शनिवार, 19 जून 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 08

 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 08

 

1

दोनों के जब दर्द एक हैं,

फिर क्यों दिल से दिल की दूरी

एक साथ चलने में क्या है ,

मिलने में हैं क्या मजबूरी ?

 

2

रात रात भर तारे किस की ,

देखा करते  राह निरन्तर  ?

और जलाते रहते ख़ुद को

आग बची जो दिल के अन्दर ।

 

3

कितनी बार हुई नम आँखें,

लेकिन बहने दिया न मैने।

शब्द अधर पर जब तब उभरे 

कुछ भी कहने दिया न मैने ।

 

4

छोड़ गई तुम, अरसा बीता,

फिर न बहार आई उपवन में ।

लेकिन ख़ुशबू आज तलक है,

दिल के इस सूने आँगन  में ।

 

 

-आनन्द.पाठक-

 

शनिवार, 12 जून 2021

गीत 70: ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

2122---2122--2122--2122

गीत 70 : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ,मैं अभी हारा नहीं हूँ ,
बिन लड़े ही हार मानूँ यह, नहीं स्वीकार मुझकॊ

जो कहेंगे वो, लिखूँ मैं ,शर्त मेरी लेखनी पर,
और मेरे ओठ पर ताला लगाना चाहते हैं ।
जो सुनाएँ वो सुनूँ मैं, ’हाँ’ में ’हाँ’ उनकी मिलाऊँ
बादलों के पंख पर वो घर बनाना चाहते हैं॥

स्वर्ण-मुद्रा थाल लेकर आ गए वो द्वार मेरे,
बेच दूँ मैं लेखनी यह ? है सतत धिक्कार मुझको

ज़िन्दगी आसां नहीं तुम सोच कर जितनी चली हो,
कौन सीधी राह चल कर पा गया अपन ठिकाना ।
हर क़दम, हर मोड़ पर अब राह में रहजन खड़े हैं
यह सफ़र यूँ ही चलेगा, ख़ुद ही बचना  या बचाना ।

जानता हूँ  तुम नहीं मानोगी  मेरी बात कोई-
और तुम को रोक लूँ मैं, यह नहीं अधिकार मुझको।

लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,
आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।
नम्रता की क्यों कमी है, क्यों ”अहम’ इतना भरा है
सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।

एक ढूँढो, सौ मिलेंगे हर शहर में, हर गली में ,
रूप बदले हर जगह मिलते वही हर बार मुझको।

-आनन्द.पाठक- 

शुक्रवार, 11 जून 2021

कतरन 02 : दी ग्राम टू डे - में प्रकाशित एक ग़ज़ल

’दी ग्राम टू डे " - में प्रकाशित एक ग़ज़ल 

कम फ़हमी वाला कुर्सी पर मैने अकसर देखा है

पूरी ग़ज़ल यहाँ पढ़ सकते है--->>>>>


कतरन 01: पत्रिका --कवि ग्राम [ अंक जून/21]-- में प्रकाशित

आनंद पाठक जी से कुछ समय से मिर्ज़ा ग़ालिब शिक्षण संस्थान के माध्यम से जुड़ा हुआ हूँ। वहां आपके ग़ज़ल पर कुछ व्याख्यान पढ़ें है।
आज एक पत्रिका पीडीएफ फॉरमेट में आई उसमें आपके द्वारा लिखा हुआ #एक_पत्र_चोर_के_नाम पढ़ा। पढ़ते ही सबसे पहले आपको कमेंट किया।
गजब की व्यंग्य शैली तो है ही साथ ही जैसे जैसे फिल्मी गीतों की पैरोडी बनाई है वह चेहरे पर हंसी बिखेरती चली जा रही थी।
आशा है चोर आपके पत्र का जो जवाब दिया है वह भी जल्द प्राप्त होगा।
आप सब भी आनंद जी के इस पत्र का आनंद लीजिये कोरोना से बचने का यह सबसे आसान उपाय है घर में बैठ कर कुछ पढ़ते रहिए।

