गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 202 : बात यूँ ही निकल गई होगी--

 ग़ज़ल 202
2122--1212--22

बात यूँ ही निकल गई होगी
रुख की रंगत बदल गई होगी

वक़्त-ए-रुख़सत जो उसने देखा तो
हर तमन्ना निकल गई होगी

वक़्त क्या क्या नहीं सिखा देता
टूटे दिल से बहल गई होगी

दौर-ए-हाज़िर की रोशनी ऐसी
रोशनी से वह जल गई होगी

सर्द रिश्ते गले लगा लेना
बर्फ़ अबतक पिघल गई होगी

एक दूजे के मुन्तज़िर दोनों
उम्र उसकी भी ढल गई होगी

ज़िक्र ’आनन’ का आ गया होगा
चौंक कर फिर सँभल गई होगी

-आनन्द.पाठक-
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सोमवार, 20 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 201 : मुहब्बत की उसने सज़ा जो सुनाई

 ग़ज़ल 201
122---122--122---122

मुहब्बत की उसने सज़ा जो सुनाई
न क़ैद-ए-कफ़स ही, न होगी रिहाई

भरोसा नहीं जब मेरी बात का तो
कहाँ तक तुम्हें दूँ मैं अपनी सफ़ाई

ये मासूम दिल था, समझ कुछ न पाया
इशारों में जो बात तुम ने बताई

नज़र को मेरी वैसी ताक़त भी देते
अगर तुम को करनी थी जल्वानुमाई

कहीं ज़िक्र आया न मेरा अभी तक
कहानी अधूरी है तुमने सुनाई

हज़ारों शिकायत तुम्हे ज़िन्दगी से
कभी ज़िन्दगी से की क्या आशनाई ?

सुना है कि शामिल वो हर शय में ’आनन’
वो ख़ुशबू है, ख़ूशबू  न देती दिखाई

-आनन्द.पाठक-
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शनिवार, 18 दिसंबर 2021

ग़ज़ल 200 : बदल गईं जब तेरी निगाहें---

                  ग़ज़ल 200
121-22/ 121-22 /121-22/ 121-22

बदल गईं जब तेरी निगाहें , ग़ज़ल का उन्वां बदल गया है
जहाँ भी हर्फ़-ए-करम लिखा था, वहीं पे हर्फ़-ए-सितम लिखा है 

अजब मुहब्बत का यह चलन है जो डूबता है वो पार पाता
फ़ना हुए हैं ,फ़ना भी होंगे, ये सिलसिला भी कहाँ रुका है 

पता तो उसका सभी है जाने, तलाश में हैं सभी उसी के
कभी तो दैर-ओ-हरम में ढूँढू , कभी ये लगता कि लापता है

न कुछ भी सुनना, न कुछ सुनाना, न कोई शिकवा,गिला,शिकायत
ये बेख़ुदी है कि बेरुख़ी है, तुम्हीं बता दो सनम ये क्या है ?

पयाम मेरा, सलाम उनको, न जाने क्यों नागवार गुज़रा
जवाब उनका न कोई आया, मेरी मुहब्बत की यह सज़ा है
 
तमाम कोशिश रही किसी की, कि बेच दूँ मैं ज़मीर अपना
मगर ख़ुदा की रही इनायत, ज़मीर अबतक बचा रखा है
 
जिसे तुम अपना समझ रहे थे, हुआ तुम्हारा कहाँ वो ’आनन’
उसे नया हमसफ़र मिला है. तुम्हें वो दिल में कहाँ रखा है 

-आनन्द.पाठक-
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मंगलवार, 30 नवंबर 2021

गीत 072 : मौसम है मौसम बदलेगा

एक  गीत : -- मौसम है, मौसम बदलेगा


सुख का मौसम, दुख का मौसम, आँधी-पानी का हो मौसम
मौसम का आना-जाना है , मौसम है मौसम बदलेगा ।

अगर कभी हो फ़ुरसत में तो, उसकी आँखों में पढ़ लेना
जिसकी आँखों में सपने थे  जिसे ज़माने ने लू्टे  हों ,
आँसू जिसके सूख गए हो, आँखें जिसकी सूनी सूनी
और किसी से क्या कहता वह, विधिना ही जिसके रूठें हो।

दर्द अगर हो दिल में गहरा, आहों में पुरज़ोर असर हो
 चाहे जितना पत्थर दिल हो, आज नहीं तो कल पिघलेगा ।

दुनिया क्या है ? जादूघर है, रोज़ तमाशा होता रहता
देख रहे हैं जो कुछ हम तुम, जागी आँखों के सपने हैं 
रिश्ते सभी छलावा भर हैं, जबतक मतलब साथ रहेंगे
जिसको अपना समझ रहे हो, वो सब कब होते अपने हैं॥

जीवन की आपाधापी में, दौड़ दौड़ कर जो भी जोड़ा 
चाहे जितना मुठ्ठी कस लो, जो भी कमाया सब फिसलेगा ।

जैसा सोचा वैसा जीवन, कब मिलता है, कब होता है,
जीवन है तो लगा रहेगा, हँसना, रोना, खोना, पाना।
काल चक्र चलता रहता है. रुकता नहीं कभी यह पल भर
ठोकर खाना, उठ कर चलना, हिम्मत खो कर बैठ न जाना ।

