बुधवार, 17 अप्रैल 2024

दोहे 19 : सामान्य

दोहे 19

'जग ही सच"- माना किया कितना मै अनजान
वह तो थीं परछाइयाँ , हुआ बाद में ज्ञान ।

एक गया दूजा रहा, दोनों गए न साथ
फिर भी इक जिन्दा रहा बिना हाथ मे हाथ

समय समय का फेर है, जब भी बदली चाल
कल के धन्ना सेठ भी, आज हुए कंगाल

बडे लोग की बात है, मत कर इतना आस
अपनी बाहों सदा 'आनन' रख विश्वास

राहों में काँटे पड़े, कभी न बोले शूल
लेकिन खुशबू बोलती, किधर खिले हैं फूल

जो भी तेरा धर्म हो, जो भी तेरी सोच
मानवता के काज में, मत कर तू संकोच

शनिवार, 13 अप्रैल 2024

दोहे 18

[ इन दोहों में सुधार अपेक्षित है--कॄपया प्रतीक्षा करें ---] 
दोहे 18

राजनीति में मुख नहीं मुखौटा पहचान
”कट आउट’ होने लगी नेता जी की शान

नेता जी दो मुख रखे राजनीति में हिट
एक जॊभ मिसरी घुली एक जीभ में विष

निर्धारित हैं कर दिए नेता जी ने लक्ष्य
एक बार कुर्सी मिले जितना चाहे भक्ष

बौने कद वाले हुए राजनीतिक स्तम्भ
बिना विचार वाले हुए अपने दल के खम्ब

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

दोहे 17 : चुनावी दोहे

 इन दोहों में सुधार

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दोहे 17

साईं इतना दीजिए दस पीढ़ी खा पाय
मै तो भूखा ना रहूँ देश भले मर जाय

लालटेन ले ढूंढते गली गली में वोट
अपने दल को छोड़ कर सभी दलों में खोट

घोटाले की नाव में, सत्ता की पतवार
कोर्ट कचहरी क्या करे, कर ले नदिया पार

राजनीति के खेल में क्या अधर्म क्या धर्म
नेता सफलीभूत वही कर ले सभी कुकर्म

एक श्वास में फूँक दे हवा ठंड औ' गर्म
असली नेता है वही जो समझे यह मर्म

-आनन्द.पाठक-

दोहे 16

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दोहे 16

बुधना खुश ह्वै नाचता छेड़े लम्बी तान
मिरी ग़रीबी से बने नेता कई महान ।

’नंदी ग्राम’ की आग में रहे रोटियाँ सेंक
जनता की सरकार करे, जनता का आखेट

गमले वाले पौध भी ठोंक रहे है ताल
बरगद वाले भजन करे ले खजड़ी करताल

कल ही जो पैदा हुए आज ’युवा-सम्राट’
कैसी कैसी उपाधियाँ करते बन्दर बाँट

गमले उगे गुलाब भी देते हैं उपदेश
बरगद सारे खड़े रहे शीश झुका दरवेश

राजनैतिक मजबूरियाँ हैं श्रद्धा के रूप
अँधियारा कहना पड़े हो विकास की  धूप

क्या जाने क्या होत है यह परमाणु संधि
हाइ कमान से पूछिए हम तो सेवक अंध

-आनन्द.पाठक-

दोहे 15


दोहे  15


दोहे 14

 

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दोहे 14

शब्दों की बाजीगरी नेता जी का खेल
वैचारिक प्रतिबद्धता, हुई हाथ की मैल

सेनाएँ सजने लगी, शुरू चुनावी युद्ध
जनता चुप ह्वै देखती , कौन ग़लत कौन शुद्ध

नेता जी  मुर्च्छित हुए देख चुनाव परिणाम
जनता खोटी हो गई व्यर्थ गयौ मेरे  दाम 

देश प्रेम सेवा समाज , कुरसी के उपनाम
जब चुनाव ही हार गए अब क्या इनका काम

वोट दिया दिल्ली गए, संसद में कुहराम
’बुधना’ बैठा गाँव में . देख कहत ’हे राम!

