गुरुवार, 16 सितंबर 2021

एक कविता : कितना आसान होता है

 

-कविता-

कितना आसान होता है

किसी पर कीचड़ ऊछालना

किसी पर उँगली उठाना

कितना आसान होता है

किसी लाइन को छोटा करना

मासूम परिन्दों पर निशाना लगाना

अच्छा लगता, तुष्टि अहम का

अपने को कुछ बड़ा दिखाना।


 गुलाब बन कर कहीं खिले होते

जनाब ! हँस कर कभी मिले होते

किसी की आँख के आँसू बन बहे होते

पता चलता

यह भी ख़ुदा की बन्दगी है

क्या चीज़ होती ज़िन्दगी है ।


-आनन्द.पाठक-  

शनिवार, 11 सितंबर 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 11

 

क़िस्त 11

 

1

दो बरतन जब पास पास हों

लाजिम उनका टकराना है।

छोड़ो छॊटी-मोटी बातें -

बोलो वापस कब आना है ?

 

2

दशकों का था साथ पुराना,

चाँदी से तुम मोल लगाए ।

सत्य यही है अगर तुम्हारा

तो फिर कौन तुम्हें समझाए?

 

3

चाँद सितारों वाली बातें,

लिख्खी हुई किताबों में हैं।

चाँद तोड़ कर लाने वाली

बातें केवल बातॊं में हैं ।

 

4

एक नहीं मैं ही दुनिया में

जिसकी कोई व्यथा पुरानी ।

एक नहीं. दो नहीं, हज़ारों

मेरी जैसी  विरह कहानी ।

 

-आनन्द.पाठक-

 

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

मेरी किताब : सुन मेरे माही !- का प्रकाशन


 

 एक सूचना =  पुस्तक प्रकाशन के सन्दर्भ में

मित्रो !

सूचित करते हुए हर्ष की अनुभूति हो रही है  कि आप लोगों के आशीर्वाद और शुभकामनाओं से मेरी सातवीं  पुस्तक -" सुन, मेरे माही ! "- [ माहिया- संग्रह ] प्रकाशित हो कर आ गई ।

इस से पूर्व मेरी -6-पुस्तकें [ 3- कविता/ग़ज़ल/गीत संग्रह और 3- हास्य व्यंग्य़ संग्रह] प्रकाशित हो चुकी हैं । इन सभी पुस्तकों का प्रकाशन "अयन प्रकाशन, नई दिल्ली " ने किया है ।

"अयन-प्रकाशन’ को इस हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।

 

इस संग्रह में मेरी 450 माहिए संकलित है जिसमे से कुछ माहिए आप लोगो ने इस मंच पर समय समय पर अवश्य पढ़ी होंगी ।

इस संग्रह में मैने माहिए के उदभव, विकास और माहिए के वज़न और बह्र के बारे में भी चर्चा की है।

आशा करता हूँ कि इस संग्रह को भी पूर्व की भाँति आप सभी लोगो का स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहेगा।

 

पुस्तक प्राप्ति के लिए अयन प्रकाशन से सम्पर्क किया जा सकता है । उनका पता है संलग्न है ।

whatsapp no = 92113 12372 [ संजय जी ]

{नोट : प्रकाशक यह पुस्तक शीघ्र ही Amazon पर उपलब्ध करा देगा ]

 

पुस्तक मिलने का पता –

 अयन प्रकाशन

1/20 महरौली, नई दिल्ली 110 030


शाखा—जे-19/39 राजापुरी. उत्तम नगर , नई दिल्ली-59

Email : ayanprakashan@gmail.com

Website : www.ayanprakashan.com

 

   -सादर-

-आनन्द.पाठक-

 

