति  जब  बड़ी हो गई, 
दुनिया की रस्म ,रिवायात  खड़ी हो गईं। 
हालात ऐसे की परवान न चढ़ सकीं ।
जीवन के सुबह की एक लिखी हुई पाती ,जीवन के शाम में मिलती  गुमनाम ।
जीवन के सारे घटनाक्रम स्मृति पटल पर किसी चलचित्र की भाँति उभरते गए-
---। उस पाती में कुछ बातें नायक ने कही---कुछ नायिका ने कही। 
आप स्वयं समझ जायेंगे।

गीत 051

जीवन की सुबह की लिखी हुई पाती
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम।

पूछा है जो तुमने मईया का हाल
खाँसी कमजोरी से रहती बेहाल
लगता है आँखों मे है मोतियाबिन
छोड़ो, तुम्हारी कैसी है ससुराल ।

तीरथ पे जाने की हठ करती रहती
पकड़ी हैं खटिया औ’ लेती हरिनाम

मईया से कहना कि ’मुनिया’ भली
दूधो नहाई है और  पूतो फली
सासू बनाने की चाहत थी मन में
”विधना’ के आगे है किसकी चली ।

अगले जनम की क्या बातें अभी से
मईया से कह देना हमरा परनाम ।

अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपने की यादे वो कागज की नाव
बाँधे थे मिल कर जो मन्नत के धागे
अब भी क्या पड़ती है पीपल की छाँव

सावन के झूलों की यादें सताती
अब भी क्या लिख लिख मिटाती हो नाम ।

सुनती हूँ लाए हो अँग्रेजी गोरन
”इंगलिश’ में गिट-पिट औ’ चलती है बन-ठन
’बंदर’ की गरदन में मोती की माला
हाथी’ की गरदन में ’बिल्ली’ की लटकन

हट ”पगली’! काहे को छेड़े है आज
अच्छा है तुमने जो लिक्खा नहीं नाम

छोड़ो सब बातें, सुनाओ कुछ अपनी
कैसे हैं’वो’ और बहुएँ है कितनी ?
नाती और पोतो को दादी के किस्से
सुनाना तो सब कुछ, सुनाना न अपनी।

पोतों संग गुजरेगी बाक़ी उमरिया
बहुएँ है खाने लगी फिर कच्चे आम

रखना इस जाड़े में अपना ख़याल
फिर ना पकड़ लेना खटिया इस साल
मिलने से अच्छा है मिलने की चाहत
फिर काहे रखते हो दिल में मलाल

सुनती हो पीने लगे फिर सुबह शाम
पीने का होता कब अच्छा परिणाम

अपनी इस ’मुनिया’ को जाना तुम भूल
जैसे कि थी कोई  आकाशी फूल
अपना जो समझो तो कर देना माफ़
जाने अनजाने गर हो गई हो चूक

दो दिल जब हँस मिल के गाते है गीत
दुनिया तो करती ही रहती बदनाम

धत पगली !अईसा भी होता है क्या
बचपन की प्रीति कोई खोता है क्या
साँसों में घुल जाता है पहला प्यार
प्राणों से पहले निकलता है क्या

इस पथ के राही को मालूम है खूब
मर मर के जीना औ’ चलना है काम ।

जीवन की सुबह की लिखी हुई पाती 
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम

-आनन्द पाठक’आनन’-





रविवार, 29 दिसंबर 2013

ग़ज़ल 55[30] : नाम लेकर बुला गया कोई...

ग़ज़ल 55[30]

2122-----1212------22
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन--फ़ेलुन
बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
---------------------------------------------

नाम लेकर बुला गया कोई 
ख़्वाब दिल में जगा गया कोई

बात मेरी तो ज़ेर-ए-लब ही थी
बात अपनी सुना गया कोई

हूर-ए-जन्नत तुम्हीं रखो, ज़ाहिद !
जल्वा अपना दिखा गया कोई

रुख़ से पर्दा उठा लिया किसने
ग़ुंचा ग़ुंचा खिला गया कोई

हाय ! बिखरा के ज़ुल्फ़ को अपनी
प्यास मेरी बढ़ा गया कोई

रास्ता ज़िन्दगी का जो पूछा
मैकदा क्यूँ बता गया कोई ?