सभी पार्टियां एक रंग ,नारे की हैं खान
जब आवैं मंत्री धन. सब धन धूरि समान 

नारा दे दे जमा किए वोट बैंक में वोट
बाहुबली ने लूट लिए दिखा दिखा के नोट

-आनन्द.पाठक-

दोहे 13

  
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दोहे 13

जिस बच्चे का धर्म हो झूठ कपट औ’ छल
वह नेता बन जाएगा ,आज नहीं तो कल

निर्दल बाँधे राखिए , उन पर डोरे डार
ना जाने किस हौद में , दे अपना मुँह मार

धक्कम-धुक्की कीजिए, दे दे गाली पद
स्वयमेव बढ़ जाएगा राजनीति में  कद 

छल प्रपंच मद मोह द्वेष नेता की पहचान
साँपन काटे बच सके , इनसे बचै न प्रान

उड़न खटोला पे उड़ें, देख ग़रीबी रोय
जनता छप्पर पर टँगी, दर्द न पूछै कोय

पीड़ित शोषित दलित का आँसू पोछैं धाय
अगले कहीं चुनाव में वोट खिसक न जाए

एक दर्द बस एक टीस , निशदिन करे बेचैन
मंत्री की कुर्सी मिले,  जी में आवै चैन

-आनन्द.पाठक-


दोहे 12

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दोहे 12

रथयात्रा ने कर दिए गाँव शहर में पाँक
कमल उगाने की कशिश,दिल्ली पर है झाँक

घोटाले उगने लगे यत्र तत्र चहुँ ओर
चार कदम चलने लगे वह तिहाड़ की ओर

नित वादों के जाल बुन रहें मछलियाँ फ़ाँस
जनता भी अब सजग हुई ,नहीं फ़टकती पास

एक लक्ष्य बस एक रट, एक आत्मविश्वास
कुर्सी कैसे मिल सके आजीवन यही प्रयास

पत्र पुष्प नैवेद्य से रहता सदा विमुख
ऐसा नेता आज का ,कभी न पावै सुख

बिना तेल की ’लालटेन’ ज्योती रही बिखेर
आस पास उजियार है, दीपक तले अँधेर

शुभ्र धवल वस्त्र देख कर बगुला भी शरमाय
नेता जी ध्यानस्थ हैं ,’लछमिनियाँ’ मिल जाए

-आनन्द.पाठक-

दोहे 11

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 दोहे 11

नेतापदी के दोहरे ज्यों ए0के0 बन्दूक
देखन को छोट्न लगे वार जाए ना चूक

मंडल मंदिर दोनों खड़े काके लागूँ पाँव
आँत भू्ख से तड़प रही, चाय जिधर मिल जाए

कबिरा खड़ा बाज़ार में रथ यात्रा ठहराय
जो घर जारे और का सो इसमें चढ़ जाय

सीजनल कवि गावन लगे नए चुनावी गीत
बैठे ठाले से भली चन्दबरदायी  रीति

गुंडन नियरे राखिए. होटल में ठहराय
वोटर जब गड़बड़ करे बूथ छाप करवाय

गठबंधन की बात सुन ,पत्नी करे पुकार
मै भी गठबंधन करूँ ,स्थायी दो-चार

नेता जी तो व्यस्त है तालमेल की बात
पत्नी उनकी घूमती  और और के साथ

-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

अनुभूतियाँ 139/26

 अनुभूतियाँ  139 /26


:1:

" जब तक अन्तिम साँस रहेगी

सदा चलूँगी छाया बन कर "

मुँहदेखी थी या वह सच था

सोचा करता हूँ  मैं अकसर ।

2

इधर खड़े या उधर खड़े हो
किधर खडे हो साफ बताओ
हवा जिधर की जैसी देखी
पीठ उधर ही मत कर जाओ

3
आवा ही जब नही तुम्हे था
फिर क्यो झूटी कसमें खाई?
सुनना ही जब नहीं तुम्हें कुछ
क्या कहती मेरी तनहाई 

4

हार जीत की बात न होती

इश्क़ इबादत. प्रेम समर्पण ।

कैसे साफ़ नज़र छवि आए

मन का हो जब धुँधला दर्पण ।


-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 8 अप्रैल 2024

अनुभूतियाँ 138/25

अनुभूतियाँ 138/25

:1:

इन्क़िलाब करने निकले थे

लाने को थे नई निज़ामत
सीधे जा पहुँचे तिहाड़ मे
बैठ करेंगे वहीं  सियासत

:2:
लिए हाथ में काठ की हांडी 
कितनी बार चढ़ाओगे तुम
इसकी टोपी उसके सर पर
कबतक रखते जाओगे तुम ?