 पत्रिका --कवि ग्राम [ अंक जून/21]-- में प्रकाशित : एक व्यंग्य : एक पत्र चोर के नाम

व्यंग्य यहाँ पढ़ सकते हैं--->>>>>>

https://www.facebook.com/akpathak3107/posts/10214877799617414 

ग़ज़ल 178 : अपना ही क्यों हरदम गाते

 ग़ज़ल 178

21--21-121--122 // 21-121-121-122


अपना ही क्यों हरदम गाते, तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 
कैसे  कैसे स्वाँग रचाते , तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

बात यक़ीनन कुछ तो होगी, मतलब होगा उनका,वरना
क्यों क़ातिल का साथ निभाते?, तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

चोट लगी हो जब शब्दों से, जीवन भर वो रिसते रहते
घाव कहाँ कब हैं भर पाते? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

इतने तो मासूम नहीं हो, जान रही है दुनिया सारी
फिर तुम क्यों खुद को झुठलाते? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ 

चाँद सितारों की बातों से ,मुझको क्या है लेना-देना
क्या सच है यह क्यों न बताते? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

फ़ित्ना उभरा, बस्ती उजड़ी, लोग मगर ख़ामोश रहे क्यूँ
हम सब क्यों गूँगे हो जाते ? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 

माया की ही सब माया है, जान रहे हो तुम भी ’आनन’
दलदल में क्यों फँसते जाते ? तुम भी सोचो, मैं भी सोचूँ . 


-आनन्द.पाठक-


गुरुवार, 10 जून 2021

ग़ज़ल 177 : हर बात पे नुक़्ताचीं--

 ग़ज़ल 177

221--1222 //221-1222


हर बात पे नुक़्ताचीं ,उनकी तो ये आदत है
हम ग़ौर से सुनते हैं,अपनी ये ज़हानत है


अच्छा न बुरा कोई ,सब वक़्त के मारे हैं
तकदीर अलग सब की.सब रब की इनायत है


सब लोग सफ़र में हैं, फिर लौट के कब आना
चलना ही जहाँ चलना ,कैसी ये मसाफ़त है ?


पर्दे में अज़ल से वो , देखा भी नहीं  हमने
हर शै में नज़र आता ,जब दिल में सदाकत है


वीरान पड़ा है दिल, मुद्दत भी हुई अब तो
आता न इधर कोई, करने कोअयादत है


क्यों पूछ रही हो तुम ’आनन’ का पता क्या है?
क्या कोई सितम बाक़ी,क्या कोई क़यामत है ?


”आनन’ की जमा पूँजी , बाक़ी है बची अबतक
इक चीज़ है ख़ुद्दारी ,इक चीज़ शराफ़त है 



-आनन्द.पाठक


मसाफ़त = सफ़र

अज़ल से = अनादि काल से

सदाक़त = सच्चाई

इयादत = मरीज का हाल चाल पूछना


बुधवार, 9 जून 2021

ग़ज़ल 176 : अहमक लोगो को कुर्सी पर--

 ग़ज़ल 176

21--121--121--122// 21-121-121-12

अहमक लोगो को कुर्सी पर, बैठे अकसर देखा है
पूरब जाना,पश्चिम जाए , ऐसा रहबर देखा है

तेरा भी घर शीशे का है, मेरा भी घर शीशे का
लेकिन तेरे ही हाथों में, मैने पत्थर  देखा  है 

नफ़रत की जब आँधी चलती, छप्पर तक उड़ जाते हैं
गुलशन, बस्ती, माँग उजड़ती .ऐसा मंज़र देखा है 

मंज़िल से ख़ुद ही ग़ाफ़िल है ,बातें ऊँची फेंक रहा
बाहर से मीठा मीठा है , भीतर ख़ंजर देखा है 

एक ’अना’ लेकर ज़िन्दा है ,झूठी शान दिखावे की
दुनिया में उसने अपने से , सबको कमतर देखा है

बच्चे वापस आ जायेंगे,ढूँढ रहीं बूढ़ी आँखें
ग़म में डूबे खोए बाबा. ऐसा भी घर देखा है 

लाख शिकायत जीवन तुम से ,फिर भी कुछ है याराना
जब भी देखा मैने तुमको, एक नज़र भर देखा है

नाम सुना होगा ’आनन’ का. शायद देखा भी होगा
लेकिन क्या  ’आनन’ का तुम ने , ग़म का सागर देखा है?