बात ग़ैरत की आ गई ’आनन’
जान अपनी लुटा गया कोई

-आनन्द.पाठक-

[सं 09-06-18]
bbs

रविवार, 22 दिसंबर 2013

एक ग़ज़ल 54 : मेरे दिल की धड़कन ने......

बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन----फ़ऊलुन---फ़ऊलुन  फ़ऊलुन
122--          -122---     --122----   122
-----
मेरे  दिल के धड़कन ने उनको पुकारा
ज़माने को हो ना सका  ये गवारा

मुहब्बत में मुझको ख़बर ही कहाँ थी
कि तूफ़ाँ मिला कि मिला था किनारा ?

रह-ए-इश्क़ में ऐसे आये मराहिल
जो देखा नहीं वो भी देखा नज़ारा

तुम्हारे लिए ये हँसी-खेल होगा -
कभी दिल को तोड़ा कभी दिल संवारा

कोई अक्स दिल में उभरता नहीं अब
कि जब से तिरा अक्स दिल में उतारा

चला जो गया छोड़ कर इस मकां को
भला लौट कर कौन आया दुबारा ?

हुई रात "आनन’ की नींद आ रही है
कोई कर रहा अपनी जानिब इशारा

आनन्द.पाठक
 c-01/19

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

एक ग़ज़ल 53 : तुम्हारा शौक़ ये होगा...

1222--1222--1222--1222

तुम्हारा शौक़ ये होगा भरोसे को जगा देना
दिखावा दोस्ती का कर के फिर ख़ंज़र चला देना

हलफ़् सच की उठा कर फिर गवाही झूट की देकर
तुम्हारे दिल पे क्या गुज़री ,ज़रा ये भी बता देना

चले थे  इन्क़लाबी दौर  में  कुर्बानियां  करने
कहो,फिर क्या हुआ ’दिल्ली’में जा कर सर झुका देना

बड़ी हिम्मत शिकन होती सफ़र है राह-ए-उल्फ़त की
जहाँ अन्जाम होता है ख़ुदी में ख़ुद मिटा देना

पसीने से लिखा करता हूँ हर्फ़-ए-कामयाबी ख़ुद
तुम्हारा क्या ! ख़रीदे क़लम से कुछ भी लिखा देना

तुम्हारे हुनर में ये भी चलो अब हो गया शामिल
कि सच को झूट कह देना कि बातिल सच बता देना

वही दुनिया के रंज-ओ-ग़म,वही आलाम-ए-हस्ती है
कहीं ’आनन्द’ मिल जाये तो ’आनन’ से मिला देना

शब्दार्थ
आलाम-ए-ह्स्ती =जीवन के दुख
बातिल    = झूट
आनन्द = खुशी /अपना नाम ’आनन्द’


-आनन्द.पाठक-
09413395592

शनिवार, 14 सितंबर 2013

गीत 048 : जब से चोट लगी है दिल पे....

गीत 048

जब से चोट लगी है दिल पे ,आह निकलती रहती मन से
दुनिया ने तो झूठा समझा ,तुमने  ही कब  सच माना है 

                              मेरी आँखों की ख़ामोशी , बयाँ कर गई जो न बयाँ थी
            कहने की तो बात बहुत थी ,क्या करते ख़ामोश जुबाँ थी
            दिल से दिल की राह न निकली,ना कोई पत्थर ही पिघला
            जो सपने देखे थे हमने, उन सपनों की बात कहाँ थी   

दुनिया ने गोरापन देखा ,चमड़ी का ही रंग निहारा
सूरत पे मरने वालों ने अन्तर्मन कब पहचाना है ?
दुनिया ने झूठा समझा.......

            जब हृदय हमारा रोता है दुनिया क्यों हँसती गाती है ?
            क्यों सबका आँगन छोड़ मिरे घर पे बिजली गिर जाती है ?
            संभवत:जीवन का क्रम हो,हो सकता मेरा ही भ्रम हो
            कि शायद मेरे आर्तनाद पे ही दुनिया सुख पाती है

जब गीत मिलन के गा न सका तो विरह गीत अब क्या गाना
बस अपने सच को सच समझा, सच मेरा लगे बहाना  है
दुनिया ने तो झूठा समझा....