:3:
झूठ बोलने की सीमा क्या
क्या उसको मालूम नहीं है
जितना भोला चेहरा दिखता
उतना वह मासूम नहीं है ।

:4:
कभी आप को देख रहा हूँ
कभी देखता हूँ अपने को
क्या न उमीदें रखीं आप से
जोड़ रहा टूटे सपने को ।

- आनन्द पाठक-

रविवार, 7 अप्रैल 2024

अनुभूतियाँ 137/24

अनुभूतियाँ 137/24

:1:
रहने दो ये मीठी बातें
झूठ दिखावा झूठे वादे
क्या मै समझ नहीं सकता हूँ
क्या घातें , क्या नेक इरादे

2
हाल यही जो अगर रहा तो
छूटेंगे सब संगी साथी ।
तुम्ही अकेले करती रहना
सुबह-शाम की दीया-बाती ।

:3:
परछाई तो परछाई है
देख सकूँ पर हाथ न आए
एक भरम है जग मिथ्या है
मगर समझ में बात न आए ।

;4;
मन उचटा उचटा रहता है
जाने क्यों ? -यह समझ न पाऊँ
जिसकी सुधियों में खोया हूँ
कैसे मैं उसको बतलाऊँ

-आनन्द.पाठक-



अनुभूतियाँ 136/23 : राम लला पर [ भाग-2]

अनुभूतियां~136/23 : रामलला पर [ भाग-2]  [ भाग -1 देखें 131/18 ]

 :1:

मंदिर का हर पत्थर पावन
प्रांगण का हर रज कण चंदन
हाथ जोड़ कर शीश झुका कर
राम लला का है अभिनंदन


:2:

हो जाए जब सोच तुम्हारी

राग द्वेष मद मोह से मैली

राम कथा में सब पाओगे

जीवन के जीने की शैली ।


:3: 

एक बार प्रभु ऐसा कर दो

अन्तर्मन में ज्योति जगा दो

काम क्रोध मद मोह  तमिस्रा

मन की माया दूर भगा दो ।


:4:

श्याम वर्ण मृदु हास अधर पर

अनुपम छवि पर हूँ बलिहारी

कृपा करो हे राम सियापति

आया हूँ प्रभु ! शरण तिहारी 


-आनन्द पाठक-

शनिवार, 6 अप्रैल 2024

अनुभूतियाँ 135/22

अनुभूतिया 135/22

:1:
एक भरोसा टूट गया जो
बाक़ी क्या फिर रह जाएगा
आँखों में जो ख़्वाब सजे है
पल भर में सब बह जाएगा

:2:
जाने की गर सोच रही हो
जाओ ,कोई बात नहीं फिर
अगर लौट कर आने का मन
खड़ा मिलूँगा तुम्हें यहीं फिर 

:3:
बिला सबब जब करम तुम्हारा
होता है, दिल घबराता है
मीठी मीठी बातें सुन सुन
जाने क्यों दिल डर जाता है

 :4:
शब्दों के आडंबर से कब
सत्य छुपा करता है जग में
बहुत दूर तक झूठ न चलता
गिर जाता है पग दो पग में

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

अनुभूतियाँ 134/21

 अनुभूतियाँ 134/21


:1:

मन का क्या है उड़ता रहता

एक जगह पर कब ठहरा है

लाख लगाऊँ बंदिश इस पर

पगला कब मेरी सुनता  है ।

;2:

पूजन अर्चन में जब बैठूँ

इधर उधर मन भागे फिरता

रिचा मंत्र बस है जिह्वा पर

जाने कहाँ कहाँ मन रमता 

:3:

उचटे मन की दवा न कोई

उजडी उजडी दुनिया लगती

खुशियाँ जैसे हुई पराई

आँखों मे बस पीड़ा  बसती

:4:

एक दिखावा सा लगता है

हाल पूछना -"जी कैसे हो?

बिना सुने उत्तर चल देना

अर्थहीन लगता जैसे हो ।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

क्षणिकाएँ 08

 क्षणिका 08

सच जब उठ कर ---

 सत्य ढूँढना, माना मुश्किल
झूठ फूस की ढेरी में
धुआँ धुआँ फैला देते हो
सच है तो फिर सच उठ्ठेगा
भले उठे वह देरी से ।

  झूठ मूठ के पायों पर
खड़ा तुम्हारा सिंहासन
आज नहीं तो कल डोलेगा
सच  उठ कर जब सच बोलेगा ।

-आनन्द पाठक-

सोमवार, 1 अप्रैल 2024

क्षणिकाएँ 07

 क्षणिकाएँ 07

जब बचपन मे
रंग बिरंगी शोख तितलियाँ
बैठा करती थी फूलों पर
भागा करता था मै
पीछे पीछे 
जब भी उनको छूना चाहा
उड़ जाती थीं इतरा कर
इठला कर, मुझे थका कर ।

समय कहाँ रुकता जीवन मेंव 

ही तितलियाँ बैठ गईं अब

अपने अपने फूलों पर

पास से गुज़रूँ, पूछे हँस कर

"अब घुटनों का दर्द तुम्हारा, कैसा कविवर" ?