कम फ़हमी = कम समझ . 

ग़ज़ल 175 : लोग हद से गुज़रने लगे हैं---

 212---212---212--2


ग़ज़ल 175


लोग हद से गुज़रने लगे हैं
आइने देख डरने लगे हैं

हम तो मक़्रूज़ है ज़िन्दगी के 
दर्द से क़िस्त भरने लगे हैं

घाव जो वक़्त ने भर दिए थे
जख़्म फिर से उभरने लगे हैं

झूठ के जो तरफ़दार थे,वो
बात सतयुग की करने लगे हैं

बारहा ज़िन्दगी को समेटा
और सपने बिखरने लगे हैं

शौक़ से वो क़लम बेच आए
पूछने पर, मुकरने लगे हैं

जुर्म किसका था,इलजाम ’आनन’
सर पर मेरे वो धरने लगे हैं


-आनन्द.पाठक-


मक्रूज़ = ऋणी 


शनिवार, 29 मई 2021

ग़ज़ल 174 : किसी के प्यार में ये दिल लुटा दिया मैने

 1212---1122---1212--112/22


ग़ज़ल 174

किसी के प्यार में ये दिल लुटा दिया मैने
हसीन जुर्म पे ख़ुद को सज़ा  दिया  मैने ।

तलाश जिसकी थी वो तो नहीं मिला फिर भी
तमाम उम्र उसी में गँवा दिया मैने ।

भटक न जाएँ मुसाफ़िर कहीं अँधेरों में
चिराग़ राह में दिल का जला दिया मैने ।

जहाँ भी नक़्श-ए-क़दम आप का नज़र आया
मुक़ाम-ए-ख़ास समझ, सर झुका दिया मैने ।

इसी उमीद  में जीता रहा कि आओगे
ख़बर न आई तो दीया बुझा दिया मैने ।

नहीं हूँ फ़ैज़ तलब जो भी फ़ैसला कर दो
गुनाह जो भी था अपना बता दिया मैने ।

लगे न दाग़ कहीं इश्क़ पाक है ’आनन’
फ़ना का रस्म था वो भी निभा दिया मैने ।

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
फ़ैज़-तलब = यश का आकांक्षी
मुक़ाम-ए-ख़ास = विशिष्ट स्थान
फ़ना = प्राणोत्सर्ग


बुधवार, 26 मई 2021

ग़ज़ल 173 :पास मेरे था उसका पता उम्र भर--

 212---212---212---212
फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम


ग़ज़ल 173

पास मेरे था उसका पता उम्र भर
लाख ढूँढा उसे ,ना मिला उम्र भर

बारहा वह मिला मैने देखा नहीं
बीच में थी खड़ी इक अना उम्र भर

आप से क्या मिले इक घड़ी दो घड़ी
ख़ुद से ख़ुद ही रहा मैं जुदा उम्र भर

क्या ग़लत, क्या सही, क्या गुनह, क्या सवाब
मन इसी में उलझता गया उम्र भर

ज़ाहिरी तौर पर हों भले हम सुखन 
आदमी आदमी से डरा उम्र भर

पास आया भी वह , मुस्कराया भी वह
पर बनाए रहा, फ़ासिला उम्र भर 

छोड़ कर वह गया जब से ’आनन’ मुझे
फिर न कोई मिला दूसरा उम्र भर

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ 
अना = अहम ,अहंकार
गुनह ,सवाब = पाप पुण्य
हमसुखन = बात करने वाले दोस्त