शनिवार, 21 अगस्त 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 10

 अनुभूतियाँ : क़िस्त 10

1

इतना साथ निभाया तुमने

चन्द बरस कुछ और निभाते ।

कौन यहाँ पर अजर-अमर है ,

साँस आख़िरी तक रुक जाते ।


 2

सब माया है, सब धोखा है, 

ज्ञानीजन ने कहा सही है।

फिर भी मन है बँध-बँध जाता 

दुनिया का दस्तूर यही है ।


3

अपनी अपनी लक्ष्मण रेखा,

सबकी अपनी सीमाएँ हैं ।

घात लगाए बैठी  दुनिया ,

पाप पुण्य की दुविधाएँ हैं ।


 4

नोक-झोंक तो चलती रहती ,

उल्फ़त की यह अदा पुरानी ।

बात बात में रूठ के जाना

गहन प्रेम की यही निशानी ।


-आनन्द.पाठक-


रविवार, 15 अगस्त 2021

ग़जल 193 : आप महफ़िल में जब भी आते हैं

 2122---1212---112/22

ग़ज़ल 193

आप महफ़िल में जब भी आते हैं
साथ अपनी अना  भी लाते  हैं ।


चाँद तारों की बात तुम जानो
बात धरती की हम सुनाते हैं


जब भी आता चुनाव का मौसम
ख़्वाब क्या क्या न वो दिखाते हैं


वक़्त सबका हिसाब करता है
लोग क्यों ये समझ न पाते हैं


बेसबब बात वो नहीं करते
बेगरज़ हाथ कब मिलाते हैं 


अब परिन्दे न लौट कर आते 
गाँव अपना जो छोड़ जाते हैं


इस जहाँ की यही रवायत है
लोग आते हैं ,लोग जाते हैं


तुम भी क्यों ग़मजदा हुए ’आनन’
लोग रिश्ते न जब निभाते हैं


-आनन्द पाठक-

अना    = अहंकार ,घमंड

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

ग़ज़ल 192 : अभी नाज़-ए-बुताँ देखूँ--

 1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 192


अभी नाज़-ए-बुतां देखूँ  कि ज़ख़्मों के निशाँ देखूँ
मिले ग़म से ज़रा फ़ुरसत तो फिर कार-ए-जहाँ देखूँ

मसाइल हैं अभी बाक़ी ,मसाइब भी कहाँ कम हैं 
ज़मीं पर हो जो नफ़रत कम तो फिर मैं आसमाँ देखूँ

जो देखा ही नहीं तुमने , वहाँ की बात क्या ज़ाहिद !
यहीं जन्नत ,यहीं दोज़ख़ मैं ज़ेर-ए-आसमाँ  देखूँ

मुहब्बत में किसी का जब, भरोसा टूटने लगता
तो बढ़ते दो दिलों के बीच की मैं  दूरियाँ  देखूँ

लगा रहता है इक धड़का हमेशा दिल में जाने क्यूँ
उन्हें जब बेसबब बेवक़्त होते मेहरबाँ  देखूँ

किधर को ले के जाना था ,किधर यह ले कर  आया है
अमीरे-ए-कारवाँ की और क्या नाकामियाँ देखूँ

सियासत में सभी जायज़ ,है उनका मानना ’आनन’ 
हुनर के नाम पर उनकी ,सदा चालाकियाँ देखूँ


-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ


मसाइल = समस्यायें

मसाइब =मुसीबतें

धड़का = डर ,भय,आशंका

ज़ेर-ए-आसमाँ =आसमान के नीचे यानी धरती पर

अमीरे-ए-कारवाँ = कारवाँ का नायक ,नेता 

p-baab-e-sukhan 22-08-21

फ़ेसबुक- 15-09-21


मंगलवार, 3 अगस्त 2021

ग़ज़ल 191 चाह अपनी कभी छुपा न सके

 2122---1212--112


ग़ज़ल 191 : चाह अपनी छुपा न सके--


चाह अपनी कभी छुपा न सके
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके

आँख उनकी कही न भर आए
ज़ख़्म दिल का उन्हे दिखा न सके

सामने यक ब यक जो आए वो
शर्म से हम नज़र मिला न  सके

कैसे करता यक़ीन मैं तुम पर
एक वादा तो तुम निभा न सके

ज़िन्दगी के हसीन पहलू को
एक हम हैं कि आजमा न सके

लोग इलजाम धर गए मुझ पर
हम सफ़ाई में कुछ बता न सके

याद क्या हम को आ गया ’आनन’
हम नदामत से आँख उठा न सके 

-आनन्द पाठक-

रविवार, 1 अगस्त 2021

ग़ज़ल 190 : बगुलों की मछलियों से---

 221--1222 // 221--1222


ग़ज़ल 190


बगुलों की मछलियों से, साजिश में रफ़ाक़त है
कश्ती को डुबाने की, साहिल की  इशारत  है