क्षणिकाएँ 06

 क्षणिकाएं 06


सूरज निकले उससे पहले

या डूबे तो बाद में उसके

रोज़ हज़ारों क़दम निकलते

कुआँ खोदते पानी पीते

तिल तिल कर हैं मरते ,जीते

सबकी अपनी अलग व्यथा है

महानगर की यही कथा है ।

-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 25 मार्च 2024

गीत 85 : प्यास ही मर गई जब भरी उम्र में--

गीत : प्यास ही मर गई जब


प्यास ही मर गई जब भरी उम्र में

अब ये बादल भी बरसे न बरसे तो क्या !


उम्र भर है चला जो कड़ी धूप में

जिंदगी भर सफर का रहा सिलसिला

जिसको मंज़िल मिली ही नहीं आजतक

ख़ुद से करता भला वह कहाँ तक गिला


प्यार की छाँव जिसको मिली ही नहीं

बाद साया किसी का मिले भी तो क्या !


ज़िंदगी के सवालात थे सैकड़ों

जितना सुलझाया, उतनी उलझती गई

चन्द ख़ुशियाँ रहीं तितलियों की तरह 

और पीड़ा,  मेरे घर  ठहरती  गई  ।


दर्द की जब नदी में उतर ही गया

पार कश्ती लगे ना लगे भी तो क्या !


राह सबकी अलग सबकी मंज़िल अलग

कोई बैसाखियों से चला उम्र भर ।

पालकी भी किसी को न रास आ सकी

राह काँटों भरी , मैं चला उम्र भर ।


पाँव के आबलों में कहानी मेरी

लोग चाहे पढ़ें ना पढ़ें भी तो क्या !


    जो सफर मे रहा है गिरेगा वही

   घर मे बैठा जो होता वो गिरता कहाँ

    फूल खिलते वहीं दीप जलते वहीं

     खून बन कर पसीना है गिरता जहाँ


वाह की, दाद की क्या जरूरत उसे

मिल गया, मिल गया ना मिला भी तो क्या

-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 360/35 : लोग सुनेंगे हँस कर अपनी राह

 ग़ज़ल 360/35 : लोग सुनेंगे हँस कर अपनी--

21--121--121---121---121--122  =24

सोए जो दिन रात, जगाने से क्या होगा
बहरों को आवाज़ लगाने से क्या होगा

लोग सुनेंगे हँस कर अपनी राह लगेंगे
महफ़िल महफ़िल दर्द सुनाने से क्या होगा  !

आज नहीं तो कल सच का सूरज निकलेगा
झूठ अनर्गल बात बनाने से क्या होगा  !

जब दामन के दाग़ बज़ाहिर दिखते हो 
फिर दुनिया से दाग़ छुपाने से क्या होगा !

सत्ता की साज़िश में थे जब तुम भी शामिल
तुमसे फिर उम्मीद लगाने से क्या होगा !

ऊँची ऊँची आदर्शों की बातें करना-
सिर्फ़ हवा में गाल बजाने से क्या होगा !

प्रश्न तुम्हारा ’आनन’ नाक़िस बेमानी है
तुम क्या जानो दीप जलाने से क्या होगा !


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 22 मार्च 2024

ग़ज़ल 359/34 : उसे ख़बर ही नहीं है--

 ग़ज़ल 359/34 : उसे ख़बर ही नहीं है --


1212---1122---1212---112/22


उसे ख़बर ही नहीं है, उसे पता भी नहीं

हमारे दिल में सिवा उसके दूसरा भी नहीं


न जाने कौन सा था रंग जो मिटा भी नहीं

मज़ीद रंग कोई दूसरा चढ़ा भी नहीं  ।


जो एक बार तुम्हें ख़्वाब में कभी देखा ,

ख़ुमार आज तलक है तो फिर बुरा भी नहीं।


भटक रहा है अभी तक ये दिल कहाँ से कहाँ

सही तरह से किसी का अभी हुआ भी नहीं ।


किताब-ए-इश्क़ की तमहीद ही पढ़ी उसने

"ये इश्क़ क्या है"  कभी ठीक से पढ़ा भी नहीं


ख़ला से, ग़ैब से आती है फिर सदा किसकी

वो कौन हैं? वो कहाँ है?  कभी दिखा भी नहीं ।


तमाम लोग थे " आनन"  को रोकते ही रहे

सफ़र तमाम हुआ और वह रुका भी नहीं ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 

तमहीद = किसी किताब की प्रस्तावना , भूमिका, प्राक्कथन

सोमवार, 18 मार्च 2024

अनुभूतियाँ 133/20 : होली पर

अनुभूतियाँ 133/20: होली पर
1
रंग गुलालों का मौसम है
महकी हुई फिज़ाएँ भी हैं
कलियाँ कलियाँ झूम रही हैं
बहकी हुई हवाएँ भी हैं

2
रंगोली में रंग भरे हैं
चाहत के, कुछ स्नेह प्यार के
आ जाते तुम एक बार जो
आ जाते फिर दिन बहार के