रविवार, 23 मई 2021

ग़ज़ल 172 : जो कहा तुमने ---

 2122---1212---112/22


ग़ज़ल 172


जो कहा तुमने ,मैने माना है

जानता था कि वो बहाना है


बारहा ज़िन्दगी नहीं मिलती

जो मिली है  उसे निभाना है


हसरतें दिल की दिल में दफ़्न हुईं

राज़ यह भी नहीं बताना है


मौत उलझी हुई पहेली है

ज़िन्दगी इक नया फ़साना है


एक रिश्ता अज़ल से है क़ायम

क्या नया और क्या पुराना है 


इश्क़ की राह में सुकून कहाँ

साँस जब तक है चलते जाना है


किस  ख़ता की सज़ा है ये,’आनन’

रुख से पर्दा नहीं उठाना है 


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

बारहा = बार बार

अज़ल = आदि काल से  

ग़ज़ल 171 : आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या !

 212---212---212---212

ग़ज़ल 171 

आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या
रोज़ रंगीन सपने  दिखाना भी क्या !

सोच में जब भरा  हो  धुआँ ही धुआँ
उनका सुनना भी क्या और सुनाना भी क्या !

वो जमीं के मसाइल न हल कर सके
चाँद पर फिर महल का बनाना भी क्या !

बस्तियाँ जल के जब ख़ाक हो ही गईं
बाद जलने के आना न आना भी क्या !

अब सियासत में बस गालियाँ रह गईं
ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !

चोर भी सर उठा कर चले आ रहें
उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !

लाख दावे वो करते रहे साल भर
उनके दावों का सच अब बताना भी क्या !

इस व्यवस्था में ’आनन’ कहाँ तू खड़ा ,
तेरा जीना भी क्या, तेरा जाना भी क्या !

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
मसाइल = समस्यायें .मसले
ताज़ियाना = चाबुक ,कोड़े

प्र0

ग़ज़ल 170 : उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं--

 ग़ज़ल 170

2122---1212---22


उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं

शोर हर बात पर मचाते हैं


आप की आदतों में शामिल है

झूठ की ’हाँ ’ में”हाँ ’ मिलाते हैं


आँकड़ों से हमें वो बहलाते

रोज़ सपने नए दिखाते हैं


बेच कर आ गए ज़मीर अपना

क्या है ग़ैरत ! हमें सिखाते हैं


लोग यूँ तो शरीफ़ से दिखते

साथ क़ातिल का ही निभाते हैं


चल पड़ा इक नया चलन अब तो

दूध के हैं  धुले,  बताते हैं


दर्द सीने में पल रहा ’आनन’

हम ग़ज़ल दर्द की सुनाते हैं


-आनन्द.पाठक -

प्र0

शुक्रवार, 21 मई 2021

ग़ज़ल 169 : अगर ढलान से दर्या नहीं चला होता

 ग़ज़ल 169


1212---1122---1212---22


अगर ढलान से दर्या नहीं चला होता

मिलन की प्यास का सागर को क्या पता होता


तुम इतमिनान से इलजाम धर गए मुझ पर

जवाब क्या था मेरा भी तो सुन लिया होता


हसीन ख़्वाब दिखा कर उसे न बहलाते

वो जानता जो हक़ीक़त तो मर गया होता


कि तुम भी हो गए शामिल हवा की साज़िश में 

चराग़ तुम न बुझाते ,नहीं बुझा होता


तमाम धमकियाँ सहता रहा ज़माने की

चमन के दर्द का कोई तो हमनवा होता


यक़ीन कौन करेगा तुम्हारी बातों का

कहीं भी सच का  ज़रा रंग तो मिला होता


ज़मीर वक़्त पे जो जागता नहीं ’आनन’