वो हाथ मिलाता है, रिश्तों को जगा कर के
ख़ंज़र भी चुभाता है , यह कैसी शरारत है

शीरी है ज़ुबां उसकी , क्या दिल में, ख़ुदा जाने 
हर बात में नुक़्ता चीं ,उसकी तो ये आदत है

जब दर्द उठा करता, दिल तोड़ के अन्दर से
इक बूँद भी आँसू की कह देती हिकायत है

इकरार नहीं करते ,’हां’ भी तो नहीं कहते
दिल तोड़ने वालों से, क्या क्या न शिकायत है

अब कोई नहीं मेरा, सब नाम के रिश्ते हैं
हस्ती से मेरी अपनी ताउम्र बग़ावत है

इक राह नहीं तो क्या ,सौ राह तेरे आगे
चलना है तुझे ’आनन’ कोई न रिआयत है

=आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

रफ़ाक़त = दोस्ती, सहभागिता

हिकायत = कथा-कहानी ,वृतान्त

रिआयत = छूट 



बुधवार, 28 जुलाई 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 09

 


अनुभूतियाँ : क़िस्त 09


1

कोई सफ़र नहीं नामुमकिन
उम्मीदों के दीप जलाना
अगर कभी लगता हो तुमको
हिम्मत दिल में  सदा जगाना

2

प्रथम मिलन की यादें बाक़ी

आई थी तुम नज़र झुका कर

जाने किसकी  नज़र लग गई

चली गई तुम बाँह छुड़ा कर

 

3

वैसे थी तो बात ज़रा सी  

तुम ने तिल का ताड़ बनाया

ख़ता किसी की, सज़ा किसी को

मेरे सर इलजाम लगाया

 

4

जाना ही था, कह कर जाती

 दिल के टुकड़े चुन कर जाती

मेरी क्या क्या  मजबूरी थी

 कुछ तो मेरी  सुन कर जाती


-आनन्द.पाठक--


ग़ज़ल 189 : जो रंग अस्ल है ---

 1222---1222----1222----1222

ग़ज़ल 189

जो रंग अस्ल है वो दिखाएगा एक दिन

वो सरफ़िरा है होश में आएगा  एक दिन


नफ़रत के शह्र में भरा बारूद का धुआँ

पैग़ाम-ए-इश्क़ कोई सुनायेगा एक दिन


कुछ लोग हैं कि अम्न के दुश्मन बने हुए

यह वक़्त उनको खुद ही मिटाएगा एक दिन


किस बात पर गुरूर है ,किस बात का नशा

सब कुछ यहीं तू छोड़ के जाएगा एक दिन


हम तो इसी उमीद में करते रहे वफ़ा

वह भी वफ़ा का फ़र्ज़ निभाएगा एक दिन


वैसे हज़ार बार वो इनकार कर चुका

आने को कह गया है तो आएगा एक दिन


’आनन’ उमीद रख अभी आदम के हुनर पर

सूरज उतार कर यही लाएगा एक दिन


-आनन्द,पाठक-


रविवार, 25 जुलाई 2021

ग़ज़ल 188 :अगर मिलते न तुम मुझको

 1222---1222---1222---1222


ग़ज़ल 188

अगर मिलते न तुम मुझको, ख़ुदा जाने कि क्या होता
सफ़र तनहा मेरा होता कि दिल फिर रो दिया होता

हमें खुद ही नहीं मालूम किस जानिब गए होते
इधर जो मैकदा होता ,उधर जो बुतकदा  होता

चलो अच्छा हुआ, ज़ाहिद! अलग है रास्ता अपना
जो मयख़ाने के दर पर सामना होता तो क्या होता

निक़ाब-ए-रुख़ उठा लेते वो, मेरा दिल सँवर जाता
हक़ीक़त सामने होती ,मज़ा कुछ दूसरा होता

ये दुनिया भी किसी जन्नत से कमतर तो नहीं दिखती
हसद से या अना से तू जो बाहर आ गया होता

भले कुछ दो न झोली में ,ये दिल अपना फ़क़ीराना
फ़क़ीरों के लबों पर तो सदा हर्फ़-ए-दुआ होता

मुहब्बत भर गई होती सभी के दिल में जो”आनन’
तो फिर यह देखती दुनिया ज़माना क्या से क्या होता !