"राधा" लुकती छुपती भागें
'कान्हा' ढूँढे भर पिचकारी
ग्वाल बाल की टोली आती
देख गोपियाँ देवै गारी ।


4
होली का संदेश हमारा
"प्रेम मुहब्बत भाईचारा"
गले लगा कर रंग लगाना
पर्व है अपना अनुपम न्यारा

-आनन्द पाठक-

रविवार, 17 मार्च 2024

चन्द माहिए 102 /12 होली पर

 चन्द माहिए 102/12 [होली पर]


;1: 

रंगो के दिन आए

कलियाँ शरमाईं
भौरें जब मुस्काए

:2:

आई होली आई

आज अवध में भी

खेलें चारो भाई

:3:

हर दिल पर छाई है

होली की मस्ती

गोरी घबराई है

:4:

"कान्हा मत छेड़ मुझे"

राधा बोल रही

"हट दूर परे, पगले !"


:5:

होली के बहाने से

बाज न आएगा

तू रंग लगाने से ।


-आनन्द पाठक-


चन्द माहिए : क़िस्त 101 /11 होली पर

 



चन्द माहिए 101/11 : होली पर


:1:

होली में सनम मेरे 

थाम मुझे लेना

बहके जो कदम मेरे


:2:

घर घर में मने होली

हम भी खेलेंगे

आ मेरे हमजोली 

:3;

क्यों रंग लगाता है

दिल तो अपना है

क्यों दिल न मिलाता है?

:4:

क्यों प्रीत करे तन से

रंग लगा ऐसा

उतरे न कभी मन से ।

:5:

पूछे है अमराई

फागुन तो आया

गोरी क्यूँ नहीं आई ?


-आनन्द पाठक-



ग़ज़ल 358/33 : चलो होली मनाएँ---

 



ग़ज़ल 358/33


1222---1222---1222---1222


चलो होली मनाएँ आ गया फिर प्यार का मौसम

गुलाबी हो रहा है मन, तेरे पायल की सुन छम छम


लगीं हैं डालियाँ झुकने, महकने लग गईं कलियाँ

हवाएँ भी सुनाने लग गईं अब प्यार का सरगम ।


समय यह बीत ना जाए, हुई मुद्दत तुम्हें रूठे

अरी ! अब मन भी जाओ, चली आओ मेरी जानम।


भरी पिचकारियाँ ले कर चली कान्हा की है टोली

इधर हैं ढूँढते ’कान्हा’,उधर राधा हुई बेदम ।


चुनरिया भींग जाए तो बदन में आग लग जाए

लुटा दे प्यार होली में, रहे ना दिल में रंज-ओ-ग़म । 


ये मौसम है रँगोली का, अबीरों का, गुलालों का

बुला कर रंजिशें सारी, गले लग जा मेरे हमदम ।


इसी दिल में है ’बरसाना’, ’कन्हैया’ भी हैं”राधा’ भी

तू अन्दर देख तो ’आनन’ दिखेगा वह युगल अनुपम ।


-आनन्द.पाठक-



शुक्रवार, 15 मार्च 2024

ग़ज़ल 357/32 : चिराग़-ए-इश्क़ मेरा

 

ग़ज़ल 357/32

1212---1122---1212---22-


चिराग़-ए-इश्क़ मेरा यूँ बुझा नहीं होता

नज़र से आप की जो मैं गिरा नहीं होता


क़लम न आप की बिकती, नहीं ये सर झुकता

जमीर आप का जो गर बिका नहीं  होता


शरीफ़ लोग भी तुझको कहाँ नज़र आते

अना की क़ैद में जो तू रहा नहीं  होता ।


वहाँ के हूर की बातें मैं  क्या सुनूँ ,ज़ाहिद

यहाँ की हूर में भी, हुस्न क्या नही होता ?


