बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 458 [32-जी] : वह आदमी है ऐसा, --

ग़ज़ल 458 [32-जी] :  वह आदमी है ऐसा, 
 221---2122-// 221--2122

वह आदमी है ऐसा, ख़ुद को बड़ा दिखाता
बैठा जहाँ घड़ी भर, अपना ही गीत गाता ।

सब को बता रहा है, ख़ुद को वो इन्क़्लाबी 
सत्ता की सीढ़ियों पर जो पूँछ है हिलाता ।

मैने ये तीर मारा , मैने वो तीर मारा 
शेखी बघारता है, किस्सा वो जब सुनाता ।

वह बाँटता फिरे है, सौगात हर ’इलेक्शन’
जुमले नए नए गढ़, फिर ख़्वाब है दिखाता ।

खुद को समझ रहा है , सबसे बड़ा वो ज्ञानी
हर मामले में अपनी , बस टाँग है अड़ाता ।

बाते तमाम उसकी होती हवा हवाई -
कैसे करें भरोसा क्या सच कि वह बताता ।

’आनन’ बचाना ख़ुद को, बस दूर ही से मिलना
सुनते है उसका काटा, पानी न माँगता है ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181

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सोमवार, 29 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 457 [31-जी] : ख़्वाब में जब से देखा है --

 ग़ज़ल  457 [31-G]
212---212---212---212

ख़्वाब में जब से देखा है अक्स-ए-क़मर
जुस्तजू बस उसी का रहा उम्र भर ।

दिल जो होने लगे आरिफ़ाना अगर
तो समझना कि होने को है इक सहर ।

ख़ुशनुमा एक एहसास दिल में तो है 
वह भले ही न आता कहीं हो नज़र ।

जब तलक लौ लगी थी नहीं आप से
मन भटकता रहा बस इधर से उधर ।

बात कैसे सुनोगे, वह क्या कह रहा
दिल पे ग़ालिब तुम्हारे है जब शोर-ओ-सर ।

यूँ ही सजदे में रहने से क्या फ़ायदा
सर तो सजदे में है और तू बाख़बर ।

आख़िरत से तू ’आनन’ परेशान क्यों
राह-ए-हक़ में अगर है तो क्या ख़ौफ़ डर ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-

अक्स-ए-क़मर = चाँद की छवि
ग़ालिब   = प्रभाव
शोर-ओ-सर = कोलाहल
आख़िरत से = परलोक से

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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

गीत 093 : आँकड़ो का खेल जारी है--

 एक नवगीत 

2122---2122--2 =16

आँकड़ों का खेल जारी है, सच दबा है, झूठ भारी है ।

भीड़ देखी हो गए गदगद

तालियों की भीख माँगे हैं ।

रोशनी चुभती उन्हे हरदम

पास उनके सौ बहाने हैं ।

भाषणों में नौकरी तो है, अस्ल में बेरोजगारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


हाथ जोड़े आ रहे है हो जो

सर झुका कर ’वोट’ माँगोगे ।

सैकड़ों सपने दिखा कर तुम’

बाद सब कुछ भूल जाओगे ।

वायदों पर वायदे करना, भूलना आदत तुम्हारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


मुफ़्त की है रेवड़ी सबको,

एक धेला भी नहीं देना ।

बात लाखों की, हज़ारों की

बस उन्हे तो ’वोट’ है लेना।

बात में जादूगरी उनकी, सोच में भी होशियारी है ।

आँकड़ों का खेल जारी है ------


-आनन्द.पाठक ’आनन’-


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 456[30-जी] अब न मिलता कोई शख़्स है

 

ग़ज़ल 456 [30-जी] : अब न मिलता कोई शख़्स है--
212---212---212---212


अब न मिलता कोई शख़्स है मोतबर
जिस पे कर लूँ भरोसा मैं दिल खोल कर

तुमको खुशबू मिले जो कभी राह में
सोचना यह थी उनकी कभी रहगुज़र

तुम मिले क्या मुझे दिल ये रोशन हुआ
इक अंँधेरे में जैसे हुई हो सहर  ।

वक़्त ने क्या न ढाए हैं मुझ पर सितम
फिर भी बिखरा नहीं हूँ अभी टूट कर

तेरी चाहत जिधर ले के चल तू मुझे
तू ही रस्ता दिखा ऎ मेरे  राहबर ।

ढूँढता ही रहा , वो न हासिल हुआ
ख़्वाब में जो था चेहरा रहा उम्र भर

तेरे सजदे में होने से क्या फायदा
सर तो सजदे में  है और तू बाखबर ?