-आनन्द.पाठक-

हसद = ईर्ष्या ,जलन,डाह
अना = अहम , अहंकार ,घमंड

प्र0

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

ग़ज़ल 187 : वह रंग बदलता है सियासत के नाम पर

 ग़ज़ल 187

221--2121--1221--212


वह रंग बदलता है सियासत के नाम पर
जो गुल खिला रहा है शराफ़त के नाम पर

अब बागबाँ का नाम हवा में उछल रहा
लूटा चमन को उसने हिफ़ाज़त के नाम पर

कुछ रोटियाँ हैं सेंकनी घर से निकल पड़े
अब वोट साधने हैं इयादत के नाम पर

आता है जब चुनाव का मौसम कभी इधर
कुछ झुनझुने थमा दिया राहत के नाम पर

कलियाँ अगर हैं गा रहीं तो गाने दो बेहिचक
रोको न उनको रस्म-ए-नसीहत के नाम पर

वादे तमाम वादे है, सौगात सैकड़ों
कब तक छला करोगे यूँ ग़ुरबत के नाम पर

दुनिया बदल गई है ,हवाएँ बदल गईं
’आनन’  तू रो रहा है रवायत के नाम पर 

=आनन्द.पाठक-


सोमवार, 19 जुलाई 2021

ग़ज़ल 186 : तुम नादाँ हो , नावाक़िफ़ हो,

 ग़ज़ल 186

112---112---112--112--//112--112--112--112

बह्र-ए-मुतदारिक मख़्बून मुसम्मन मुज़ाइफ़ 


तुम नादाँ हो ,नावाक़िफ़ हो,  मैं अर्ज़-ए-मुहब्बत क्या करता  !
आदाब-ए-मुहब्बत क्या जानो, ग़म-ए-दिल की शिकायत क्या करता !

मालूम तुम्हें भी है सब कुछ, इक दिल की चाहत क्या होती
’लैला-मजनूँ के किस्से का , मैं और वज़ाहत क्या करता
 
आना ही नहीं था जब तुमको ,दीदार नहीं होना है कभी
फिर झूठे वादे ख़्वाबों से , तामीर-ए-इमारत क्या करता

मौसम का आना जाना है, कभी जश्न-ए--फ़ज़ाँ ,कभी दौर-ए-खिजाँ
दो दिन की फ़ानी दुनिया में ,इजहार-ए-मसर्रत  क्या करता

बेमतलब कौन यहाँ मिलता , सबके अपने अपने मतलब
जब दाल गली उसकी न यहाँ , वह मुझसे रफ़ाक़त क्या करता

तसवीर जो क़ायम थी दिल में , तनहाई में बातें कर ली
सजदे में झुकाया सर अपना ,हर दर पे इबादत क्या करता

’आनन’ क्यों ख़ौफ़ क़यामत का, जब उनकी इनायत हो मुझ पर
जब वो ही मेरे हाफ़िज़ ठहरे ,मैं खुद की हिफ़ाज़त क्या करता 

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
तामीर-ए-इमारत = भवन निर्माण
इज़हार-ए-मसर्रत = ख़ुशी का इज़हार 
रफ़ाक़त = दोस्ती 
हाफ़िज़ = हिफ़ाज़त करने वाला

ग़ज़ल 185 : पहले थी जैसी अब वो---

 ग़ज़ल 185

221--2121---1221---212

पहले थी जैसी अब वो क़राबत नहीं रही
लहज़े में आप की वो शराफ़त नहीं रही

अब ज़िन्दगी से वै्सी रफ़ाक़त नहीं रही
उलफ़त में आजकल वो शहादत नहीं रही

अब बातचीत में वो नज़ाक़त नहीं रही
’दिल से मिलाना दिल को’-रवायत नहीं रही

जब से अना गुरूर से दामन छुड़ा लिया
दुनिया का दर्द ढालता अपनी ग़ज़ल में तू

दो-चार गाम साथ में चलना ही था बहुत
’तेशे’ से खुद को मार के ’फ़रहाद ’ मर गया

मौसम बदल गया है तो तुम भी बदल गए
अब हाय! हेलो! हाथ मिलाना ही रह गया

फिर ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं रही
’आनन’ तेरी ग़ज़ल में लताफ़त नहीं रही ।

शब्दार्थ
क़राबत = सामीप्य ,निकटता ,दोस्ती
दो-चार गाम = दो-चार क़दम
लताफ़त = बारीक़ियाँ


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

ग़ज़ल 184 : लख़्त-ए-जिगर का खोना क्या है

 ग़ज़ल 184

21--121--121--122


लख़्त-ए-जिगर का खोना क्या है!
निशदिन उसका  रोना क्या है !

