चन्द माहिए 111/21 [ नोंक-झोंक के]
:1:
तुम चाँद से भी सुंदर
झील सी हैं आँखें
तुमसे न कोई बेहतर
:2:
मस्का न लगाओ जी
पहले घर जा कर
मुँह धोकर आओ जी
:3:
मुझसे भी कभी जुड़ कर
दिल सच्चा मेरा
देखो तो ज़रा मुड़ कर
:4:
बनते हो दिलवाले
जान रहीं हूँ मैं
तुम हो दिल के काले
:5:
मैं चाँद भी ला दूँगा
और सितारे भी
जुल्फ़ों में सजा दूँगा
:6:
हट ! सोच बड़ी सस्ती
दाँत नहीं मुँह में
करने को चला मस्ती
:7:
बेबात का रगड़ा क्यों ?
हम तुम जब राजी
फिर व्यर्थ का झगड़ा क्यॊ ?
:8:
अच्छा जी, मियाँ, मजनू !
पिचके गालों पर
कितना है गुमाँ, मजनू !
-आनन्द पाठक”आनन’
8800927181
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