किसी के पाँव के नीचे दबा पड़ा होता


-आनन्द पाठक-



सोमवार, 17 मई 2021

ग़ज़ल 168 : सभी ग़म एक से होते--

 1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 168


सभी ग़म एक से होते, नहीं होते किसी के कम

बयाँ कर देते हैं आँसू,  छुपाएँ लाख चाहे हम


दिया ख़ुद को जलाती है तो होता रास्ता रोशन

हवाएँ धौस देती हैं ,न जाने क्यों उसे हरदम


उमीदों के दरख़्तों पर कभी तो फूल आएँगे

बहारें लौट आएँगी ,बदलने दो ज़रा मौसम


सफ़र किसका कहाँ तक जा के रुक जाए नहीं मालूम

चलो मिल कर जलाते हैं मुहब्बत का दिया जानम


सितारे चाँद आ जाते उतर कर आसमाँ से ,सच

ज़रा कुछ दूर तक चलते निभाते साथ जो हमदम


क्षितिज के पार से जाने बुलाता कौन है मुझको

कि लगता है कोई रिश्ता पुराना है अभी क़ायम


ये जीवन चार दिन का है गुज़ारें हँस के सब ’आनन’

कहाँ होगे सखे ! कल तुम ,कहाँ होंगे न जाने हम 


-आनन्द.पाठक-


ग़ज़ल 167 : मुहब्बत में दीवानों को

 ग़ज़ल 167 : मुहब्बत में दीवानों को--

1222---1222---1222---1222-


मुहब्बत में दीवानों को नसीहत क्या ! हिदायत क्या !

अलग दुनिया में रहते हैं ,जमाने को शिकायत क्या !


रखा जिस हाल में मुझको कोई होता तो रो देता

मिली जो भी ख़ुशी थोड़ी तो हँसने में  किफ़ायत क्या !


जो बन कर पेड़ जंगल के, थपेड़े वक़्त के सहते

जुड़े अपनी जड़ो से है तो फिर उनकी हिफ़ाज़त क्या !


जो ज़िन्दा क़ौम होती हैं ,जमाने को बदल देती

कि मुर्दा क़ौम से होगी भला कोई बग़ावत क्या !


शहीदों ने कटाए सर कि उअन्के शौक़ थे अपने

किसी की मेह्र्बानी क्या ,किसी से लें इजाज़त क्या


किसी के इश्क़ में डूबा सदा रहता है दिल अपना

किया ख़ुद को समर्पण तो इबादत क्या ! जियारत क्या !


हमारे हौसले अपने, हमारे रास्ते अपने

अलग दुनिया है ’आनन’ की ,कोई हर्फ़-ए-इनायत क्या 


-आनन्द पाठक-

 