            आजीवन मन में द्वन्द रहा ,मैं सोच रहा किस राह चलूं
            हर मठाधीश कहता रहता ,मैं उसके मठ के द्वार चलूं
            मुल्ला जी दावत देते हैं ,पंडत जी उधर बुलाते हैं
            मन कहता रहता है अकसर ,मैं प्रेम नगर की राह चलूं

फिर काहें उमर गुज़ारी है,इस द्वार गए ,उस द्वार गए
माटी का संचय क्या करना ,जब छोड़ यहीं सब जाना है

दुनिया ने तो झूठा समझा ,तुमने ही कब सच माना है !

                    
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181



शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

गीत 047 : एक मन दो बदन ...

एक गीत 047 : एक मन दो बदन ...

एक मन दो बदन की घनी छाँव में
इक क़दम तुम चलो,इक क़दम मैं चलूँ

ये कहानी नई तो नहीं है मगर
सब को अपनी कहानी नई सी लगे
बस ख़ुदा से यही हूँ दुआ  माँगता
प्रीति अपनी पुरानी कभी ना लगे

एक ही श्वाँस में हम सिमट जायेंगे
एक पल तुम ढलो,एक पल मैं ढलूँ

तेरे शाने से पल्लू सरक जो गया
मान लेता हूँ कोई निमन्त्रण नहीं
फिर वो पलकें झुकाने का क्या अर्थ था?
क्या वो मन का था मन से समर्पण नहीं ?

एक पल मधु-मिलन के लिए प्राण !क्यूँ
उम्र भर तुम जलो, उम्र भर मैं जलूँ ?

चाँदनी सी छलकती बहकती हुई
मेरे आँगन में उतरो कभी तो सही
कितनी बातें छुपा कर,दबा कर रखी
पास बैठो ,कहूँ कुछ, कही अनकही

तुम ज़माने की  बातों से डरना नहीं
फूल बन तुम खिलो ,गन्ध बन कर मिलूँ

उन के आने की कोई ख़बर तो नहीं
आँख मेरी क्यूँ रह रह फड़कने लगी
इस चमन में अचानक ये क्या हो गया
हर कली क्यूँ चहकने बहकने  लगी

नेह की डोर से जो कि टूटे नहीं
तुम मुझे बाँध लो,मैं तुम्हे बाँध लूँ

किसके आँचल को छू कर हवा आ गई
सोये सपने हमारे जगा कर गई
मैं भटकने लगा किस के दीदार में
और मुझ को ही मुझसे जुदा कर गई

एक आवाज़ आती रही उम्र भर
एक आभास बन कर तुम्हें मैं छलूँ

शब्द मेरे भी चन्दन हैं, रोली बने
भाव पूजा की थाली लिए, आ गया
तुमको स्वीकार ना हो, अलग बात है
दिल में आया ,जो भाया, वही गा गया

आरती का दीया हूँ तिरी ठौर का
लौ लगी है,जली है ,तो क्या ना मिलूँ ?
एक मन दो बदन की घनी छाँव में ......

-आनन्द.पाठक-




बुधवार, 4 सितंबर 2013

एक ग़ज़ल 52[35] : गो धूप तो हुई है...

221---2122 // 221--2122

गो धूप तो हुई है , पर ताब वो नहीं है
जो ख़्वाब हमने देखा ,ये ख़्वाब वो नहीं है

मजलूम है कि माना,ख़ामोश रहता अकसर
पर बे-नवा नहीं है ,बे-आब वो नहीं है

कुछ मगरिबी हवाओं का पुर-असर है शायद
फ़सलें नई नई हैं ,आदाब वो नहीं है

अपनी लहू से सींचे हैं जांनिसारी कर के
आई बहार लेकिन शादाब वो नहीं है

एहसास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत,अस्बाक़-ए-तर्क़-ए-उलफ़त
मेरी किताब-ए-हस्ती में बाब वो नहीं है

इक नूर जाने किसकी दिल में उतर गई है
एहसास तो यक़ीनन ,पर याब वो नहीं है

ता-उम्र मुन्तज़िर हूँ दीदार-ए-यार का मैं
बेताब जितना "आनन",बेताब वो नहीं है

शब्दार्थ
ताब = गर्मी ,चमक
बे-नवा= बिना आवाज़ के
बे-आब= बिना इज्ज़त के
मगरिबी [हवा]= पश्चिमी [सभ्यता]
जांनिसारी =प्राणोत्सर्ग
आदाब =तमीज-ओ-तहज़ीब
शादाब = हरी भरी ,ख़ुशहाली
एहसास-ए-हिर्स-ओ-नफ़रत,अस्बाक़-ए-तर्क़-ए-उलफ़त= लालच औत नफ़रत की अनुभूति और प्यार मुहब्बत के छोडने/भुलाने के सबक़]
बाब = अध्याय [chapter]
मेरी किताब-ए-हस्ती में=मेरे जीवन की पुस्तक में
मुन्तज़िर = प्रतीक्षक
याब =प्राप्य