चल पड़े हो जो ’आनन’ रह-ए-इश्क़ में
कू-ए-जानाँ से आना नहीं लौट कर ।

-आनन्द पाठक ’आनन’-
8800927181

मोतबर = विश्वसनीय, जिस पर एतबार किया जा सके

कू-ए-जानाँ = प्रेयसी की गली 

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बुधवार, 24 दिसंबर 2025

अनुभूतियाँ 185/72

 अनुभूतियाँ 185/72

737
 ऐसे भी कुछ लोग यहाँ है ,
धन के मद में , सदा अहम में ।
व्यर्थ दिखावा करते रहते ,
जीते रहते एक भरम में ।

738
सिर्फ़ दिखावा, झूठी आभा
ज़हर घुला मधुरिम बानी में
समझ रहे हैं हम भी कुछ कुछ
क्या तुम हो, कितने पानी में ।

739
तुमने देखी होगी दुनिया
 मैने भी है  दुनिया देखी
सत्य हमेशा सच रहता है
भले बघारो जितना शेखी

740
अपने ही मुँह मिठ्ठू बनना
आत्म मुग्धता में ही रहना
पता नहीं है शायद तुमको
कूएँ से बाहर भी दुनिया ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

अभी संभावना है---पुस्तक समीक्षा --समीक्षक श्री राम अवध विश्वकर्मा





 [ नोट ;-समीक्षक आ0 राम अवध विश्वकर्मा जी के बारे में ----

ग्वालियर निवासी आ0 रामअवध विश्वकर्मा जी स्वयं एक साहित्यकार ,ग़ज़लकार है, एक समीक्षक भी हैं। आप की कई साहित्यिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जैसे-मेहमान भी लटकते है-चाकू खटकेदार है अब--इसकी टोपी उसके सर-तंग आ गया सूरज--आदि आदि।आप ने गद्य व्यंग्य - मुफ़्तख़ोरी ज़िंदाबाद जो काफी चर्चित रही।
 आप की सबसे चर्चित पुस्तक -ज़दीद रुबाईयात [ रुबाई संग्रह] है। चर्चित इसलिए कि आजकल ग़ज़ल के ज़माने में रुबाइयाँ कम लिखी  पढ़ी या सुनी जा रही हैं ।
हाल में  ही आप की कृतियों पर शिवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर में -: राम अवध विश्वकर्मा की ग़ज़लों में व्यंग्य;- के संदर्भ में शोधकार्य सम्पन्न  हुआ है।-------आनन्द.पाठक ’आनन’-
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पुस्तक समीक्षा--अभी सम्भावना है [ आनन्द पाठक’आनन’]
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उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला में जन्मे श्री आनंद पाठक उपनाम 'आनन' से गीत गजल माहिया दोहे मुक्तक अनुभूतियां व्यंग्य  लेखन बड़ी कुशलता से लिखते हैं। यदा कदा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में एवं साझा संकलन में आपकी रचनाएं प्रकाशित भी होती रहती हैं। इन सब के अलावा विभिन्न सोशल मीडिया साहित्यिक मंचों पर आप सक्रिय रहते हैं। आपके लेख अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं जो रुचिकर एवं ग्राह्य  होते हैं। आपका एक महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय कार्य  www.arooz.co.in वेव साइट जिसमें  ग़ज़ल एवं रुबाई आदि के व्याकरण पर विस्तृत चर्चा सरल भाषा में की गई है।  मेरा मानना है कि इस  वेवसाइट पर अरूज़ पढ़ने के बाद ग़ज़ल लिखने वालों को ग़ज़ल की बारीकियां सीखने के लिए अन्यत्र भटकने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी।  भारत संचार निगम लिमिटेड से मुख्य अभियंता [सिविल]  पद से सेवानिवृत होने के बावजूद आपके स्वभाव में नम्रता, सरलता होना आपकी विशेषता है। अब तक आपकी 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'अभी संभावना है' सन 2007 में प्रकाशित पुस्तक गीत गजल संग्रह की यह संशोधित आवृत्ति है। श्री आनंद पाठक जी ने बड़े उदार मन से यह स्वीकार किया है की 2007 में प्रकाशित इस पुस्तक में व्याकरण की दृष्टि से बहुत सी गलतियां थीं जिसे उन्होंने सुधार कर पुनः प्रकाशित किया है। इस पुस्तक में 66 ग़ज़लें और 21 गीत हैं।
भूख, गरीबी, संघर्ष, जुल्म,दर्द  एवं राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक विद्रूपताओं के प्रति निर्भीकता से अपनी बात श्री आनन्द पाठक 'आनन' जी  ग़ज़ल एवं गीत के माध्यम से पाठक के सामने रखते हैं।
पुस्तक 'अभी सम्भावना है' अदम्य जिजीविषा (जीने की इच्छा), आशावाद और निरंतर संघर्ष का प्रतीक हैं। कवि इस पुस्तक  के माध्यम से जीवन के प्रति एक जुझारू दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा है जो इस पुस्तक की पहली ग़ज़ल का प्रथम  शेर  इसकी पुष्टि करता है।

