शुक्रवार, 28 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 61


चन्द माहिया : क़िस्त 61

:1:
गुलशन की हवाओं में
ज़ह्र भरा किसने
हर बार चुनावों में ?

:2:
दर्या ,परबत,झरना
चाँद सितारे सब
ये किसकी है रचना

:3:
कलियाँ सकुची सहमी
चश्म-ए-बद किसकी
आकर इन पर ठहरी

:4:
जितनी है तपिश बाहर
प्रेम अगन मन की
उतनी ही तपिश अन्दर

;5:
दिल मेरा फ़क़ीराना
छोड़ तेरा अब दर
जाना तो किधर जाना

-आनन्द.पाठक-

चन्द माहिया : क़िस्त 60

चन्द माहिया : क़िस्त 60

:1:
इक ख़्वाब-ए-जन्नत में
डूबा है ज़ाहिद
हूरों की जीनत में
:2:
ये हुस्न की रानाई
नाज़-ओ-अदा फिर क्या
गर हो न पजीराई
:3:
ग़ैरों की बातों को
मान लिया सच क्यों
सब झूठी बातों को

:4:
इतना ही फ़साना है
फ़ानी दुनिया मे
बस आना-जाना है

:5:
तुम कहती, हम सुनते
बीत गए वो दिन
थे साथ सपन बुनते


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 26 जून 2019

ग़ज़ल 124 : सलामत पाँव हैं जिनके--

ग़ज़ल 124

1222---1222---1222---122
मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन---फ़ऊलुन

सलामत पाँव है जिनके वो कन्धों पर टिके हैं
जो चल सकते थे अपने दम ,अपाहिज से दिखे हैं

कि जिनके कद से भी ऊँचे "कट-आउट’ हैं नगर में
जो भीतर झाँक कर देखा बहुत नीचे गिरे हैं

बुलन्दी आप की माना कि सर चढ़  बोलती  है
मगर ये क्या कि हम सब  आप को बौने  दिखे हैं

ये "टुकड़े गैंग" वाले हैं फ़क़त मोहरे  किसी के
सियासी चाल है जिनकी वो पर्दे में छुपे  हैं

कहीं नफ़रत,कहीं दंगे ,कहीं अंधड़ ,हवादिस
मुहब्बत के चरागों को बुझाने  पर अड़े  हैं

हमारे साथ जो भी थे चले पहुँचे कहाँ तक
हमें भी सोचना होगा, कहाँ पर हम रुके हैं

धुले हैं दूध के ’आनन’ समझते  थे जिन्हें तुम
वही कुछ लोग हैं जो चन्द सिक्कों में बिके हैं

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]

मंगलवार, 25 जून 2019

ग़ज़ल 123 : साज़िश थी अमीरों की---


मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन  // मफ़ऊलु---मफ़ाईलुन
221--1222  //  221---1222

एक ग़ज़ल : साज़िश थी अमीरों की--

साज़िश थी अमीरों की ,फाईल में दबी होगी
दो-चार मरें होंगे  ,’कार ’ उनकी  चढ़ी  होगी

’साहब’ की हवेली है ,सरकार भी ताबे’ में
इक बार गई ’कम्मो’ लौटी न कभी  होगी

आँखों का मरा पानी , तू भी तो मरा होगा
आँगन में तेरे जिस दिन ’तुलसी’ जो जली होगी

पैसों की गवाही से ,क़ानून खरीदेंगे
इन्साफ़ की आँखों पर ,पट्टी जो बँधी होगी

इतना ही समझ लेना ,कल ताज नहीं होगा
मिट्टी से बने तन पर ,कुछ ख़ाक पड़ी होगी

मौला तो नहीं  हो तुम  ,मैं भी न फ़रिश्ता हूँ
इन्सान है हम दोनों ,दोनों में  कमी होगी

गमलों की उपज वाले ,ये बात न समझेंगे
’आनन’ ने कहा सच है ,तो बात लगी होगी

-आनन्द.पाठक-

[सं 30-06-19]

शुक्रवार, 21 जून 2019

ग़ज़ल 122 :हुस्न हर उम्र में ---

ग़ज़ल

2122--1212---22

हुस्न हर उम्र में जवाँ देखा
इश्क़ हर मोड़ पे अयाँ  देखा

एक चेहरा जो दिल में उतरा है
वो ही दिखता रहा जहाँ देखा

इश्क़ तो शै नहीं तिजारत की
आप ने क्यों नफ़ा ज़ियाँ  देखा ?

और क्या देखना रहा बाक़ी
तेरी आँखों में दो जहाँ देखा

बज़्म में थे सभी ,मगर किसने
दिल का उठता हुआ धुआँ देखा ?

हुस्न वालों की बेरुख़ी  देखी
इश्क़ वालों  को लामकां देखा

सर ब सजदा हुआ वहीं’आनन’
दूर से उनका आस्ताँ देखा

-आनन्द पाठक-

सोमवार, 17 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 05



:1:
जब बात निकल जाती
लाख जतन कर लो
फिर लौट के कब आती ?

:2:

यारब ! ये अदा कैसी ?
ख़ुद से छुपते वो
देखी न सुनी ऐसी

:3:

ऐसे न चलो ,हमदम !
लहरा कर जुल्फ़ें
आवारा है मौसम

:4:

माना कि सफ़र मुश्किल
होता है आसां
मिलता जब  दिल से दिल

:5:

 जब क़ैद ज़ुबां होती
बेबस आँखें तब
अन्दाज़-ए-बयां होती

-आनन्द.पाठक-
[सं0 15-06-18]

शनिवार, 15 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 59

चन्द माहिया : क़िस्त 59

:1:
सब क़स्में खाते हैं
कौन निभाता है
कहने की बाते हैं

:2:

क्या हुस्न निखारा है
जब से डूबा मन
उबरा न दुबारा है

:3:
इतना न सता माहिया
क्या थी ख़ता मेरी
इतना तो बता माहिया

:4:
बेदाग़ चुनरिया में
दाग़ लगा बैठे
आकर इस दुनिया में

:5:
क्या दर्द बताना है
एक तेरा ग़म है
इक दर्द-ए-जमाना है

-आनन्द.पाठक-