-आनन्द.पाठक
8800927181

बुधवार, 28 अगस्त 2013

गीत 046 : चार दिन की जिंदगी से--

गीत 046

चार  दिन की ज़िन्दगी से चार पल हमने चुराये
मिलन के पावन क्षणों में,दूर क्यों गुमसुम खड़ी हो ?

जानता हूँ इस डगर पर हैं लगे प्रतिबन्ध सारे
और मर्यादा खड़ी ले सामने  अनुबन्ध  सारे
मन की जब अन्तर्व्यथा नयनों से बहने लग गईं
तो समझ लो टूटने को हैं विकल सौगन्द सारे

हो नहीं पाया अभी तक प्रेम का मंगलाचरण तो
इस जनम के बाद भी अगले जनम की तुम कड़ी हो
मिलन के पावन क्षणों में .......

आ गई तुम देहरी पर कौन सा विश्वास लेकर   ?
कल्पनाओं में सजा किस रूप का आभास लेकर  ?
प्रेम शाश्वत सत्य है ,मिथ्या नहीं ,शापित नहीं है
गहन चिन्तन मनन करते आ गई चिर प्यास लेकर

केश बिखरे ,नयन बोझिल कह रही अपनी जुबानी
प्रेम के इस द्वन्द में तुम स्वयं से कितनी लड़ी हो
मिलन के पावन क्षणों में .....

हर ज़माने में लिखी  जाती रहीं कितनी  कथायें
कुछ प्रणय के पृष्ट थे तो कुछ में लिक्खी थीं व्यथायें
कौन लौटा राह से, इस राह पर जो चल चुका है
जब तलक है शेष आशा ,मिलन की संभावनायें

यह कभी संभव नहीं कि चाँद रूठे चाँदनी से
तुम हृदय की मुद्रिका में एक हीरे सी जड़ी हो
मिलन के पावन क्षणों में .....

-आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181



गुरुवार, 22 अगस्त 2013

एक ग़ज़ल 51 : आप हुस्न-ओ-शबाब रखते हैं.....



2122--1212--22

आप हुस्न-ओ-शबाब रखते हैं
इश्क़ मेरे  भी  ताब रखते हैं

जान लेकर चलें हथेली  पे
हौसले इन्क़लाब  रखते  हैं

उनके दिल का हमें नहीं मालूम
हम दिल-ए-इज़्तिराब रखते हैं

जब भी उनके ख़याल में डूबे
सामने माहताब रखते  हैं

आप को जब इसे उठाना है
आप फिर क्यूँ हिज़ाब रखते हैं ?

मौसिम-ए-गुल कभी तो आयेगा
हम भी आँखों में ख़्वाब रखते हैं

अब तो बस,बच गया जमीर ’आनन
आज भी आब-ओ-ताब रखते हैं



-आनन्द.पाठक

शनिवार, 17 अगस्त 2013

एक ग़ज़ल 50 : वो शहादत पे सियासत कर गए...

2122--2122-212

वो शहादत पे सियासत कर गए
मेरी आंखों में दो आँसू भर गए

लोग तो ऐसे नहीं थेक्या हुआ ?
लाश से दामनकशां ,बच कर गए

देखने वाले तमाशा देख कर
राह पकड़ी और अपने घर गए

ये शराफ़त थी हमारी ,चुप रहे
क्या समझते हो कि तुम से डर गए?

सद गुनाहें याद क्यों आने लगे
बाअक़ीदत जब भी उनके दर गए

साथ लेकर क्या यहाँ से जाओगे
जो गये हैं साथ क्या लेकर गए

दिल के अन्दर तो कभी ढूँढा नहीं
ढूँढने आनन’ को क्यूँ बाहर गए
 
दामनकशां = अपना दामन बचा कर निकलने वाला
बाअक़ीदत =श्रद्धा पूर्वक


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 10 अगस्त 2013

एक ग़ज़ल 49[31] : आदर्श की किताबें...