'कीजिए मत रोशनी मद्धम, अभी संभावना है,
कुछ अभी बाकी सफ़र है, तीरगी' से सामना है।'

मजलूमों में बहुत ताकत होती है। अगर वह अपनी पर आ जाये तो वह  जुल्म करने वाले तानाशाह को उसकी औकात दिखा सकता है। उसके महल की ईंट से ईंट बजा सकता है। इस सम्बन्ध में उनका एक शेर देखें।

'भूखे मजलूमों की ताकत शायद तुमने जाना न कभी
बुनियाद  हिलाते महलों के लम्हात नहीं देखे होंगे'


काजल की कोठरी से बेदाग बचकर निकल आना बहुत मुश्किल होता है। इंकिलाब के हिमायती के रथ का पहिया किस प्रकार कुर्सी के चक्कर में फंसकर स्वार्थ के दलदल में धॅंस जाता है उनका यह शेर बख़ूबी बयान करता है।

'फ़क़त  कुर्सी निग़ाहों में जहां था स्वार्थ का दलदल
तुम्हारा इंक़िलाबी रथ वहीं अब तक धॅंसा होगा'


सत्ता लोलुप राजनेताओं का कोई  ईमान नहीं होता है। वे सत्ता के लोभ में अपने सिद्धांत को त्याग कर अपने आप को बेंच देते हैं। ऐसे राजनेताओं पर कटाक्ष करता हुआ 'आनन' जी का यह शेर आज भी ताजा लगता है।

'जिसको कुर्सी अज़ीज़ होती है
उसको बिकते यहां वहां देखा'


धार्मिक पाखंडियों पर एक कटाक्ष देखें-

'राम कथा' कहते फिरते थे गांव गली में वाचक बन
'दिल्ली' जाकर ही जाने क्यों 'रावण' की पहचान बने

टेलीविज़न चैनल पर जो बहस जनता  के आम मुद्दों पर होनी चाहिए थी वह न होकर निरर्थक बातों पर होती रहती है इसी बात से दुखी होकर कवि कहते हैं -

'बहस करनी अगर हो तो करो मुफ़लिस की रोटी पर
न टीवी पर करो बस बैठकर बेकार की बातें'


उनके गीत भी मन को छू लेने वाले हैं। इस पुस्तक  एक गीत
'मत छूना प्रिय मुझको अपने स्नेहिल हाथों से' का निम्नलिखित बन्द
वैराग्य और अत्यंत दुख के मिश्रण से भरा हुआ  है। इसमें उस स्थिति का वर्णन है जहाँ इंसान भौतिक दुनिया की निस्सारता को समझ चुका है और अपने भीतर के घावों के साथ अकेला रहना चाहता है। यह कविता संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है।

तन का पिंजरा रह जाएगा उड़ जायेगी सोन चिरैया,
खाली पिंजरा दो कौडी का क्या सोना क्या चांदी भैया!
इतनी ठेस लगी है मन में इतने खोंच लगे जीवन में,
सिलने की कोशिश मत करना तार-तार मैं हो जाऊँगी।
पोर-पोर तक दर्द भरा है....