जो होना है होगा ही वह ,
फिर जादू क्या , टोना क्या है  !

मन का दरपन साफ़ नहीं तो
तन का जल से धोना क्या है !

गठरी तो लुट जानी इक दिन
दिल से लगा कर सोना क्या है  !

फ़स्ल वही काटेगा, प्यारे !
तय  कर लेना , बोना क्या  है!

जो रिश्ते नाकाम हुए हों 
उन रिश्तों को ढोना क्या है !

सोन चिरैया देस गई है
दामन और भिगोना क्या है !

एक खिलौना टूटा ’आनन’ 
माटी का था रोना क्या है  !

-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ 
लख़्त-ए-जिगर का = दिल के टुकड़े का


बुधवार, 14 जुलाई 2021

ग़ज़ल 183 : सौगंध संविधान की --

 ग़ज़ल 183: सौगंध संविधान की

221--2121---1221---212

सौगंध  संविधान की खाता है आजकल
’जयचन्द’ से भी हाथ मिलाता है आजकल

नाकामियों का ठीकरा औरो पे फोड़ता
मासूम सी वह शक्ल बनाता है आजकल

जब बाजुओं पे उसको भरोसा नहीं रहा
’तोते’ को अपना हाथ दिखाता है आजकल

नाआशना वो इश्क से ,महरूम प्यार से
नफ़रत जगा के आग लगाता है आजकल

वह दिन हवा हुए कि चमन में बहार थी
पंछी भी कोई अब नहीं गाता है आजकल

करता है संविधान की बातें बड़ी बड़ी
अब नाख़ुदा भी नाव डुबाता है आजकल

दुनिया की बात और है ’आनन’ की बात और
अपनी वो राह खुद ही बनाता है आजकल


-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 13 जुलाई 2021

ग़ज़ल 182 : जब ’हाँ ” में "हाँ ’ किया तो--

 ग़ज़ल 182

221---2121---1212---212


जब ’हां’ में ’हाँ’ किया तो रफ़ाकत समझ लिया
हिम्मत से ’ना’ कहा तो बग़ावत  समझ लिया

आतिश ज़बान, सोच में बारूद है भरा
सरकश हुआ तो ख़ुद को क़यामत समझ लिया

हालात ज़िन्दगी का  बताने गया उसे
अपने ख़िलाफ़ उसने शिकायत  समझ लिया

नेता नया नया है सियासत की बात है 
ख़िदमत ग़रीब का भी तिजारत समझ लिया

जादूगरी थी उसकी ,दलाइल भी बाकमाल
उसके फ़रेब को भी ज़हानत समझ लिया

यह बेबसी की इब्तिदा या इन्तिहा कहें ?
’साहब’ के वह सितम को इनायत समझ लिया

’आनन’ अजीब दौर है लोगों को क्या कहें
जाहिल की बात हर्फ़-ए-जमानत समझ लिया

-आनन्द.पाठक-


शनिवार, 10 जुलाई 2021

ग़ज़ल 181 : रिश्तों की बात कौन ---

 ग़ज़ल 181

221---2121---1221---212

रिश्तों की बात कौन निभाता है आजकल 

वह बेग़रज़ न हाथ मिलाता  है आजकल


यह और बात है उसे सुनता न हो कोई

फिर भी वो मन की बात सुनाता है आजकल


कहना तो चाहता था मगर कह नहीं सका

कोई तो दर्द है ,वो छुपाता  है आजकल


लोगों के अब तो तौर-तरीक़े बदल गए

किस दौर की तू बात सुनाता है आजकल 


मौसम चुनाव का अभी आने को है इधर

वह ख़्वाब रोज़-रोज़  दिखाता है आजकल


सच बोल कर भी देख लिया ,क्या उसे मिला ?