सफ़र तवील था, कटता भला कहाँ मुझसे

सफ़र की राह में जो मैकदा नहीं होता ।


मेरे गुनाह मुझे कब कहाँ से याद आते

जो आस्तान तुम्हारा दिखा नहीं होता ।


तुम्हारे बज़्म तक ’आनन’ पहुँच गया होता

ख़याल-ए-ख़ाम में जो दिल फँसा नहीं होता


-आनन्द.पाठक- 

मंगलवार, 12 मार्च 2024

ग़ज़ल 356/31 मिलता है बड़े शौक़ से --

 ग़ज़ल 356/31

221---1221---1221---122


मिलता है बड़े शौक़ से वह हाथ बढ़ा कर

रखता है मगर दिल में वो ख़ंज़र भी छुपा कर


तहज़ीब की अब बात सियासत में कहाँ हैं

लूटा किया है रोज़ नए ख़्वाब दिखा कर


यह शौक़ है या ख़ौफ़ कि आदात है उसकी

मिलता है हमेशा वह मुखौटा ही चढ़ा कर


करने को करे बात वो ऊँची ही हमेशा

जब बात अमल की हो, करे बात घुमा कर


जिस बात का हो सर न कोई पैर हो प्यारे

उस बात को बेकार न हर बार खड़ा कर


यह कौन सा इन्साफ़, कहाँ की है शराफ़त

कलियों को मसलते हो ज़बर ज़ोर दिखा कर


’आनन’ तू करे और पे क्यों इतना भरोसा

धोखा ही मिला जब है तुझे दिल को लगा कर।


-आनन्द.पाठक-



शुक्रवार, 8 मार्च 2024

अनुभूतियाँ 132/19 : चुनावी अनुभूतियाँ


चुनावी अनुभूतियाँ  132/19


:1:

कल बस्ती में धुँआ उठा था

दो मज़हब टकराए होंगे ।

अफ़वाहों की हवा गर्म थी

लोग सड़क पर आए होंगे ।


;2:

जहाँ चुनावी मौसम आया

हवा साज़िशें करने लगती

झूठे नार वादों पर ही

जनता जय जय करने लगती 


;3:

जिस दल की औक़ात नही है

ऊँची ऊँची हाँक रहा है ।

अपना दर तो खुला छोड़ कर

दूजे दल में झाँक रहा है ।

:4:

झूठों की क्या बात करे हम

झूठ बोलने की हद कर दी

दो बोलें या दस बोलें वो

चाहे बोलें सत्तर अस्सी

गीत 84: फिर चुनाव का मौसम आया

 



चुनावी गीत


रंग बदलते नेताओं को ,देख देख गिरगिट शरमाया।

फिर चुनाव का मौसम आया ।


पलटी मारी, उधर गया था, पलटी मारी इधर आ गया

’कुर्सी’ ही बस परम सत्य है, जग मिथ्या है' समझ आ गया'


देख गुलाटी कला ’आप’ की, मन ही मन बंदर मुस्काया।

फिर चुनाव का मौसम आया ।


वही तमाशा दल बदली का, दल बदले पर दिल ना बदला

बाँट रहे हैं मुफ़्त ’रेवड़ी’, सोच मगर है गँदला ,गँदला ।


वही  घोषणा पत्र पुराना, पढ़ पढ़ जनता को भरमाया ।

फिर चुनाव का मौसम आया ।


आजीवन बस खड़ा रहेगा, अन्तिम छोर खड़ा है ’बुधना’

हर दल वाले बोल गए हैं, - "तेरा भी घर होगा अपना "

जूठे नारों वादों से कब किसका पेट भला भर पाया।

फिर चुनाव का मौसम आया ।


-आनन्द.पाठक-


बुधवार, 6 मार्च 2024

क्षणिका 05

 चन्दन वन से


जब बबूल बन से गुज़रोगे
क्या पाओगे ?
राहों में  काँटे ही काँटे
दूर दूर तक  बस सन्नाटे ।

चन्दन बन से जब गुज़रोगे 
एक सुगन्ध 
भर जाएगी साँसों में
 सावधान भी रहना होगा
शाखों से लिपटे साँपों से ।

-आनन्द.पाठक-



क्षणिका 04

 ख़्वाब देखना--


ख़्वाब देखना ,बुरा नहीं है ।
हक़ है तुम्हारा।
यह किसी की दुआ नहीं है।
सिर्फ़ देखना रोज़ देखना
और देखते ही बस रहना, कुछ न करना
फिर सो जाना, फिर खो जाना
ठीक नहीं है ।
 उठो , जगो, पुरुषार्थ जगाओ
पुरुषार्थ तुम्हारा भीख नही है ।


-आनन्द.पाठक-



मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 355/30 : दिल का बयान करते

 


ग़ज़ल 355/30


221---2122  // 221-2122


दिल का बयान करते ये आइने ग़ज़ल के

माजी के है मुशाहिद, नाज़िर हैं आजकल के


एहसास-ए-ज़िंदगी हूँ, जज़्बा भी हूँ, ग़ज़ल हूँ

हर दौर में हूँ निखरी, अहल-ए-ज़ुबाँ में ढल के


अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू है नाज़-ओ-नियाज़ भी है

तहज़ीब ,सादगी भी आदाब हैं ग़ज़ल के 


आती समझ में उसको कब रोशनी की बातें

वो तीरगी से बाहर आता नही निकल के ।


सीने की आग से जो ये खूँ उबल रहा है 

इन बाजुओं से रख दे दुनिया का रुख़ बदल के


हर बार ख़ुद ही जल कर देती सबूत शम्मा’