221--2122 // 221-2122

आदर्श की किताबें पुरजोर बाँचता है
लेकिन कभी न अपने दिल में वो झाँकता है

जब सच ही कहना तुमको ,सच के सिवा न कुछ भी
फिर क्यूँ हलफ़ उठाते ,ये हाथ  काँपता है ?

फ़ाक़ाकशी से मरना ,कोई ख़बर न होती
ख़बरों में इक ख़बर है वो जब भी खाँसता है

रिश्तों को सीढ़ियों से ज़्यादा नहीं समझता
उस नाशनास से क्या उम्मीद  बाँधता है !

पैरों तले ज़मीं तो कब की खिसक गई है
लेकिन वो बातें ऊँची ऊँची ही हाँकता है

आँखे खुली है लेकिन दुनिया नहीं है देखी
अपने को छोड़ सबको कमतर वो आँकता है

कुछ फ़र्क़ तो यक़ीनन ’आनन’ में और उस में
मैं दिल को जोड़ता हूँ ,वो दिल को बाँटता है

-आनन्द पाठक-
09413395592

रविवार, 4 अगस्त 2013

एक ग़ज़ल 48[37] : दर्द-ए-उल्फ़त..

2122--1212--22

दर्द-ए-उल्फ़त है ,भोला भाला है
दिल ने मुद्दत से इसको पाला है

सैकड़ों तल्ख़ियां ज़माने  की
जाम-ए-हस्ती में हम ने ढाला है

मैं तो कब का ही मर गया होता
मैकदो ने मुझे सँभाला  है

जब हमें फिर वहीं बुलाना था
ख़ुल्द से क्यूँ हमें निकाला है

अब तो दैर-ओ-हरम के साए में
झूट वालों का बोलबाला है

हर फ़साना वो नामुकम्मल है
जिसमें तेरा नहीं हवाला है

आँख मेरी फड़क रही कल से
लगता वो आज आनेवाला है

आज तक हूँ ख़ुमार में ’आनन’
हुस्न ने जब से जादू डाला है


शब्दार्थ
मुद्दत = लम्बे समय से
तल्ख़ियां = कटु अनुभव
जाम-ए-हस्ती= जीवन के प्याले में
खुल्द = स्वर्ग से [ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन...]
नामुकम्मल =अधूरा है
खुमार = नशे में [ध्यान रहे चढ़ते हुए नशे को ’सुरूर’ कहते है
और उतरते हुए नशे को ’ख़ुमार’ कहते हैं

आनन्द.पाठक

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

एक ग़ज़ल 47[04] : वो चाहता है ...

221---2121---1221---212
एक ग़ज़ल: वो चाहता है--ओके

वो चाहता है  तीरगी को रोशनी  कहूँ
कैसे ख़याल-ए-ख़ाम को मैं आगही कहूँ ?

वो” हाँ’ में”हाँ’ मिला रहा हर एक बात पर
’ उसका ये शौक़ है-’कहूँ कि बेबसी कहूँ ।

ग़ैरों के दर्द का तुम्हें  एहसास ही नहीं
फिर क्या तुम्हारे सामने ग़म-ए-आशिक़ी कहूँ !

सच सुन सकोगे तुम में अभी वो सिफ़त नहीं
कैसे सियाह रात को मैं चाँदनी कहूँ  ?

रफ़्तार-ए-ज़िन्दगी से जो फ़ुरसत मुझे मिले
रुदाद-ए-ज़िन्दगी मै कभी अनकही  कहूँ

जाने को था किधर ,कि मै जाने लगा  किधर ?
मैं  बेखुदी कहूँ कि इसे तिश्नगी कहूँ ?

’ज़र’ भी पड़ा है सामने ,’ईमान’ भी  खड़ा
’आनन’ किसे मैं छोड़ दूँ,किसको ख़ुशी,कहूँ

-आनन्द पाठक--

सोमवार, 22 जुलाई 2013

एक ग़ज़ल 46 : रोशनी से कब तलक....


एक ग़ज़ल 46: रोशनी से कब तलक....
2122--2122---2122

रोशनी से कब तलक डरते रहोगे ?
’तालिबानी’ इल्म में पलते रहोगे

यूँ किसी के हाथ का बन कर खिलौना
कब तलक उन्माद में लड़ते रहोगे ?