आशा की हो एक किरन भी और अगर हो हिम्मत दिल में
चाहे जितना घना अँधेरा, एक नया सूरज निकलेगा ।

विश्वबन्धु, सोने की चिड़िया, विश्वगुरु सब बातें अच्छी,
रामराज्य की एक कल्पना, जन-गण-मन को हुलसा देती ,
अपना वतन चमन है अपना, हरा भरा है खुशियों वाला
लेकिन नफ़रत की चिंगारी बस्ती बस्ती झुलसा देती ।

जीवन है इक सख्त हक़ीक़त देश अगर है तो हम सब हैं
झूठे सपनों की दुनिया से कबतक अपना दिल बहलेगा ।



-आनन्द पाठक-



सोमवार, 1 नवंबर 2021

गीत 71: आज दीपावली ज्योति का पर्व है--

 एक गीत : दीपावली पर


आज दीपावली, ज्योति का पर्व है
दीप की मालिका हम सजाते चलें ।

आज मिल कर सजाएँ नई अल्पना
झूमने नाचने का करें सिलसिला
पर्व ख़ुशियों का है और उल्लास का
भूल जाएँ कोई हो जो शिकवा,गिला ।

मन बँटा हो भले, रोशनी कब बँटी !
प्यार का दीप दिल में जलाते चलें ।

धर्म के नाम पर व्यर्थ उन्माद में
चेतना मर गई, भावना मर गई
मन के अन्दर की सब खिड़कियाँ बन्द है
उनके कमरे में कितनी घुटन भर गई ।

सोच नफ़रत भरी है, जहर भर गया
इन अँधेरों को पहले मिटाते चलें ।

झोंपड़ी का अँधेरा करें दूर हम
झुग्गियों बस्तियों में जला कर दिए
एक दिन चाँदनी भी उतर आएगी
आदमी जो जिए दूसरों के लिए ।

अब अँधेरों में कोई न भटके कहीं
सत्य की राह क्या है ? दिखाते चलें

आज दुनिया खड़ी ले के परमाणु बम्ब
ख़ौफ़ फैला फ़िज़ां में जिधर देखिए
लोग हाथों में पत्थर लिए हैं खड़े
कब तलक बच रहे अपना सर देखिए

विश्व में हो अमन, चैन हो, प्रेम हो
बुद्ध के सीख- संदेश गाते चलें ।
आज दीपावली,ज्योति का पर्व है। दीप की मालिका हम सजाते चलें। 
-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

ग़ज़ल 199 : कहीं तुम मेरा आइना तो नहीं हो ?

 ग़ज़ल 199
122---122---122---122

कहीं तुम मेरा आइना तो नहीं हो ?
मेरे हक़ की हर्फ़-ए-दुआ तो नहीं हो ?

ये माना तुम्हारे मुक़ाबिल न कोई
मगर इसका मतलब ख़ुदा तो नहीं हो 

ये लम्बी ख़मोशी डराती है मुझको
कहीं बेसबब तुम ख़फ़ा तो नहीं हो

हवाओं में ख़ुशबू अभी तक तुम्हारी
कहीं तुम ख़ुद अपना पता तो नहीं हो ?

ख़ला से मेरी लौट आती सदाएँ
कहीं तुम मेरे हमनवा तो नहीं हो ?

बहुत लोग आए तुम्हारे ही जैसे
फ़ना हो गए, तुम जुदा तो नहीं हो

किसी दिन तुम्हें ढूँढ लूँगा मैं ’आनन’
मेरे दिल मे हो, लापता तो नहीं हो

-आनन्द.पाठक-
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गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 013

 
 अनुभूतियाँ : क़िस्त 013 ओके
 
49
रात रात भर जग कर चन्दा
ढूँढ रहा है किसे गगन में ?
थक कर बेबस सो जाता है
दर्द दबा कर अपने मन में |
 
50
बीती रातों की सब बातें
मुझको कब सोने देती हैं ?
क़स्में तेरी सर पर मेरे
मुझको कब रोने देती हैं ?
 
51
कौन सुनेगा दर्द हमारा
वो तो गई, जिसे सुनना था,
आने वाले कल की ख़ातिर
प्रेम के रंग से मन रँगना था।
 
52
सपनों के ताने-बानों से
बुनी चदरिया रही अधूरी
तार-तार कर दिया समय ने
अब तो बस जीना मजबूरी   
 
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
 880092 7181



 

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

ग़ज़ल 198 : तेरे इश्क़ में इब्तिदा से हूँ राहिल

 122---122---122----122

ग़ज़ल 198

तेरे इश्क़ में इब्तिदा से हूँ राहिल

न तू बेख़बर है, न मैं हीं हूँ ग़ाफ़िल


ये उल्फ़त की राहें न होती हैं आसाँ

अभी और आएँगे मुश्किल मराहिल


मुहब्ब्त के दर्या में कागज की कश्ती

ये दर्या वो दर्या है जिसका न साहिल


जो पूछा कि होतीं क्या उलफ़त की रस्में

दिया रख गई वो हवा के मुक़ाबिल


इबादत में मेरे कहीं कुछ कमी थी

वगरना वो क्या थे कि होते न हासिल


अलग बात है वो न आए उतर कर

दुआओं में मेरे रहे वो भी शामिल


कभी दिल की बातें भी ’आनन’ सुना कर

यही तेरा रहबर, यही तेरा आदिल ।


-आनन्द. पाठक-


राहिल = यात्री

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शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