एक अन्य गीत की  इन पंक्तियों में एक ऐसी स्थिति का वर्णन किया है जहाँ समर्पण और प्रेम की बार-बार अनदेखी की गई है।
 जब प्रेम और स्वागत (वन्दनवार) का कोई मूल्य ही न बचा हो, तो दिखावे की सजावट करना निरर्थक है।
आत्मीयता, मनुहार (अनुनय-विनय) और स्नेह भरे आमंत्रण को बार-बार ठुकराया गया है।
जीवन भावनाओं के बजाय केवल समझौतों और 'शर्तों की भाषा' में उलझकर रह गया है, जहाँ निस्वार्थ प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं है।
जब जीवन में केवल दुखों और नकारात्मकता (अंधियारों) का बोलबाला हो, तो वहाँ आशा की किरण (ज्योति पुंज) की बात करना भी अर्थहीन प्रतीत होता है।

जब मेरी देहरी को ठुकरा कर ही जाना,
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा?

आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
आँचल के शीतल छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गई ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार जिन्दगी कटी शर्त की भाषा में
जब अंधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर ज्योति पुंज  की बात सुना कर क्या होगा


इस प्रकार पुस्तक की सभी ग़ज़लें व गीत पठनीय हैं।
पुस्तक का नाम - अभी संभावना है
प्रकाशक- अयन  प्रकाशन उत्तम नगर नई दिल्ली
कवि- आनंद पाठक 'आनन'
मो.   8800927181
मूल्य- ₹ 360/-हार्डबाउन्ड

समीक्षक - राम अवध विश्वकर्मा
मो. 9479328400

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 455[29-जी] : हज़ारों बार बातें हो चुकी

 ग़ज़ल 455[29-जी] : हज़ारों बार बातें हो चुकी-

1222---1222---1222---1222

हज़ारों बार बातें हो चुकीं, क्या उनको दुहराना ।

मसाइल हो चुके जो हल उन्हे क्यों फिर से उलझाना ।


तुम्हें शौक़-ए-अदावत है , मुझे शौक़-ए-मुहब्बत है

वफ़ा भी चीज कोई है , कभी तुमने नहीं माना ।


निगाहें क्या झुकीं पलभर, लबों पर क्या हुई ज़ुम्बिश

ये दुनिया भर की सरगोशी बना देती है अफ़साना ।


तुम्हारा मुंतज़िर हूँ मैं, तुम्हारी रहगुज़र में हूँ 

ख़याल-ओ-ख़्वाब में तुम हो, नहीं बच कर निकल जाना ।



पस-ए-पर्दा रहोगे तुम पहेली बन के यूँ कबतक

इधर बेचैन हैं आँखे ,ज़रा तुम सामने आना ।


सिफ़त क्या है मुहब्बत की, नहीं मालूम क्या तुमको ?

चले इस राह पर जब हो, नहीं अब लौट कर जाना ।


हवाओं के मुक़ाबिल तुम जलाते हो चिराग़ ’आनन’

बहुत मुशकिल हुआ करता चिराग़ों को बचा पाना ।


-आनन्द पाठक ’आनन’-

8800927181

मसाइल = मसले, समस्यायें

मुंतज़िर = प्रतीक्षक
पस-ए-पर्दा = पर्दे के पीछे

सिफ़त = विशेष गुण

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मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

ग़ज़॒ल 454 [28-जी] बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो--


ग़ज़ल 454 [28-जी] : बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो--

  2122---2122---2122

बदज़ुबानी पर उतर आने लगा वो

पस्ती.ए.अख़्लाक़ दिखलाने लगा वो


जब से उसने छोड़ दी अपनी शराफ़त 

और भी नंगा नज़र आने लगा वो ।


खुद लिखा अपना क़सीदा ख़ुद पढ़ा जब

बेसबब खुद पर ही इतराने लगा वो ।


ख़ुद गरज़ था या कि कुछ मज़बूरियाँ थीं

सत्य की हर बात झुठलाने लगा वो ।


हाथ में उसके बग़ावत की क़लम है

गीत चारण की तरह गाने लगा वो ।


जब दलीलें थीं नहीं कुछ पास उसके

बेसबब मुझ पर ही चिल्लाने लगा वो ।


जब गिला शिकवा किए हम उस से ’आनन’

बारहा झूठी कसम खाने लगा वो ।


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

8800927181

पस्ती ए अख़लाक़ = चारित्रिक पतन

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रविवार, 14 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 453 [ 27-जी] : नहीं छुपती छुपाने से

 ग़ज़ल 453 [ 27-जी] : नहीं छुपती मुहब्बत है जमाने में
1222---1222---1222---1222-

नहीं छुपती मुहब्बत है जमाने में छुपाने से  ।
बयां सब राज़ हो जाते निगाहों के झुकाने से ॥