तुम ज़मीर-ए-ख़ास को मरने न देना
गाहे-गाहे सच की तो सुनते रहोगे

प्यार के दो-चार पल जी लो,वगरना
नफ़रतों की आग में जलते रहोगे

जानता हूँ ’रोटियों’ के नाम लेकर
तुम सियासी चाल ही चलते रहोगे

मैं सदाकत के लिए लड़ता रहूँगा
और तुम ! दम झूट का भरते रहोगे

जब कभी फ़ुर्सत मिले,’आनन’ से मिलना
मिल जो लोगे ,बारहां मिलते रहोगे


-आनन्द.पाठक
09413395592

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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

गीत 045: परदे के पीछे से...

एक गीत 045: परदे के पीछे से छुप कर--

परदे के पीछे से छुप कर ,मन ही मन शरमाती क्यों हो?
पायल फिर खनकाती क्यों हो ?


माटी से ही अगर बनाया ,माटी में क्यों मिला दिया है ?
मेरे आराधन को बोलो तुमने कैसा सिला दिया है ?
कैसा खेल रचाया तुमने , कैसी मुझको सज़ा मिली है ?
नज़रों में जब बसा लिया था, दिल से फिर क्यों भुला दिया है ?


मेरा दर्द नहीं सुनना तो अपना दर्द सुनाती क्यों हो ?
हुँक्कारी भरवाती क्यों हो ?


जितना सीधा सोचा था पर उतनी सीधी नहीं डगरिया
आजीवन भरने की कोशिश,फिर भी खाली रही गगरिया
दूर क्षितिज के पार गगन से करता रहा इशारा कोई
ढलने को जब शाम हो चली ,अब तो आजा मेरी नगरिया


काट चिकोटी मुझको ,हँस कर दूर खड़ी हो जाती क्यों हो ?
मुझको व्यर्थ सताती क्यों हो?


कितना चाहा रूप तुम्हारा शब्दों में कुछ ढाल सकूँ मैं
अल्हड़ यौवन पे था चाहा प्रेम चुनरिया डाल सकूँ मैं
गर्दन झुका के पलक झुकाना माना नहीं निमन्त्रण,फिर भी
चाहत ही रह गई अधूरी प्रणय दीप कि बाल सकूँ मैं


रह रह कर साने से अपने आँचल फिर सरकाती क्यों हो ?
अपने होंठ दबाती क्यों हो?


[हुँकारी = अपने समर्थन में ’हाँ’ हूँ’ करवाना]

-आनन्द पाठक ’आनन’
880092 7181

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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

एक ग़ज़ल 44 : मेरे ग़म में वो ...


212--212--212--212

मेरे ग़म में वो आँसू बहाने लगे
देख घड़ियाल भी मुस्कराने लगे

नाम उनका हवाले में क्या आ गया
’गाँधी-टोपी’ हैं फिर से लगाने लगे

रोशनी डूब कर तो तभी मर गई
जब अँधेरे गवाही में आने लगे

बोतलों में रहे बन्द ’जिन’ अब तलक
फिर चुनावों में बाहर हैं आने लगे

दल बदल आप करते रहे उम्र भर
बन्दरों को गुलाटी सिखाने लगे

उम्र भर जो कलम के सिपाही रहे
बोलियां ख़ुद वो अपनी लगाने लगे

आजकल जाने ’आनन’ को क्या हो गया
यूं ज़माने से क्यों ख़ार खाने लगे ?

आनन्द.पाठक
09413395592

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

एक ग़ज़ल 43 : चौक पे कन्दील जब...

एक ग़ज़ल : चौक पे कन्दील जब ....
2122-2122-212

चौक पे कन्दील जब जलने लगी
तब सियासत मन ही मन डरने लगी

आदिलों की कुर्सियाँ ख़ामोश हैं
भीड़ ही अब फ़ैसला करने लगी

क़ातिलों की बात तो आई गई
कत्ल पे ही शक ’पुलिस’ करने लगी

ख़ून के रिश्ते फ़क़त पानी हुए
’मां’ भी बँटवारे में है बँटने लगी

जानता हूं ये चुनावी दौर है
फिर से सत्ता दम मिरा भरने लगी

तुम बुझाने तो गये थे आग ,पर
क्या किया जो आग फिर बढ़ने लगी

इस शहर का हाल क्या ’आनन’ कहूँ
क्या उधर भी धुन्ध सी घिरने लगी ?


-आनन्द पाठक
09413395592



आदिल = न्यायाधीश
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