कविता 011: अक्टूबर -गाँधी जयन्ती


कविता 011 

----2-अक्टूबर- गाँधी जयन्ती----

 

अँधियारों में सूरज एक खिलानेवाला

जन गण के तन-मन में ज्योति जगानेवाला

गाँधी वह जो क्षमा दया करूणा की मूरत

फूलों से चटटानों को चटकाने वाला

 

क़लम कहाँ तक लिख पाए गाँधी की बातें

इधर अकेला दीप, उधर थी काली रातें

तोड़ दिया जंजीरों को जो यष्टि देह से

बाँध लिया था मुठ्ठी में जो झंझावातें

 

आज़ादी की अलख जगाते थे, गाँधी जी

’वैष्णव जण” की पीर सुनाते थे, गाँधी जी

सत्य अहिंसा सत्याग्रह से, अनुशासन से

सदाचार से विश्व झुकाते थे, गाँधी जी

 

गाँधी केवल नाम नहीं है, इक दर्शन है

लाठी, धोती, चरखा जिनका आकर्षन है

सत्य-अहिंसा के पथ पर जो चले निरन्तर

गाँधी जी को मेरा सौ-सौ बार नमन है

-आनन्द.पाठक-

इसी गीत को सुनें मेरी आवाज़ में---










मंगलवार, 28 सितंबर 2021

ग़ज़ल 197 : वह अँधेरों में इक रोशनी है

 212---212--212--2
फ़ाइलुन-फ़ाइलुन-फ़ाइलुन-फ़अ’
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन महजूज़
ग़ज़ल 197

वह अँधेरे में इक रोशनी है
एक उम्मीद है, ज़िन्दगी है

एक दरिया है और एक मैं हूँ
उम्र भर की मेरी तिश्नगी है

नाप सकते हैं हम आसमाँ भी
हौसलों में कहाँ कुछ कमी है

ज़िक्र मेरा न हो आशिक़ी में
यह कहानी किसी और की है

लौट कर फिर वहीं आ गए हो
राहबर ! क्या यही रहबरी है ?

सर झुका कर ज़ुबाँ बन्द रखना
यह शराफ़त नहीं बेबसी है

आजकल क्या हुआ तुझ को ’आनन’
अब ज़ुबाँ ना तेरी आतशी है ।

-आनन्द.पाठक- 
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शनिवार, 25 सितंबर 2021

ग़ज़ल 196 : किसी से वफ़ाई ,किसी से ख़फ़ा हूँ

  ग़ज़ल 196

122----122-----122------122


किसी से वफाई किसी से ख़फ़ा हूँ
किया जो नहीं जुर्म उसकी सज़ा हूँ

किसी के लिए एक बदनाम शायर
किसी के लिए एक दस्त-ए-दुआ हूँ

कहीं भी रहो ढूँढ लेंगी निगाहें,
भले तुम छुपे, मैं न तुमसे छुपा हूँ

ज़रा आसमाँ से उतर कर तो देखो
तुम्हारे लिए क्या से क्या हो गया हूँ

भरी बज़्म में ज़िक्र तेरा न आया
वो महफ़िल वहीं छोड़ कर आ गया हूँ

मुझे क्या है लेना कलीसा हरम से
मुहब्बत में तेरी हुआ मुबतिला हूँ

अगर तुम ज़ुबाँ से सुनाना न चाहो
निगाहों से अपनी तुम्हें पढ़ रहा हूँ

पयाम-ए-ग़ज़ल सुन सकोगे तो सुनोगे
" मैं हर दौर का इक सफ़ी आइना हूँ 

न आलिम न मुल्ला न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्बत अदब आशना हूँ ।


-आनन्द.पाठक-

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ग़ज़ल 195 : जो शख़्स पढ़ रहा था ख़ुशगवार आँकड़े--

 2212---1212---1212--12
ग़ज़ल 195

जो शख़्स पढ़ रहा था ख़ुशगवार आँकड़े
वह शख़्स मर गया कतार में खड़े खड़े

पूछा किसी ने हाल मेरी ज़िंदगी का जब
दो बूँद आँसुओं के बारहा निकल पड़े

गुमनामियों में खो गए किसी को क्या ख़बर
तारीकियॊं से जो तमाम उम्र थे लड़े

कालीन-सा वो बिछ गए बस एक ’फोन’ पर
जिनसे उमीद थी कि लेंगे फ़ैसले कड़े

पुतले थे बीस फ़ुट के शह्र में लगे हुए
बौनी थी जिनकी शख़्सियत, थे नाम के बड़े

रहबर तुम्हारी रहबरी में शक तो कुछ नहीं
जाने को था किधर कि तुम किधर को चल पड़े

’आनन’ तुम्हारी बात में न वो तपिश रही
दरबारियों के साथ जब से तुम हुए खड़े

-आनन्द.पाठक-
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ग़ज़ल 194 : ख़ामोश रहोगे तुम--दुनिया तो ये पूछेगी

 ग़ज़ल 194
221---1222 // 221-1222

ख़ामोश रहोगे तुम,  दुनिया तो ये पूछेगी
कल तुम भी रहे शामिल, क्या आग लगाने में ?