समझ जाती है दुनिया यह, सही क्या है ग़लत क्या है
निगाहों की बयानी से, ज़ुबाँ के लड़खड़ाने से ।

हवा में गूँजती रहती, मुहब्बत के हैं अफ़साने
नहीं मरती कभी यादें किसी के दूर जाने से ।

मनाज़िल और भी तो हैं नहीं बस एक ही मंज़िल
उमीदे जाग जाती हैं ज़रा हिम्मत जगाने से ।

निकाब-ए-रुख उठा कर वह कभी आएँगे इस जानिब
इसी उम्मीद में बैठा हुआ हूँ, इक ज़माने से ।

मरासिम अब नहीं वैसे कि जैसे थे कभी पहले
कि दिल गुलज़ार था अपना तुम्हारे आने जाने से ।

अगर दिल पाक हो ’आनन’ अना की क़ैद ना हो तो
नहीं कुछ दूसरा बढ़ कर मुहब्बत के ख़ज़ाने से।

-आनन्द.पाठक ’आनन’--

8800927181

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सोमवार, 8 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 452[26-G] : भरोसा तोड़ कर वह

 ग़ज़ल 452 : भरोसा तोड़ कर

1222---1222---1222


भरोसा तोड़ कर वह मुस्कराता है

कि जैसे दिल पे वह ख़ंज़र चलाता है ।


नहीं रहता वो अपने क़ौल पर क़ायम

किसी को कुछ, किसी को कुछ बताता है।


न जाने सोचता रहता वो क्या हरदम

हवा में बारहा लिखता मिटाता है ।


मुहब्बत का नशा उसको चढ़ा ऐसा

वो अपने आप को ही भूल जाता है ।


न लौटेंगे गए जो छोड़ कर तुझको

तो फिर उम्मीद क्या उनसे लगाता है ।


परिंदे लौट कर अब फिर न आएँगे

इसी ग़म में शजर फिर टूट जाता है ।


असर होना नहीं जब उस पे कुछ ’आनन’

अबस तू जख़्म अपना क्यों दिखाता है ।


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

8800927181

अबस = व्यर्थ


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रविवार, 7 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 451 [25-G ] : ज़ुबाँ देकर किसी को--

 ग़ज़ल 451 [ 25-G ] ज़ुबाँ दे कर किसी को --

1222---1222-----1222-

ज़ुबाँ देकर किसी को, फिर मुकर जाना
मगर उसने इसे अपना हुनर माना ।

मुहब्बत में फ़ना की बात करता है
न आता इश्क़ में जिसको तड़प जाना ।

पढ़ा वो भी जो लिख्खा था नहीं तुमने ,
उभर आया था ख़ुद ही हर्फ़-ए-अफ़साना ।

तुम्हारी बेनियाज़ी बेरुखी का  भी--
नहीं उनका कभी मैने बुरा माना ।

तलाश-ए-हक़ में मुद्दत से भटकता हूँ
जो अंदर है उसे अबतक न पहचाना ।

तुम्हारी बात भी सुन लेंगे ऎ ज़ाहिद!
अभी चलते हैं दोनों साथ मयख़ाना ।

यही इक आरज़ू है आख़िरी ’आनन’
निकलता दम हो जब मेरा, चले आना ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

8800927181

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सोमवार, 1 दिसंबर 2025

ग़ज़ल 450 [ 24-G] : जिधर ज़र है, तुम्हे तो बस--

 

ग़ज़ल 450 [ 24-जी] : जिधर ज़र है, तुम्हे तो बस--

1222---1222---1222

जिधर ज़र है,  तुम्हें तो बस उधर जाना
कि अपना क्या, है अपना दिल फ़क़ीराना ।

बदलते लोग कुछ ऐसे ज़माने में
कि जैसे रंग गिरगिट का बदल जाना ।

करें क्या बात उनसे दोस्ती का हम
जिन्हे आता नहीं रिश्ते निभा पाना

कहानी एक ही जैसी सभी की है ,
करोगे क्या मेरा सुनकर भी अफ़साना ।

गुज़र जाएगी अपनी मुफ़लिसी इक दिन
किसी के सामने क्या हाथ फैलाना ।

कभी है ज़िंदगी में शादमानी तो 
कभी ग़म से मेरा रहता है याराना ।

यहीं  है राह-ए- मयख़ाना भी ,मसजिद भी 
तुम्ही अब तय करो ’आनन’ किधर जाना ।

-आनन्द. पाठक ’आनन’-

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