वह झूठ की दुकान चलाता है आजकल 


’आनन’ बदल सका न ज़माने के साथ साथ

आदर्श का वो कर्ज़ चुकाता है आजकल ।


-आनन्द पाठक-

सोमवार, 28 जून 2021

फ़र्द 01

 1222---1222--1222--122


बढ़ाते हाथ अपने तो तुम्हें कैसे बढ़ाते 

हमारे हाथ बौने थे,अरे  वो भी कटे थे 

तुम्हें लगता रहा झूठा, दिखावा सब छलावा

समय के हाथ से  हम तो बहुत पहले लुटे थे

--

1222----1222--1222----1222

तुम्हें क्या दे सकूँगा मैं सिवा इक प्यार, होली में 

प्रणय से है भरा उदगार, यही उपहार होली में 


भले ही भूल जाओ तुम, नहीं होगी शिकायत कुछ

करूँगा याद मैं तुमको ,सखे ! सौ बार होली  में 


तेरी तसवीर पर ही रंग भर कर मान लूँगा मैं 

मेरी चाहत हुई पूरी ,प्रिये ! इस बार  होली में 

-----   =====------
1212--1212--122---22
बह्र-ए-रजज़ मख़्बून महजूज़

तमाम लोग पूछते है कि कौन है ’आनन’?

सुखन शनास हूँ ,कलाम से मुहब्बत है 



मंगलवार, 22 जून 2021

ग़ज़ल 180 : वह शख़्स देखने में तो लगता ज़हीन है

 221-------2121-------1221---212

मफ़ऊलु—फ़ाअ’लातु-मफ़ाईलु—फ़ाइलुन

बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़

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एक ग़ज़ल


वह शख़्स देखने में तो लगता ज़हीन है,
अन्दर से हो ज़हीन, न होता यक़ीन है ।       1


कहने को तो हसीन वह ,चेहरा रँगा-पुता,
दिल से भी हो हसीन तो, सच में हसीन है।     2     


सच बोल कर मैं सच की दुहाई भी दे रहा
वह शख़्स झूठ बोल के भी मुतमईन है ।      3         


वह ज़हर घोलता है  फ़िज़ाओं में रात-दिन,
उसका वही ईमान है,  उसका वो दीन है ।      4


ज़ाहिद ये तेरा फ़ल्सफ़ा अपनी जगह सही,
गर हूर है उधर तो इधर महजबीन है                    5          


क्यों  ख़ुल्द से निकाल दिए इस ग़रीब  को,
यह भी जमीं तो आप की अपनी जमीन है।     6         


आनन’ तू  बदगुमान में, ये तेरा घर नहीं,
यह तो मकान और का, बस  तू मकीन है।      7         


-
आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 

ज़हीन = सभ्य ,भला आदमी
मुतमईन है = निश्चिन्त है  ,बेफ़िक्र है
फ़लसफ़ा = दर्शन ,ज्ञान

महजबीन = चाँद सा चेहरे वाली
खुल्द  से= जन्नत  से [ आदम का खुल्द से निकाले जाने की जानिब इशारा है ]

मकीन = निवासी

[प्र0]


ग़ज़ल 179 : ग़ज़ल हुई तो यक़ीनन--

 1212---1122---1212---112/22


ग़ज़ल 179

ग़ज़ल हुई  तो यक़ीनन, न कामयाब हुई
तुम्हारे लब पे जो उतरी तो लाजवाब हुई

हमारे हाथ मे जब तक रही तो पानी थी
तुम्हारे हाथ में जा कर ग़ज़ल शराब हुई

हुई, हुई न हुई , कोई अख़्तियार नहीं
मगर हुई जो मुहब्बत तो बेहिसाब हुई

तमाम लोग थे जो जुल्म के शिकार हुए
कि सब के दिल की उठी आग, इन्क़लाब हुई

बचा के ला दिए तूफ़ान हादिसों से, मगर
अजीब प्यास थी साहिल पे गर्क-ए-आब हुई

हर एक बार जो गुज़रे तुम्हारे कूचे से
हमारी सोच ही नाक़िस थी बेनक़ाब हुई

अजीब चीज़ है उल्फ़त की भी सिफ़त’आनन’
किसी को मिल गई मंज़िल ,किसी का ख़्वाब हुई

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
गर्क-ए-आब हुई = डूब गई
नाक़िस सोच = ्ख़राब सोच ,नुक़्स वाली सोच
सिफ़त = गुण ,लक्षण

शनिवार, 19 जून 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 08

 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 08

 

1

दोनों के जब दर्द एक हैं,

फिर क्यों दिल से दिल की दूरी

एक साथ चलने में क्या है ,

मिलने में हैं क्या मजबूरी ?