तू लाख गवाही दे, सच ला के खड़ा कर दे
आदिल ही लगा जब ख़ुद, क़ातिल को बचाने में

मसरूफ़ बहुत हो तुम, मसरूफ़ इधर हम भी
नाकाम रहे दोनो, इक पल को चुराने में

इमदाद तो करता है, एहसाँ भी जताता है
ग़ैरत है जगी अपनी, दस्तार बचाने में

दो-चार क़दम पर था, दर तेरा मेरे दर से
तय हो न सका वह भी, ता उम्र ज़माने मे

सुनने में लगे आसाँ, यह इश्क़ इबादत है
हो जाती फ़ना साँसे, इक प्यार निभाने में

वो ज़िक्र न आयेगा, उन वस्ल की रातों का
क्या ढूँढ रही हो तुम, ’आनन’ के फ़साने में

-आनन्द.पाठक- 
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शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

कविता 010: " स्मृति वन से

 

कविता 010 

 

स्मृति वन से

एक पवन का झोंका आया

गन्ध पुरानी लेता आया ।

लगा खोलने जीवन की पुस्तक के पन्ने

हर पन्ना कुछ बोल रहा था।

कुछ पन्ने थे खाली खाली

कटे फ़टे कुछ, स्याही बिखरे

कुछ पन्नों पर कटी लाइने।

इक पन्ने पर अर्ध-लेख था-

एक अधूरी लिखी कहानी

जो लिखना था, लिख न सका था

जो न लिखा था पढ़ सकता हूँ

यादें फिर से गढ़ सकता हूँ ।

कुछ गुलाब की पंखुड़ियाँ थीं

हवा ले गई उसे उड़ा कर

अब न ज़रूरत उसको मेरी

यादें बस रह गई घनेरी

वह गुलाब-सी,

सजी किसी के गुलदस्ते में।

जीवन कहाँ रुका करता है

सब अपने अपने रस्ते में

यादों का क्या-

यादें आती जाती रहतीं

आँखें नम कर जाती रहतीं

 

-आनन्द पाठक ’आनन’-

880092 7181

यह कविता मेरी आवाज़ में सुनें--






गुरुवार, 23 सितंबर 2021

कविता 009 : फूल बन कर कहीं खिले होते

 

कविता 009 


फूल बन कर कहीं खिले होते
जनाब ! हँस कर कभी मिले होते
किसी की आँख के आँसू
बन कर बहे होते 
तो पता चलता।

पता चलता
यह भी ख़ुदा की बन्दगी है
क्या चीज़ होती ज़िन्दगी है ।
मगर आप को फ़ुरसत कब थी
साज़िशों का ताना-बाना
बस्ती बस्ती आग लगाना
थोथे नारों से
ख्वाब दिखाना।
सब चुनाव की तैयारी है
दिल्ली की कुर्सी प्यारी है।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181

यह कविता मेरी आवाज़ में सुने---





 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 012

 

 

क़िस्त 012 ओके

 

45
साथ दिया है तूने इतना
मुझ पर रही इनायत तेरी
तुझे नया हमराह मिला है
फिर क्या रही ज़रूरत मेरी ।
 
46
रहने दे ’आनन’ तू अपना
प्यार मुहब्बत जुमलेबाजी
मेरे चाँदी के सिक्कों पर
भारी कब तेरी लफ़्फ़ाज़ी ?
 
47
दिल पर चोट लगी है इतनी
ख़ामोशी से डर लगता है
सब तो अपने आस-पास हैं
लेकिन सूना घर लगता है ।
 
48
इक दिन तो यह होना ही था
कौन नई सी बात हुई  है ,
जिसको हँसी ख़ुशी समझा था
वह ग़म की सौगात हुई है  ।
 

-आनन्द.पाठक-’आनन’-



गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कविता 008 : कितना आसान होता है

 
-कविता-008 

 
कितना आसान होता है
किसी पर कीचड़ उछालना
किसी पर उँगली उठाना
आसमान पर थूकना
पत्थर फेकना।
मासूम परिन्दों को निशाना बनाना
कितना आसान होता है
किसी लाइन को छोटा करना
उसे मिटाना
आग लगाना, आग लगा कर फिर फ़ैलाना
अच्छा लगता है
अपने को कुछ बड़ा दिखाना।
बड़ा समझना
तुष्टि अहम की हो जाती है
उसको सब अवसर लगता है
सच से उसको डर लगता है ।


 -आनन्द.पाठक ’आनन’-

8800927181

यह कविता मेरी आवाज़ में सुने---





शनिवार, 11 सितंबर 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 011

 
क़िस्त 011
 
41
 पास पास जब दो बरतन हों
लाजिम उनका टकराना है।
छोड़ो छॊटी-मोटी अनबन
बोलो वापस कब आना है ?
 
42
दशकों का था साथ पुराना,
चाँदी से तुम मोल लगाए ।
सत्य यही है अगर तुम्हारा
तो फिर कौन तुम्हें समझाए?
 
43
चाँद सितारों वाली बातें,
लिख्खी हुई किताबों में हैं।
चाँद तोड़ कर लाने वाली
बातें केवल बातॊं में हैं ।
 
44
एक नहीं मैं ही दुनिया में
जिसकी कोई व्यथा पुरानी ।
यहाँ हज़ारों मिल जाएगीं
मेरी जैसी  विरह कहानी ।
 
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
 8800927181
 

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

रिपोर्ताज़ 08: :मेरी किताब : सुन मेरे माही !- का प्रकाशन के संदर्भ में


 

रिपोर्ताज़ 10 :  :मेरी किताब : सुन मेरे माही !- का प्रकाशन के संदर्भ में

 एक सूचना =  पुस्तक प्रकाशन के सन्दर्भ में

मित्रो !