रविवार, 4 अप्रैल 2021

ग़ज़ल 166 : सर्द रिश्ते भी हों --

 ग़ज़ल 166

2122---1212---22


सर्द रिश्तों को  ढूँढ कर रखना
अपने लोगों की भी ख़बर रखना

आसमाँ पर नज़र तो रखते हो
इस ज़मीं पर भी तुम  नज़र रखना

इश्क में पेच-ओ-ख़म हज़ारों हैं
सोच कर ही क़दम इधर रखना

लोग टूटे हुए हैं अन्दर से -
दिल से दिल साथ जोड़ कर रखना

जख़्म जैसे छुपाते रहते हो
ग़म छुपाने का भी हुनर रखना

पूछ लेना ज़मीर-ओ-ग़ैरत से
पाँव पर जब किसी के, सर रखना

ज़िन्दगी का सफ़र सहल होगा
 मो’तबर एक हम सफ़र  रखना

किसको फ़ुरसत ,तुम्हें सुने ’आनन’
बात रखना तो मुख्तसर रखना 

-आनन्द,पाठक- 

ग़ज़ल 165 : दुआ कर मुझे इक नज़र देखते हैं

 ग़ज़ल 165

122---122----122---122


दुआ कर मुझे इक नज़र देखते हैं
वो अपनी दुआ का असर देखते हैं

ज़माने से उसको बहुत है शिकायत
हम आँखों में उसकी शरर देखते हैं

सदाक़त, दियानत की बातें किताबी
इधर लोग बस माल-ओ-ज़र देखते हैं

वो कागज़ पे मुर्दे को ज़िन्दा दिखा
हम उसका कमाल-ए-हुनर देखते हैं

दिखाता हूँ उनको जो ज़ख़्म-ए-जिगर तो
खुदा जाने किसको किधर देखते हैं

कहाँ तक हमें खींच लाई है हस्ती
अभी और कितना सफ़र ,देखते हैं

सभी को तू अपना समझता है ’आनन’
तुझे लोग कब इस नज़र देखते हैं ।


-आनन्द.पाठक-


बुधवार, 31 मार्च 2021

अनुभूतियाँ 07

 

अनुभूतियाँ  07

 

1

प्रेम स्नेह जब रिक्त हो गया

प्रणय-दीप यह जलता कब तक?

रात अभी पूरी बाक़ी है

बिन बाती यह चलता कब तक?

 

2

दुष्कर थीं पथरीली राहें-

हठ था कि तुम साथ चलोगी।

कितना तुम को समझाया था,

हर ठोकर पर हाथ मलोगी।

 

3

जीवन पथ का राही हूँ मैं,

एक अकेला कई रूप में ।

आजीवन चलता रहता हूँ,

कभी छांव में ,कभी धूप में।

 

4

बिना बताए चली गई तुम ,

क्या थी ग़लती,सनम हमारी।

इतना तो बतला कर जाती,

कब तक देखूँ राह तुम्हारी ।

 

-आनन्द.पाठक-

ग़ज़ल 164 : जब कभी सच फ़लक से उतरा है

 ग़ज़ल 164
2212--1212--112/22
बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़
2122---1212---22
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन-- फ़अ’ लुन
---   ---------  -----

सच कभी जब फ़लकसे उतरा है,
झूठ को नागवार  गुज़रा है।

बाँटता कौन है चिराग़ों को ,
रोशनी पर लगा के पहरा  है?

ख़ौफ़ आँखों के हैं गवाही में,
हर्फ़-ए-नफ़रत हवा में बिखरा है।

आग लगती कहाँ, धुआँ है कहाँ !
राज़ यह भी अजीब  गहरा है ।

खिड़कियाँ बन्द हैं, नहीं खुलतीं,
जख़्म फिर से तमाम उभरा है ।

दौर-ए-हाज़िर की यह हवा कैसी?
सच  भी बोलूँ तो जाँ पे ख़तरा है ।

आज किस पर यकीं करे ’आनन’
कौन है क़ौल पर जो ठहरा है ?


-आनन्द.पाठक- 


शनिवार, 27 मार्च 2021

ग़ज़ल 163 : इश्क़ की राह पर चल दिए हो अगर---

 212---212---212---212

ग़ज़ल 163

इश्क़ की राह पर चल दिए हो, अगर
ख़ौफ़ क्यों हो ,भले रास्ता पुरख़तर ?


इत्तिफ़ाक़न कभी  आप आएँ इधर
देखिए ज़ौक़-ए-दिल, मेरा ज़ौक़-ए-नज़र


फिर न आये कभी उम्र भर होश में
देख ले आप को जो कोई भर नज़र


इश्क़ में डूब कर आप भी देखिए
कौन कहता है यह बेसबब दर्द-ए-सर


ये अलग बात है वो न अपना हुआ
उम्र भर जिसको समझा था लख़्त-ए-जिगर


खुद ही चल कर वो आयेंगे दर पर मेरे
मेरी आहों का होगा अगर पुरअसर


तुमने ’आनन’ को देखा, न जाना कभी
उसका सोज़-ए-दुरूँ और रक्स-ए-शरर


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 

पुरख़तर = ख़तरों से भरा हुआ

ज़ौक़-ए-दिल = दिल की अभिरुचि

ज़ौक़-ए-नज़र = प्रेम भरी दॄष्टि

लख़्त-ए-जिगर - जिगर का टुकड़ा

सोज़-ए-दुरुँ = दिल की आग [प्रेम की]