उलफ़त के ये नताइज़ कहती पिघल पिघल के


जंग-ओ-जदल से कुछ भी हासिल न होगा’आनन’ 

पैग़ाम-ए-इश्क़ सबको मिलकर सुनाएँ चल के ।


-आनन्द.पाठक-


नताइज़ = नतीज़े

मुशाहिद,नाज़िर = प्रेक्षक, observer,गवाह

जंग ओ जदल = लड़ाई झगड़ा युद्ध

सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

चन्द माहिए : क़िस्त100/10

  चन्द माहिए : क़िस्त  100/10


:1:

क्या और सुनानी  है  

तेरी कहानी में 

मेरी भी कहानी है


:2:

जीवन का सफ़र बाक़ी

हाथ पकड़ चलना

मेरे जीवन साथी !

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

ग़ज़ल 354/29 : तुम से मैने कभी कुछ कहा ही नहीं --

 


ग़ज़ल 354/29

212---212---212---212--// 212--212--212--212


मैने तुम से कभी कुछ कहा ही नहीं , बेनियाज़ी का ये सिलसिला किसलिए ?

तुमने जो भी कहा मैने माना सभी , फिर भी रहती हो मुझसे ख़फ़ा किसलिए ?


उम्र भर मै तुम्हारा रहा मुन्तज़िर, राह देखा किए आख़िरी साँस तक ,

आजमाना ही था जब मुझे ऎ सनम !बारहा फिर इशारा किया किसलिए।


जानता हूँ न आना, न आओगी तुमसौ बहानों से वाक़िफ़ रहा मेरा दिल

क्या करें दिल है नादान समझा नहींउम्र भर राह देखा किया किसलिए ।


जानता हूँ तुम्हारी मैं मजबूरियाँचाह कर भी न तुम कुछ भी कह पाओगी

इस जमाने का यह कौन सा है करमहाथ में ले के पत्थर खड़ा किसलिए ।


क्या छुपा है जो तुमसे छुपाऊँगा मैं और क्या है जो तुमको न मालूम हो

इक भरम का था परदा रहा उम्र भर, सच उसे मानता मैं रहा किसलिए ?


ज़िंदगी का सफ़र इतना आसाँ नहीं , हर क़दम दर क़दम पर मिले पेच-ओ-ख़म

जो मिला है उसे ही नियति मान लें, जो न हासिल उसे सोचना किसलिए !


तुम रफ़ीक़ों की बातों में फिर आ गई,कान भरना था उनको , भरे चल दिए

तुमने मेरी सफ़ाई सुनी ही कहाँ , बिन सुने ही दिया फिर सज़ा  किसलिए ?


उसकी मुट्ठी खुली तो दिखी, खाक थी, कहते थकता नहीं था कि है लाख की

क्या हक़ीक़त थी सबको तो मालूम था,वह मुख़ौटे चढ़ाए रहा किसलिए ?


तुम भी ’आनन’ कहाँ किस ज़माने के हो,कौन मिलता यहाँ बेसबब बेग़रज़

जिसको समझा किया उम्र भर मोतबर, फेर कर मुंह वही चल दिया किसलिए ?


-आनन्द.पाठक-

मुन्तज़िर = प्रतीक्षक

बारहा = बार बार

मोतबर = विश्वसनीय

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

गीत 83 : शरण में राम की आना [ भाग 2]

 

गीत 83 : शरण में राम की आना---[भाग 2

कटॆ जब आस की डोरी, बिखर जाएँ सभी सपने
जीवन में हो कुछ पाना, शरण में राम की आना ।

जहाँ आदर्श की बातें, 
सनातन धर्म का प्रवचन
तुम्हारे सामने होगा-
प्रभु श्री राम का जीवन

स्वयं में राम को ढूँढो, विजय श्री प्राप्त होने तक
झलक श्री राम की पाना, शरण में राम की आना ।

वचन कैसे निभाते हैं,
कि क्या होती है मर्यादा
राजसी ठाठ को तज कर 
जिया जीवन सदा सादा ।

अगर कुछ सीखना तुमको कि जीने का तरीका क्या
स्वयं में राम दुहराना ,शरण में राम की आना ।

परीक्षा माँ सिया ने दी
प्रतीक्षा उर्मिला ने की
भरत ने राज आसन पर
प्रभू की पादुका रख दी ।

तपस्या त्याग क्या होती ,भरत सा आचरण करना।
समझ आए. समझ जाना, शरण में राम की आना

-आनन्द.पाठक-

गीत 82 : सरस्वती वंदना [2024]

 



सरस्वती वंदना


जयति जयति माँ वीणापाणी ,

मन झंकृत कर दे, माँ भारती वर दे !