सूचित करते हुए हर्ष की अनुभूति हो रही है  कि आप लोगों के आशीर्वाद और शुभकामनाओं से मेरी सातवीं  पुस्तक -" सुन, मेरे माही ! "- [ माहिया- संग्रह ] प्रकाशित हो कर आ गई ।

इस से पूर्व मेरी -6-पुस्तकें [ 3- कविता/ग़ज़ल/गीत संग्रह और 3- हास्य व्यंग्य़ संग्रह] प्रकाशित हो चुकी हैं । इन सभी पुस्तकों का प्रकाशन "अयन प्रकाशन, नई दिल्ली " ने किया है ।

"अयन-प्रकाशन’ को इस हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।

 

इस संग्रह में मेरी 450 माहिए संकलित है जिसमे से कुछ माहिए आप लोगो ने इस मंच पर समय समय पर अवश्य पढ़ी होंगी ।

इस संग्रह में मैने माहिए के उदभव, विकास और माहिए के वज़न और बह्र के बारे में भी चर्चा की है।

आशा करता हूँ कि इस संग्रह को भी पूर्व की भाँति आप सभी लोगो का स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहेगा।

 

पुस्तक प्राप्ति के लिए अयन प्रकाशन से सम्पर्क किया जा सकता है । उनका पता है संलग्न है ।

whatsapp no = 92113 12372 [ संजय जी ]

{नोट : प्रकाशक यह पुस्तक शीघ्र ही Amazon पर उपलब्ध करा देगा ]

 

पुस्तक मिलने का पता –

 अयन प्रकाशन

1/20 महरौली, नई दिल्ली 110 030


शाखा—जे-19/39 राजापुरी. उत्तम नगर , नई दिल्ली-59

Email : ayanprakashan@gmail.com

Website : www.ayanprakashan.com

 

   -सादर-

-आनन्द.पाठक-

 

शनिवार, 21 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 010

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 010 ओके

37
इतना साथ निभाया तुमने
चन्द बरस कुछ और निभाते ।
अजर-अमर है कौन बताओ
अन्तिम सांस तलक रुक जाते ।

 38
सब माया है, सब धोखा है, 
ज्ञानीजन ने कहा सही है।
फिर भी मन है बँध-बँध जाता 
दुनिया का दस्तूर यही है ।

39
अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा,
सबकी अपनी सीमाएँ हैं ।
घात लगाए बैठी  दुनिया ,
पाप पुण्य की दुविधाएँ हैं ।

 40
नोक-झोंक तो चलती रहती ,
उल्फ़त की है अदा पुरानी ।
बात बात में रूठ के जाना
गहन प्रेम की यही निशानी ।


-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181



रविवार, 15 अगस्त 2021

ग़जल 193 : आप महफ़िल में जब भी आते हैं

 2122---1212---112/22

ग़ज़ल 193

आप महफ़िल में जब भी आते हैं
साथ अपनी अना  भी लाते  हैं ।

चाँद तारों की बात तुम जानो
बात धरती की हम सुनाते हैं

जब भी आता चुनाव का मौसम
ख़्वाब क्या क्या न वो दिखाते हैं

वक़्त सबका हिसाब करता है
लोग क्यों ये समझ न पाते हैं

बेसबब बात वो नहीं करते
बेगरज़ हाथ कब मिलाते हैं 

अब परिन्दे न लौट कर आते 
गाँव अपना जो छोड़ जाते हैं

इस जहाँ की यही रवायत है
लोग आते हैं ,लोग जाते हैं

तुम भी क्यों ग़मजदा हुए ’आनन’
लोग रिश्ते न जब निभाते हैं


-आनन्द पाठक-

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अना    = अहंकार ,घमंड

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

ग़ज़ल 192 : अभी नाज़-ए-बुताँ देखूँ--

 1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 192


अभी नाज़-ए-बुतां देखूँ  कि ज़ख़्मों के निशाँ देखूँ
मिले ग़म से ज़रा फ़ुरसत तो फिर कार-ए-जहाँ देखूँ

मसाइल हैं अभी बाक़ी ,मसाइब भी कहाँ कम हैं 
ज़मीं पर हो जो नफ़रत कम तो फिर मैं आसमाँ देखूँ

जो देखा ही नहीं तुमने , वहाँ की बात क्या ज़ाहिद !
यहीं जन्नत ,यहीं दोज़ख़ मैं ज़ेर-ए-आसमाँ  देखूँ

मुहब्बत में किसी का जब, भरोसा टूटने लगता
तो बढ़ते दो दिलों के बीच की मैं  दूरियाँ  देखूँ

लगा रहता है इक धड़का हमेशा दिल में जाने क्यूँ
उन्हें जब बेसबब बेवक़्त होते मेहरबाँ  देखूँ

किधर को ले के जाना था ,किधर यह ले कर  आया है
अमीरे-ए-कारवाँ की और क्या नाकामियाँ देखूँ

सियासत में सभी जायज़ ,है उनका मानना ’आनन’ 
हुनर के नाम पर उनकी ,सदा चालाकियाँ देखूँ