रक्स-ए-शरर = [प्रेम की] चिंगारियों का नाच 


ग़ज़ल 162 : इक क़लम का सफ़र --

 ग़ज़ल 162
212---212---212---212
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन
-------------------------------

एक ग़ज़ल 162


इक क़लम का सफ़र, उम्र भर का सफ़र,
यूँ  ही चलता रहे,  बेधड़क हो निडर 

बात ज़ुल्मात से जिनको लड़ने की थी
बेच कर आ गए  वो नसीब-ए-सहर

जो कहूँ मैं, वो कह,जो सुनाऊँ वो सुन
या क़लम बेच दे, या ज़ुबाँ  बन्द कर 

उँगलियाँ ग़ैर पर तुम उठाते तो हो
अपने अन्दर न देखा, कभी झाँक कर 

तेरी ग़ैरत है ज़िन्दा तो ज़िन्दा है तू
ज़र्ब आने न दे अपनी दस्तार पर

झूठ ही झूठ की है, ख़बर हर जगह
पूछता कौन है अब कि सच है किधर?

एक उम्मीद बाक़ी है ’आनन’ अभी
तेरे नग़्मों  का होगा कभी तो असर ।


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ -
ज़ुल्मात से = अँधेरों से 
सहर        = सुबह 
दस्तार पर = पगड़ी पर, इज्जत पर 


शुक्रवार, 26 मार्च 2021

ग़ज़ल 161: न उतरे ज़िन्दगी भर जो--

 1222---1222---1222----1222
मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन—मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
 
एक ग़ज़ल होली पर
 
न उतरे ज़िन्दगी भर जो, लगा दो रंग होली में,
हँसीं दुनिया नज़र आए , पिला दो भंग होली में ।         
 
न उतरी है न उतरेगी, तुम्हारे प्यार की रंगत,
वही इक रंग सच्चा है, न हो बदरंग  होली में ।--          
 
कहीं ’राधा’ छुपी  फिरती, कहीं हैं गोपियाँ हँसतीं,
चली कान्हा कि जब टोली, करे हुड़दंग होली में ।      
 
’परे हट जा’-कहें राधा-’कन्हैया छोड़ दे रस्ता’
“न कर मुझसे यूँ बरज़ोरी, नहीं कर तंग होली में” ।    
 
गुलालों के उड़ें बादल, जहाँ रंगों की बरसातें,
वहीं अल्हड़ जवानी के फड़कते अंग होली में ।         
 
थिरकती है कहीं गोरी, मचलता है किसी का दिल
बजे डफली मजीरा हैं, बजाते चंग होली में ।             
 
सजा कर अल्पना देखूँ, तुम्हारी राह मैं ’आनन’
चले आओ, मैं नाचूँगी, तुम्हारे संग होली  में ।            
 
-आनन्द,पाठक-
 

रविवार, 21 मार्च 2021

अनुभूतियाँ 06 -- होली पर

 

[ होली की अग्रिम  शुभकामनाओं के साथ----

 कुछ अनुभूतियाँ   ----[ होली पर ]

1

खुशियों के हर रंग भरे हैं,

प्रीत मिला कर रंगोली में,

फ़ागुन आया, सपने आए,

तुम भी आ जाते होली में।

 

2

एक बार में धुल जायेगा,

इन रंगों में क्या रख्खा है,

अगर लगाना है तो लगाना,

प्रीत-प्रेम का रंग सच्चा है।

 

3

राधा करतीं मनुहारें हैं,

"देख न कर मुझ से बरजोरी

“छोड़ कलाई ,मोरी कान्हा!

बातों में ना आऊँ तोरी” ।

 

4

होली का मौसम आया है,

फ़गुनह्टा’ आँचल सरकाए।

मादक हुई हवाएँ, प्रियतम !