 

2

रात रात भर तारे जग कर ,

देखा करते  राह निरन्तर  ?

और जलाते रहते ख़ुद को

आग बची जो दिल के अन्दर ।

 

3

कितनी बार हुई नम आँखें,

लेकिन बहने दिया न मैने।

शब्द अधर पर जब तब उभरे 

कुछ भी कहने दिया न मैने ।

 

4

छोड़ गई तुम, अरसा बीता,

फिर न बहार आई उपवन में ।

लेकिन ख़ुशबू आज तलक है,

दिल के इस सूने आँगन  में ।

 

 

-आनन्द.पाठक-

 

शनिवार, 12 जून 2021

गीत 70: ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

2122---2122--2122--2122

गीत 70 : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---

ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ,मैं अभी हारा नहीं हूँ ,
बिन लड़े ही हार मानूँ यह, नहीं स्वीकार मुझकॊ

जो कहेंगे वो, लिखूँ मैं ,शर्त मेरी लेखनी पर,
और मेरे ओठ पर ताला लगाना चाहते हैं ।
जो सुनाएँ वो सुनूँ मैं, ’हाँ’ में ’हाँ’ उनकी मिलाऊँ
बादलों के पंख पर वो घर बनाना चाहते हैं॥

स्वर्ण-मुद्रा थाल लेकर आ गए वो द्वार मेरे,
बेच दूँ मैं लेखनी यह ? है सतत धिक्कार मुझको

ज़िन्दगी आसां नहीं तुम सोच कर जितनी चली हो,
कौन सीधी राह चल कर पा गया अपन ठिकाना ।
हर क़दम, हर मोड़ पर अब राह में रहजन खड़े हैं
यह सफ़र यूँ ही चलेगा, ख़ुद ही बचना  या बचाना ।

जानता हूँ  तुम नहीं मानोगी  मेरी बात कोई-
और तुम को रोक लूँ मैं, यह नहीं अधिकार मुझको।

लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,
आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।
नम्रता की क्यों कमी है, क्यों ”अहम’ इतना भरा है
सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।

एक ढूँढो, सौ मिलेंगे हर शहर में, हर गली में ,
रूप बदले हर जगह मिलते वही हर बार मुझको।

-आनन्द.पाठक- 

शुक्रवार, 11 जून 2021

कतरन 02 : दी ग्राम टू डे - में प्रकाशित एक ग़ज़ल

’दी ग्राम टू डे " - में प्रकाशित एक ग़ज़ल 

कम फ़हमी वाला कुर्सी पर मैने अकसर देखा है

पूरी ग़ज़ल यहाँ पढ़ सकते है--->>>>>


कतरन 01: पत्रिका --कवि ग्राम [ अंक जून/21]-- में प्रकाशित

आनंद पाठक जी से कुछ समय से मिर्ज़ा ग़ालिब शिक्षण संस्थान के माध्यम से जुड़ा हुआ हूँ। वहां आपके ग़ज़ल पर कुछ व्याख्यान पढ़ें है।
आज एक पत्रिका पीडीएफ फॉरमेट में आई उसमें आपके द्वारा लिखा हुआ #एक_पत्र_चोर_के_नाम पढ़ा। पढ़ते ही सबसे पहले आपको कमेंट किया।
गजब की व्यंग्य शैली तो है ही साथ ही जैसे जैसे फिल्मी गीतों की पैरोडी बनाई है वह चेहरे पर हंसी बिखेरती चली जा रही थी।
आशा है चोर आपके पत्र का जो जवाब दिया है वह भी जल्द प्राप्त होगा।
आप सब भी आनंद जी के इस पत्र का आनंद लीजिये कोरोना से बचने का यह सबसे आसान उपाय है घर में बैठ कर कुछ पढ़ते रहिए।

 पत्रिका --कवि ग्राम [ अंक जून/21]-- में प्रकाशित : एक व्यंग्य : एक पत्र चोर के नाम

व्यंग्य यहाँ पढ़ सकते हैं--->>>>>>

https://www.facebook.com/akpathak3107/posts/10214877799617414