-आनन्द.पाठक-

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शब्दार्थ


मसाइल = समस्यायें

मसाइब =मुसीबतें

धड़का = डर ,भय,आशंका

ज़ेर-ए-आसमाँ =आसमान के नीचे यानी धरती पर

अमीरे-ए-कारवाँ = कारवाँ का नायक ,नेता 


मंगलवार, 3 अगस्त 2021

ग़ज़ल 191 चाह अपनी कभी छुपा न सके

 2122---1212--112


ग़ज़ल 191 : चाह अपनी छुपा न सके--


चाह अपनी कभी छुपा न सके
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके

आँख उनकी कही न भर आए
ज़ख़्म दिल का उन्हे दिखा न सके

सामने यक ब यक जो आए वो
शर्म से हम नज़र मिला न  सके

कैसे करता यक़ीन मैं तुम पर
एक वादा तो तुम निभा न सके

ज़िन्दगी के हसीन पहलू को
एक हम हैं कि आजमा न सके

लोग इलजाम धर गए मुझ पर
हम सफ़ाई में कुछ बता न सके

याद क्या हम को आ गया ’आनन’
हम नदामत से आँख उठा न सके 

-आनन्द पाठक-
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रविवार, 1 अगस्त 2021

ग़ज़ल 190 : बगुलों की मछलियों से---

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ग़ज़ल 190


बगुलों की मछलियों से, साजिश में रफ़ाक़त है
कश्ती को डुबाने की, साहिल की  इशारत  है

वो हाथ मिलाता है, रिश्तों को जगा कर के
ख़ंज़र भी चुभाता है , यह कैसी शरारत है

शीरी है ज़ुबां उसकी , क्या दिल में, ख़ुदा जाने 
हर बात में नुक़्ताचीं , उसकी तो ये आदत है

जब दर्द उठा करता, दिल तोड़ के अन्दर से
इक बूँद भी आँसू की, कह देती हिकायत है

इनकार नहीं करते ,’हां’ भी तो नहीं कहते
दिल तोड़ने वालों से, क्या क्या न शिकायत है

अब कोई नहीं मेरा, सब नाम के रिश्ते हैं
हस्ती से मेरी अपनी, ताउम्र बग़ावत है

इक राह नहीं तो क्या ,सौ राह तेरे आगे
चलना है तुझे ’आनन’ कोई न रिआयत है

=आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

रफ़ाक़त = दोस्ती, सहभागिता

हिकायत = कथा-कहानी ,वृतान्त

रिआयत = छूट 

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बुधवार, 28 जुलाई 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 009


अनुभूतियाँ 009




33

प्रश्न तुम्हारा वहॊं खड़ा है

मैं ही उत्तर ढूँढ न पाया ।

ग्यान-ध्यान क्या, दर्शन क्या है

मूढ़्मना को समझ न आया ।


34

प्रथम मिलन की यादें बाक़ी

आई थी तुम नज़र झुका कर

जाने किसकी  नज़र लग गई

भाग गई तुम आँख बचा कर

 

35

वैसे थी तो बात ज़रा सी  

तुम ने तिल का ताड़ बनाया

दोष किसी का, ग़लती किसकी

मेरे सर इलजाम लगाया

 

36

जाना ही था, कह कर जाती

 दिल के टुकड़े चुन कर जाती

मेरी भी क्या थी मजबूरी 

 कुछ तो मेरी  सुन कर जाती




-आनन्द.पाठक-’आनन’-




ग़ज़ल 189 : जो रंग अस्ल है ---

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ग़ज़ल 189

जो रंग अस्ल  है  वो दिखाएगा एक दिन
वो सरफ़िरा है होश में आएगा  एक दिन

नफ़रत के शह्र में भरा बारूद का धुआँ
पैग़ाम-ए-इश्क़ कोई सुनायेगा एक दिन

कुछ लोग हैं कि अम्न के दुश्मन बने हुए
यह वक़्त उनको खुद ही मिटाएगा एक दिन

किस बात पर गुरूर है ,किस बात का नशा
सब कुछ यहीं तू छोड़ के जाएगा एक दिन

हम तो इसी उमीद में करते रहे वफ़ा
वह भी वफ़ा का फ़र्ज़ निभाएगा एक दिन

वैसे हज़ार बार वो इनकार कर चुका
आने को कह गया है तो आएगा एक दिन

’आनन’ उमीद रख अभी आदम के हुनर पर
सूरज उतार कर यही लाएगा एक दिन

-आनन्द,पाठक-
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रविवार, 25 जुलाई 2021

ग़ज़ल 188 :अगर मिलते न तुम मुझको

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ग़ज़ल 188

अगर मिलते न तुम मुझको, ख़ुदा जाने कि क्या होता
सफ़र तनहा मेरा होता कि दिल फिर रो दिया होता

हमें खुद ही नहीं मालूम किस जानिब गए होते
इधर जो मैकदा होता ,उधर जो बुतकदा  होता

चलो अच्छा हुआ, ज़ाहिद! अलग है रास्ता अपना
जो मयख़ाने के दर पर सामना होता तो क्या होता

निक़ाब-ए-रुख़ उठा लेते वो, मेरा दिल सँवर जाता
हक़ीक़त सामने होती ,मज़ा कुछ दूसरा होता

ये दुनिया भी किसी जन्नत से कमतर तो नहीं दिखती
हसद से या अना से तू जो बाहर आ गया होता

भले कुछ दो न झोली में ,ये दिल अपना फ़क़ीराना
फ़क़ीरों के लबों पर तो सदा हर्फ़-ए-दुआ होता

मुहब्बत भर गई होती सभी के दिल में जो”आनन’
तो फिर यह देखती दुनिया ज़माना क्या से क्या होता !