रह रह कर है मन भटकाए ।

 

5

छोड़ मुझे,जाने दे घर को,

कान्हा ! मार न यूँ पिचकारी।

बड़े जतन से बचा रखी है,

कोरी चुनरिया, कोरी सारी ।

 

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 6 मार्च 2021

अनुभूतियाँ 05

 अनुभूतियाँ 05


1

सच ही कहा था तुम ने उस दिन, 

" जा तो रही हूँ  सजल नयन से"

छन्द छन्द में उभरूँगी मैं,  

गीत लिखोगे कभी लगन से। "


2

सुख-दुख का ताना-बाना है,

जीवन है रंगीन  चदरिया ।

नयनो के जल से धोता हूँ,

हँसी खुशी यह कटे उमरिया।


3

बरसों से सच समझ रहे थे ,

लेकिन वह था भरम हमारा।

भला किया जो तोड़ गई तुम

आभारी दिल, करम तुम्हारा ।


4

दीप भले हो और किसी का

ज्योति प्रीत की आती तो है।

पीड़ा मेरी चुपके चुपके ,

किरनों से बतियाती तो है 


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

ग़ज़ल 160 : खुशी मिलती है उन को--

 ग़ज़ल 160

1222---1222---1222--1222
मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
--- --- ---
ख़ुशी मिलती है उनको साजिशों के ताने-बाने में,
छ्लकता दर्द है घड़ियाल-सा आँसू बहाने में।

हिमालय से चली नदियाँ बुझाने प्यास धरती की,
लगे कुछ लोग हैं बस तिश्नगी अपनी बुझाने में।

हवाएँ बरगलाती हैं ,चिरागों को बुझाती हैं,
कि जिनका काम था ख़ुशबू को फ़ैलाना ज़माने में।

हमारे आँकड़े तो देख हरियाली ही हरियाली,
उधर तू रो रहा है एक बस ’रोटी’ बनाने में ?

मिलेगी जब कभी फ़ुरसत, तुम्हें ’रोटी’ भी दे देंगे,
अभी तो व्यस्त हूँ तुमको नए सपने दिखाने में।

जहाँ क़ानून हो अन्धा, जहाँ आदिल भी हो बहरा,
वहाँ इक उम्र कट जाती किसी का हक़ दिलाने में।

अँधेरा ले के लौटे है,हमारे हक़ में वो ’आनन,’
मगर है रोशनी का जश्न उनके आशियाने में ।

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

एक सूचना : पुस्तक प्रकाशन के सन्दर्भ में---

 एक सूचना = पुस्तक प्रकाशन के सन्दर्भ में

 

हमें सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आप लोगों के आशीर्वाद और शुभकामनाओं से मेरी छठी पुस्तक -" अल्लम गल्लम बैठ निठल्लम "- [ हास्य-व्यंग्य संग्रह ] प्रकाशित हो कर आ गई है।

इस से पूर्व मेरी -5-पुस्तकें [ 3- कविता/ग़ज़ल/गीत संग्रह और 2- हास्य व्यंग्य़ संग्रह] प्रकाशित हो चुकी हैं । और इन सभी पुस्तकों का प्रकाशन "अयन प्रकाशन, नई दिल्ली " ने किया है ।

"अयन-प्रकाशन’ को इस हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।


इस संग्रह में मेरी 32-व्यंग्य रचनाएँ संकलित है जिसमे से कुछ रचनाएँ आप लोगो ने इस मंच पर अवश्य पढ़ी होंगी ।

आशा करता हूँ कि इस संग्रह को भी पूर्व की भाँति आप सभी लोगो का स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहेगा।


पुस्तक प्राप्ति के लिए अयन प्रकाशन से सम्पर्क किया जा सकता है । उनका पता है संलग्न है ।

whatsapp no = 92113 12372 [ संजय जी ]

{नोट : प्रकाशक ने अभी यह पुस्तक Amazon पर उपलब्ध नहीं कराई है ]

   -सादर-