तेरे द्वारे खड़ा अकिंचन. भक्ति भाव से है पुष्पित मन,

सुर ना जानू, राग न जानू और न जानू पूजन अर्चन !


कल्मष मन में घना अँधेरा. ज्योतिर्मय कर दे,

माँ भारती वर दे !


छन्द छन्द माँ तुझे समर्पित, राग ताल से हो अभिसिंचित

जब भी तेरे गीत सुनाऊँ , शब्द शब्द हो जाएँ हर्षित ।


अटक न जाए कहीं रागिनी, स्वर प्रवाह भर दे ।

माँ भारती वर दे !


’सत्यम शिवम सुन्दरम ’-लेखन,बन जाए जन-मन का दरपन

गूँगों की आवाज़ बने माँ, क़लम हमारी करे नव-सॄजन  ।


शक्ति स्वरूपा बने लेखनी, शक्ति पुंज भर दे ।

माँ भारती वर दे !


मैं अनपढ़ माँ, अग्यानी मन, हाथ जोड़ कर, करता आवाहन,

गीत ग़ज़ल के अक्षर अक्षर तेरे हैं माँ तुझको अर्पन !


चरण कमल में शीश झुकाऊँ, भक्ति प्रखर कर दे।

माँ भारती वर दे ! 


-आनन्द.पाठक-




सोमवार, 15 जनवरी 2024

ग़ज़ल 353[28] : ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ और है--



ग़ज़ल 353 [28]

2122---2122---212


ज़िंदगी का फ़लसफ़ा कुछ और है

आदमी का सोचना कुछ  और है ।


बात वाइज़ की सही अपनी जगह

दर हक़ीकत सामना कुछ और है ।


तुम भले ही जो कहो, हँस कर कहो

जर्द चेहरा कह रहा कुछ  और है।


क्यों तुम्हे दिखता नहीं चेहरे का सच

क्या तुम्हारा आइना कुछ और है ?


दिल कहे जब भी कहे तो सच कहे

लग रहा तुमने सुना कुछ और है ।


वस्ल के पहले ख़याल-ए-वस्ल हो

फिर तड़पने का मज़ा कुछ और है।


प्रेम का मतलब नहीं 'आनन' हवस

प्रेम का तो रास्ता कुछ और है ।


-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 13 जनवरी 2024

ग़ज़ल 352 [27] : नहीं वो बात रही--

 


ग़ज़ल 352

1212---1122---1212---22


नहीं वो बात रही, क्या करूँ गिला कोई,

तेरे ख़याल में अब और आ गया  कोई ।


मिले जो आज तलक सबकी थी गरज अपनी

गले लगा ले जो मुझको,नहीं मिला कोई ।


दयार आप का हो या दयार-ए-यार कहीं ,

निगाह-ए-पाक ने कब फर्क है किया कोई !


करम हो आप का जिस पर वो ख़ुश रहा, वरना

अजाब-ए-सख़्त के कब तक यहाँ बचा कोई ।


ज़ुबान बेच दी जिसने खनकते सिक्कों पर

गिरा जो ख़ुद की नज़र से न उठ सका कोई ।


कहाँ कहाँ से न गुज़रे तलाश-ए-हक़ में, हम

सही मुक़ाम न अबतक कहीं मिला कोई ।


सफ़र हयात का अब ख़त्म हो रहा ’आनन’

क्षितिज के पार से मुझको बुला रहा कोई ।


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 10 जनवरी 2024

गीत 81 : शरण में राम की आना [ भाग-1]


1222---1222---1222---1222

प्राण प्रतिष्ठा [ 22 जनवरी ] के पावन अवसर पर--श्री राम लला के पावन चरणों मे 

मेरी लेखनी की  एक अकिंचन भेंट ------


एक गीत


उदासी मन  पे जब छाए , अँधेरा फैलता जाए ,

तनिक भी तुम न घबराना. शरण में राम की आना।


करें जब राम का सुमिरन

कटे बंधन सभी ,प्यारे !

हृदय में ज्योति जग जाए

लगें सब लोग तब न्यारे ।


अकेला मन भटक जाए, समझ में कुछ नही आए,

सही जब राह हो पाना, शरण में राम की  आना ।


राम के नाम की महिमा,

सदा नल-नील ने जानी ,

कि तरने लग गए पत्थर

झुका सागर भी अभिमानी


अहम जब सर पे चढ़ जाए, सभी बौने नज़र आएँ

पड़े तुमको न पछताना, शरण में राम की आना ।


जगत इक जाल माया का,

फँसा रहता तू जीवन भर

कभी तो सोच ऎ प्राणी !

है करना पार भव सागर ।


जगत जब तुमको भरमाए, कि माया तुमको ललचाए

धरम को भूल मत जाना, शरण में राम की  आना ।


-आनन्द.पाठक-