-आनन्द.पाठक-

हसद = ईर्ष्या ,जलन,डाह
अना = अहम , अहंकार ,घमंड

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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

ग़ज़ल 187 : वह रंग बदलता है सियासत के नाम पर

 ग़ज़ल 187

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वह रंग बदलता है सियासत के नाम पर
जो गुल खिला रहा है शराफ़त के नाम पर

अब बागबाँ का नाम हवा में उछल रहा
लूटा चमन को उसने हिफ़ाज़त के नाम पर

कुछ रोटियाँ हैं सेंकनी घर से निकल पड़े
अब वोट साधने हैं इयादत के नाम पर

आता है जब चुनाव का मौसम कभी इधर
कुछ झुनझुने थमा दिया राहत के नाम पर

कलियाँ अगर हैं गा रहीं तो गाने दो बेहिचक
रोको न उनको रस्म-ए-नसीहत के नाम पर

वादे तमाम वादे है, सौगात सैकड़ों
कब तक छला करोगे यूँ ग़ुरबत के नाम पर

दुनिया बदल गई है ,हवाएँ बदल गईं
’आनन’  तू रो रहा है रवायत के नाम पर 

=आनन्द.पाठक-

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सोमवार, 19 जुलाई 2021

ग़ज़ल 186 : तुम नादाँ हो , नावाक़िफ़ हो,

 ग़ज़ल 186

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बह्र-ए-मुतदारिक मख़्बून मुसम्मन मुज़ाइफ़ 


तुम नादाँ हो ,नावाक़िफ़ हो,  मैं अर्ज़-ए-मुहब्बत क्या करता  !
आदाब-ए-मुहब्बत क्या जानो, ग़म-ए-दिल की शिकायत क्या करता !

मालूम तुम्हें भी है सब कुछ, इक दिल की चाहत क्या होती
’लैला-मजनूँ के किस्से का , मैं और वज़ाहत क्या करता
 
आना ही नहीं था जब तुमको ,दीदार नहीं होना है कभी
फिर झूठे वादे ख़्वाबों से , तामीर-ए-इमारत क्या करता

मौसम का आना जाना है, कभी जश्न-ए--फ़ज़ाँ ,कभी दौर-ए-खिजाँ
दो दिन की फ़ानी दुनिया में ,इजहार-ए-मसर्रत  क्या करता

बेमतलब कौन यहाँ मिलता , सबके अपने अपने मतलब
जब दाल गली उसकी न यहाँ , वह मुझसे रफ़ाक़त क्या करता

तसवीर जो क़ायम थी दिल में , तनहाई में बातें कर ली
सजदे में झुकाया सर अपना ,हर दर पे इबादत क्या करता

’आनन’ क्यों ख़ौफ़ क़यामत का, जब उनकी इनायत हो मुझ पर
जब वो ही मेरे हाफ़िज़ ठहरे ,मैं खुद की हिफ़ाज़त क्या करता 

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
तामीर-ए-इमारत = भवन निर्माण
इज़हार-ए-मसर्रत = ख़ुशी का इज़हार 
रफ़ाक़त = दोस्ती 
हाफ़िज़ = हिफ़ाज़त करने वाला

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ग़ज़ल 185 : पहले थी जैसी अब वो---

  ग़ज़ल 185

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ग़ज़ल 185
221--2121---1221---212


 जैसी थी पहले ,वैसी क़राबत नहीं रही
लहज़े में आप की वो शराफ़त नहीं रही

दो-चार गाम साथ में चलना ही था बहुत
अब ज़िन्दगी से वै्सी रफ़ाक़त नहीं रही

’तेशे’ से खुद को मार के ’फ़रहाद ’ मर गया
उलफ़त में आजकल वो शहादत नहीं रही

मौसम बदल गया है तो तुम भी बदल गए
अब बातचीत में वो नज़ाक़त नहीं रही

अब हाय! हेलो! हाथ मिलाना ही रह गया
’दिल से मिलाना दिल को’-रवायत नहीं रही

जब से अना गुरूर से दामन छुड़ा लिया
फिर ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं रही

दुनिया का दर्द ढालता अपनी ग़ज़ल में तू
’आनन’ तेरी ग़ज़ल में लताफ़त नहीं रही ।

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
क़राबत = सामीप्य ,निकटता ,दोस्ती
दो-चार गाम = दो-चार क़दम
लताफ़त = बारीक़ियाँ

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

ग़ज़ल 184 : लख़्त-ए-जिगर का खोना क्या है

 ग़ज़ल 184
21--121--121--122= 16

लख़्त-ए-जिगर1 का खोना क्या है
निशदिन उसका  रोना क्या है

जो  होना है  होगा ही वह
फिर जादू क्या ,टोना क्या  है !

गठरी  इक दिन  लुट जाएगी
दिल से लगा कर सोना क्या  है  !

जो बोओगे तुम काटोगे,  !
तय  कर लेना , बोना क्या है

जो रिश्ते नाकाम हुए  हैं
उन रिश्तों को ढोना क्या  है !\

सोन चिरैया देस गई है
दामन और भिगोना क्या है !

एक खिलौना टूटा दिल का
माटी का था रोना क्या  है !

जब ’आनन’ मन साफ़ नहीं तो
जल से तन का धोना क्या है !
 
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ 
लख़्त-ए-जिगर का = दिल के टुकड़े का
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बुधवार, 14 जुलाई 2021

ग़ज़ल 183 : सौगंध संविधान की --

 ग़ज़ल 183: सौगंध संविधान की

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सौगंध  संविधान की खाता है आजकल
’जयचन्द’ से भी हाथ मिलाता है आजकल

नाकामियों का ठीकरा औरो पे फोड़ता
मासूम सी वह शक्ल बनाता है आजकल

जब बाजुओं पे उसको भरोसा नहीं रहा
’तोते’ को अपना हाथ दिखाता है आजकल

नाआशना वो इश्क से ,महरूम प्यार से
नफ़रत जगा के आग लगाता है आजकल

वह दिन हवा हुए कि चमन में बहार थी
पंछी भी कोई अब नहीं गाता है आजकल

करता है संविधान की बातें बड़ी बड़ी
अब नाख़ुदा भी नाव डुबाता है आजकल

दुनिया की बात और है ’आनन’ की बात और
अपनी वो राह खुद ही बनाता है आजकल


-आनन्द.पाठक-

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मंगलवार, 13 जुलाई 2021

ग़ज़ल 182 : जब ’हाँ ” में "हाँ ’ किया तो--

 ग़ज़ल 182

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जब ’हां’ में ’हाँ’ किया तो रफ़ाकत समझ लिया
हिम्मत से ’ना’ कहा तो बग़ावत  समझ लिया

आतिश ज़बान, सोच में बारूद है भरा
सरकश हुआ तो ख़ुद को क़यामत समझ लिया

हालात ज़िन्दगी का  बताने गया उसे
अपने ख़िलाफ़ उसने शिकायत  समझ लिया

नेता नया नया है सियासत की बात है 
ख़िदमत ग़रीब का भी तिजारत समझ लिया

जादूगरी थी उसकी ,दलाइल भी बाकमाल
उसके फ़रेब को भी ज़हानत समझ लिया

यह बेबसी की इब्तिदा या इन्तिहा कहें ?
’साहब’ के वह सितम को इनायत समझ लिया

’आनन’ अजीब दौर है लोगों को क्या कहें
जाहिल की बात हर्फ़-ए-जमानत समझ लिया

-आनन्द.पाठक-

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शनिवार, 10 जुलाई 2021

ग़ज़ल 181 : रिश्तों की बात कौन ---

 ग़ज़ल 181
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रिश्तों की बात कौन निभाता है आजकल 
वह बेग़रज़ न हाथ मिलाता  है आजकल

यह और बात है उसे सुनता न हो कोई
फिर भी वो मन की बात सुनाता है आजकल

कहना तो चाहता था मगर कह नहीं सका
कोई तो दर्द है ,वो छुपाता  है आजकल

लोगों के अब तो तौर-तरीक़े बदल गए
किस दौर की तू बात सुनाता है आजकल 

मौसम चुनाव का अभी आने को है इधर
वह ख़्वाब रोज़-रोज़  दिखाता है आजकल

सच बोल कर भी देख लिया ,क्या उसे मिला ?
वह झूठ की दुकान चलाता है आजकल 

’आनन’ बदल सका न ज़माने के साथ साथ
आदर्श का वो कर्ज़ चुकाता है आजकल ।

-आनन्द पाठक-
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मंगलवार, 22 जून 2021

ग़ज़ल 180 : वह शख़्स देखने में तो लगता ज़हीन है

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मफ़ऊलु—फ़ाअ’लातु-मफ़ाईलु—फ़ाइलुन

बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़

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एक ग़ज़ल


वह शख़्स देखने में तो लगता ज़हीन है,
अन्दर से हो ज़हीन, न होता यक़ीन है ।       


कहने को तो हसीन वह ,चेहरा रँगा-पुता,
दिल से भी हो हसीन तो, सच में हसीन है।         


सच बोल कर मैं सच की दुहाई भी दे रहा
बातिल को अपने झूठ पे कितना यक़ीन है ।             


वह ज़हर घोलता है  फ़िज़ाओं में रात-दिन,
उसका वही ईमान है,  उसका वो दीन है ।      


ज़ाहिद ये तेरा फ़ल्सफ़ा अपनी जगह सही,
गर हूर है उधर तो इधर महजबीन है ।                             


क्यों  ख़ुल्द से निकाल दिए इस ग़रीब  को,
यह भी जमीं तो आप की अपनी जमीन है।              


’
आनन’ तू  बदगुमान में, ये तेरा घर नहीं,
यह तो मकान और का, बस  तू मकीन है।               


-
आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 

ज़हीन = सभ्य ,भला आदमी
मुतमईन है = निश्चिन्त है  ,बेफ़िक्र है
फ़लसफ़ा = दर्शन ,ज्ञान

महजबीन = चाँद सा चेहरे वाली
खुल्द  से= जन्नत  से [ आदम का खुल्द से निकाले जाने की जानिब इशारा है ]

मकीन = निवासी

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